कुशेश्वरस्थान और तारापुर विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव खुले मैच की तरह है. कोई भी टीम जीत सकती है. JDU और RJD में जोरदार मुकाबला हुआ है। नतीजों को लेकर किए जा रहे दावे कुछ घंटों के बाद हकीकत में बदलने वाले हैं. वैसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि मतगणना में जो भी परिणाम आए उसे स्वीकार किया जाना चाहिए. मतदान के बाद वोटरों के मूड से कुछ संकेत उभरे हैं. इनके आधार पर नतीजों का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है.
इस बार दोनों विधानसभा क्षेत्रों में कुल 54 महिला मतदान केन्द्र बनाए गए थे. इन बूथों पर महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर वोट डाले. अन्य मतदान केन्द्रों पर महिलाओं की लंबी कतारें देखी गई थीं. अभी तक के चुनावी ट्रेंड के मुताबिक महिला वोटरों का समर्थन नीतीश कुमार को मिलते रहा है. पिछले कुछ चुनावों में महिलाएं नीतीश कुमार की जीत में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं. चूंकि वर्ष 2020 की तुलना में इस बार मतदान प्रतिशत कम है, ऐसे में महिला वोटरों का टर्नआउट अहम साबित हो सकता है. तारापुर में 51.87 फीसदी वोट पड़े हैं. इनमें पुरुष वोटरों की भागीदारी 45.72 फीसदी ही रही, जबकि महिलाओं का मतदान प्रतिशत 50.19 रहा. यानी करीब 5 फीसदी महिलाओं ने अधिक वोट किए. माना जा रहा है कि कुशेश्वरस्थान में जदयू को सहानुभूति वोट भी मिले हैं. जदयू उम्मीदवार अमन हजारी ने अपने दिवंगत पिता शशिभूषण हजारी के असामयिक निधन को इस चुनाव में भावनात्मक मुद्दा बनाया था.
लालू यादव के आने से राजद को फायदा?
लालू यादव के चुनाव प्रचार में उतरने से राजद को फायदा मिलता दिख रहा है. लालू यादव की चुनावी सभाओं में जबर्दस्त भीड़ उमड़ी थी. तबीयत खराब होने के बाद भी वह चुनाव प्रचार के लिए आए थे. उनको देखने-सुनने के लिए लोग बेहद उत्सुक थे. चुनाव में हार-जीत अलग बात है, लेकिन चुनावी रैलियों से लालू यादव ने समां बांध दिया था. हालांकि, कांग्रेस के पक्ष में हुई वोटिंग को राजद के लिए झटका माना जा रहा है. कांग्रेस को भी भाजपा विरोधी वोट ही मिले हैं. अगर कांग्रेस अलग होकर चुनाव नहीं लड़ती तो जाहिर हे ये वोट राजद को ही मिलते. मतदान के बाद मिले संकेतों के मुताबिक कांग्रेस को अनुसूचित जाति समुदाय के एक बड़े हिस्से का समर्थन मिला है. एससी वोट के बंटने से राजद को नुकसान की संभावना जताई जा रही है. कन्हैया कुमार ने कुशेश्वरस्थान और तारापुर में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार किया था, लेकिन मतदान के दौरान कांग्रेस को वह फायदा नहीं मिलता दिखा जिसकी उम्मीद की जा रही थी. इसका दूसरा पहलू यह है कि कांग्रेस को जितने भी वोट मिलेंगे वह राजद की हकमारी होगी.
क्या राजद को शक है?
मतगणना से पहले तेजस्वी यादव और राजद के दूसरे नेताओं में व्यग्रता दिख रही है. जिस तरह से वे मतगणनाकर्मियों की निगरानी की बात कह रहे हैं, उससे लगता है कि उनके मन में कोई खटका है. कौन मतदानकर्मी अनुबंध पर बहाल है और कौन नियमित है? इस बात का आकलन करने से क्या मिलने वाला है? क्या उन्हें काउंटिंग में गड़बड़ी की आशंका है? एनडीए का आरोप है कि राजद की यह व्याकुलता उसके संभावित हार की निशानी है. एनडीए के कुछ नेताओं का कहना है कि राजद मतगणना केन्द्र की निगरानी की बात इसलिए कर रहा है, ताकि उसे दोनों स्थितियों में बयान देने की सुविधा मिल जाए. अगर हार गए तो आरोप लगा देंगे कि काउंटिंग में धांधली हो गई और यदि जीत गए तो कह देंगे कि हमारी मुस्तैदी के कारण वोट का अपहरण नहीं हो सका. सत्तारुढ़ गठबंधन के समर्थकों का कहना है कि एक तरफ राजद जीत का दावा भी कर रहा है और दूसरी तरफ काउंटिंग में गड़बड़ी की आशंका भी जता रहा है. इन परस्पर विरोधी बातों से राजद की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है.
नीतीश सरकार के बहुमत पर असर नहीं
तेजस्वी यादव का दावा है कि उपचुनाव की दोनों सीटें जीत कर वे नई सरकार बनाएंगे. जब जीत का इतना आत्मविश्वास है तो फिर मतगणना में धांधली की आशंका क्यों जता रहे हैं. उन्होंने कहा कि अगर प्रशासन ने मतों की गिनती में गड़बड़ी की कोशिश की तो वे उसी समय आंदोलन छेड़ देंगे. राजद आरोप लगाता रहा है कि साल 2020 में उसे करीब 8-10 सीटों पर इसलिए हार झेलनी पड़ी थी क्योंकि सरकार के इशारे पर प्रशासन ने काउंटिंग में हेरफेर की थी. हिलसा सीट पर राजद प्रत्याशी की सिर्फ 12 मतों से हार हुई थी. इसलिए वह इस बार पहले से मुस्तैद है. अगर राजद दोनों सीटों पर जीत भी जाता है तो फिलहाल नीतीश सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है. हां, इस जीत से उसे नैतिक बढ़त जरूर मिल जाएगी. 243 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 122 का आंकड़ा चाहिए. नीतीश सरकार को अभी 126 विधायकों का समर्थन हासिल है.
RJD के दावे में कितना दम ?
साल 2020 में एनडीए को 125 सीटों पर जीत मिली थी. बाद में बसपा के जमां खान और लोजपा के राजकुमार सिंह जदयू में आ गए थे. निर्दलीय विधायक सुमित सिंह ने एनडीए को समर्थन दिया, जिसकी वजह से वह मंत्री हैं. उपचुनाव की दोनों सीटें जदयू की हैं. अगर वह फिर जीत गया तो नीतीश सरकार को 128 विधायकों का समर्थन हासिल हो जाएगा. अगर इन दोनों सीटों पर राजद को जीत मिलती है तो उसके विधायकों की संख्या 75 से 77 हो जाएगी. अगर कांग्रेस का समर्थन (अगर देती है तब) जोड़ दिया जाय तो महागठबंधन का आंकड़ा 112 तक ही पहुंचता है. उसे 10 और विधायकों के समर्थन के लिए एआईएमआईएम, हम और वीआईपी की शरण में जाना होगा, लेकिन जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी के एनडीए छोड़ने की फिलहाल कोई संभावना नहीं दिख रही है. ऐसे में तेजस्वी का दावा अभी अपरिपक्व ही माना जाएगा. वैसे सारी संभावनाएं अंतिम नतीजे पर निर्भर करती हैं.







