राजधानी दिल्ली के हिंसा प्रभावित जहांगीरपुरी इलाके में इमारतों को ध्वस्त करने की कार्रवाई पर अगले आदेश तक यथास्थिति कायम रखने के निर्देश देकर अदालत ने बड़ा संदेश दिया है।
शीर्ष अदालत ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका पर केंद्र सरकार व अन्य को नोटिस भी जारी किया। याचिका में दावा किया गया था कि दंगों के नाम पर मुस्लिमों के घरों व दुकानों को तोड़ा जा रहा है। गौरतलब है कि जहांगीरपुरी में हनुमान जयंती के दिन हिंदू संगठनों ने शोभायात्रा निकाली थी और वहां दोनों समुदायों के बीच काफी हिंसा हुई। इसके बाद भाजपा शासित उत्तरी दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी ) ने दिल्ली पुलिस की मदद से बुधवार को अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया था। इस अभियान के तहत इलाके में एक मस्जिद के पास कई पक्के और अस्थायी ढांचों को बुलडोजर की मदद से ढहा दिया गया था।
एनडीएमसी की इस बुलडोजर कार्रवाई को लेकर कई पक्षों में भारी नाराजगी देखी गई। कई दुकानदार और घरों के मालिकों के पास जमीन और दुकानों के वैध कागजात होने के बावजूद उनकी एक नहीं सुनी गई और ढांचों को जमींदोज कर दिया गया। जबकि अवैध ढांचे को गिराने से पहले नियम है कि जमीन मालिक को कम से कम 5 दिन पहले और ज्यादा-से-ज्यादा 15 दिन की समयसीमा के भीतर नोटिस जारी किया जाता है। यहां इस नियम की घोर अवहेलना की गई। सबकुछ इतनी जल्दी अंजाम दिया गया कि अवैध ढांचा गिराए जाने के साथ ही वैध ढांचे भी गिरा दिए गए। यहां तक कि सर्वोच्च अदालत के आदेश देने के बावजूद बुलडोजर अभियान इस तर्क के साथ जारी रहा कि आदेश की प्रति उन्हें प्राप्त नहीं हुई है।
हास्यास्पद तथ्य है कि डिजिटल युग में भी शीर्ष अदालत का आदेश संबंधित महकमे तक पहुंचने में पौने दो घंटे का वक्त लगा। दोबारा अदालत को बताया गया कि अभियान जारी है, इसके बाद अदालत ने फिर निर्देश जारी किया तब जाकर बुलडोजर पर ब्रेक लगाया गया। अदालत ने हालांकि देश भर में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ अभियान को सही करार दिया और ऐसी कार्रवाइयों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अलबत्ता, अदालत को अगली सुनवाई में उन लोगों के बारे में सोचना चाहिए जिनके आशियाने वैध दस्तावेज होने के बावजूद ढहा दिए गए। हां, दोषियों पर सख्ती भी जरूरी है।







