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देश में किसने लगाई आगॽ ,इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

UB India News by UB India News
June 14, 2022
in प्रदेश, ब्लॉग
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क्या पुलिस की FIR नफरत फैलाने वालों पर लगाम लगा पाएगी?
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जिस दिन से भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता रहीं नूपुर शर्मा के बयान पर विवाद खड़ा हुआ है, उस दिन से देश में आग लग गई है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

यकीनन टीवी चैनल ही इस अराजकता को फैलाने के गुनहगार हैं, जो अपनी टीआरपी बढ़ाने के लालच में आये दिन इसी तरह के विवाद पैदा करते रहते हैं। जानबूझ कर ऐसे विषयों को लेते हैं, जो विवादास्पद हों और ऐसे वक्ताओं को बुलाते हैं, जो उत्तेजक बयानबाजी करते हों। टीवी एंकर खुद सर्कस के जोकरों की तरह पर्दे पर उछल कूद करते हैं।

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जिस किसी ने बीबीसी के टीवी समाचार सुने होंगे उन्हें इस बात का खूब अनुभव होगा कि चाहे विषय कितना भी विवादास्पद क्यों न हो, कितना ही गंभीर क्यों न हो, बीबीसी के एंकर संतुलन नहीं खोते। हर विषय पर गहरा शोध करके आते हैं, और ऐसे प्रवक्ताओं को बुलाते हैं जो विषय के जानकार होते हैं। हर बहस शालीनता से होती है, जिसे देखकर दशर्कों को उत्तेजना नहीं होती, बल्कि विषय को समझने का संतोष मिलता है।

भारत के कुछ टीवी, न्यूज चैनलों के एंकर तो विषय के अनुसार परिधान भी बदल देते हैं। अगर चन्द्रयान चांद पर उतरने वाला हो तो ये कार्टून एस्ट्रोनेट की ड्रेस पहनकर चांद की सतह के ब्लोअप फोटो के सामने ऐसी कलाकारी दिखाते हैं, मानो कुछ ही क्षणों में खुद चांद पर उतरने वाले हैं। जब चन्द्रयान उतरने में नाकाम रहता है, तो ये र्मसयिा गाने लगते हैं जैसे मुर्दानी छा गई हो जबकि पत्रकार को संत कबीर दास जी की ये वाणी याद रखनी चाहिए, ‘दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।’

बिना राग-द्वेष के हर विषय को निष्पक्षता से प्रस्तुत करना, पैनल पर बैठे मेहमानों को अपनी बात कहने देना, नाहक विवाद को उठने से पहले रोक देना और कार्यक्रम का समापन, यदि संभव हो तो, समाधान के साथ करना। पर दुख की बात है कि आज भारत के अधिकतर टीवी चैनल इस आचार संहिता का पालन नहीं कर रहे जिसके लिए काफी हद तक मौजूदा केंद्र सरकार भी जिम्मेदार है, जो अपनी कमियां या आलोचना बर्दाश्त नहीं करती। नतीजतन, टीवी चैनलों के पास दो ही रास्ते बचते हैं : या तो सरकार का झूठा यशगान करें या इस तरह की उत्तेजक, बिना सिर पैर की बहस करवा कर टीआरपी बढ़ाएं।

जब भारत में कोई प्राइवेट टीवी चैनल नहीं था, तब 1989 में देश की पहली हिन्दी विडियो समाचार कैसेट ‘कालचक्र’ जारी करके मैंने टीवी पत्रकारिता के कुछ मानदंड स्थापित किए थे। बिना किसी औद्योगिक घराने या राजनैतिक दल की आर्थिक मदद के भी कालचक्र ने देश भर में तहलका मचा दिया था। हमने कालचक्र में जनहित के मुद्दों को गंभीरता से उठाया और उन पर देश के मशहूर लोगों से बेबाक बहस करवाई जिनकी चर्चा लगातार देश के हर अखबार में हुई। इसी तरह आज के साधन संपन्न टीवी चैनल अगर चाहें तो जनहित में अनेक गंभीर मुद्दों पर बहस करवा सकते हैं। जैसे नौकरशाही या लालफीताशाही पर, शिक्षा व्यवस्था पर, न्याय व्यवस्था पर, पुलिस व्यवस्था पर, अर्थव्यवस्था पर, पर्यावरण पर और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे अनेक अन्य विषयों पर गंभीर बहसें करवाई जा सकती हैं जिनके करने से देश के जनमानस में गहन मंथन होगा और उससे विचारों का जो नवनीत निकलेगा उससे समाज और राष्ट्र को लाभ होगा। आज की तरह देश में अराजकता, हिंसा और कुंठा नहीं फैलेगी।

रही बात धर्म चर्चा की तो इस बात का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिया जाना चाहिए कि उन्होंने हजारों साल पुराने वैदिक सनातन धर्म को देश की मुख्य धारा के बीच चर्चा में लाकर खड़ा कर दिया है जबकि पिछली सरकारें ऐसा करने से बचती रहीं जिसका परिणाम यह हुआ कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बहुसंख्यक हिंदू समाज अपने को उपेक्षित महसूस करता रहा। इसलिए आज वो अवसर मिलने पर इतना मुखर हो गया है कि धर्म के हर प्रश्न पर आक्रामकता के साथ सक्रिय हो जाता है। हम इस विवाद में नहीं पड़ेंगे कि नूपुर शर्मा ने जो कहा वो सही था या गलत। हम इस विवाद में भी नहीं पड़ेंगे कि भारत के विभिन्न धर्मावलम्बी अपने-अपने धर्म को लेकर क्या गलत और क्या सही कहते हैं। पर यह तो साफ है कि धर्म के सवाल पर टीवी चैनलों में और आम जनता के बीच भी जिस स्तरहीनता की बहस आजकल हो रही है, उससे न तो सनातन धर्म का लाभ हो रहा है, और न ही भारत हिंदू राष्ट्र बनने की तरफ बढ़ रहा है। इन बहसों से हिंदू समाज का ही नहीं, हर धर्म के मानने वालों का अहित हो रहा है जो एक डरावने भविष्य की ओर संकेत कर रहा है।

दुनिया के अनेक विशेषज्ञों ने तो भारत में भविष्य में गृह युद्व की संभावनाओं की भविष्यवाणी करनी शुरू कर दी है। यह हम जैसे सभी गंभीर नागरिकों और सनातनधर्मिंयों के लिए बहुत चिंता का विषय है। इसलिए सभी राजनैतिक दलों और संगठनों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे टीवी चैनलों पर विषयों के जानकार और गंभीर प्रवक्ताओं को ही भेजें। स्तरहीन डिबेट में अपने प्रतिनिधि भेजें ही नहीं, जो असंसदीय भाषा का प्रयोग करें। टीवी चैनलों को भी धर्म चर्चा में पोंगे पण्डितों, फर्जी धर्माचायरे और कठमुल्लों को न बुलाएं। धर्म के विषय पर अगर ये टीवी चैनल गंभीरता से बहस करवाएं तो समाज का बहुत लाभ हो सकता है। सदियों की उलझी हुई गुत्थियां सुलझ सकती हैं। भारत अपनी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत की पुन: स्थापना कर सकता है बशर्ते इन बहसों में धर्म के धुरंधर और विद्वान शामिल हों और उन्हें अपनी बात कहने दी जाए।

एंकर भी पढ़े-लिखे हों, मूर्ख नहीं हों, आत्ममुग्ध नहीं हों और विषय पर शोध करके आएं। इस तरह की बहसों से सरकार को भी कोई अपत्ति नहीं होगी। टीआरपी भी धीरे-धीरे बढ़ेगी और स्वास्थ्य समाज व राष्ट्र का निर्माण होगा। राष्ट्र निर्माण का दावा करने वाले संगठनों की सत्ता में भी अगर धर्म के विषयों पर ऐसी गंभीर बहसें नहीं होंगी तो फिर कब होंगी? इसलिए इन संगठनों को भी सोचना होगा कि क्या वे वाकई राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं, या आम लोगों की धार्मिंक भावनाओं का दोहन करके, केवल अपना राजनैतिक हित साधना चाहते हैं?

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