केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने रविवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री का कार्यभार संभाल लिया। अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की। इससे एक दिन पहले शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। प्रह्लाद जोशी के पास पहले से ही उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय की जिम्मेदारी है। अब उन्हें शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को अपने पद से इस्तीफा दिया था। उनका इस्तीफा ऐसे समय आया जब देशभर में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में छात्र प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारी नीट पेपर लीक विवाद को लेकर धर्मेंद्र प्रधान को पद से हटाने की मांग कर रहे थे।
भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं केवल रोजगार या उच्च शिक्षा में प्रवेश का माध्यम नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों की आकांक्षाओं का आधार हैं। एक छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम करता है, परिवार अपनी बचत को कोचिंग, पुस्तकों और रहने-खाने पर खर्च करता है और पूरा भविष्य एक परीक्षा पर टिका होता है।
ऐसे में जब प्रश्नपत्र लीक होने या परीक्षा में अनियमितताओं की खबर सामने आती है तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता कठघरे में खड़ी हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों में देश ने अनेक बड़े पेपरलीक और परीक्षा विवाद देखे हैं। राजस्थान की रीट, उत्तर प्रदेश की यूपीटेट, विभिन्न राज्यों की पुलिस एवं कर्मचारी चयन आयोगों की भर्ती परीक्षाएं, एसएससी से जुड़े विवाद, यूजीसी-नेट परीक्षा का रद होना तथा नीट पेपरलीक जैसी एक के बाद एक घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि समस्या किसी एक राज्य या संस्था तक सीमित नहीं है।
वस्तुतः पेपरलीक की समस्या राजनीतिक से कहीं अधिक नीतिगत और संरचनात्मक विफलता का परिणाम है। इसलिए इसका समाधान भी राजनीतिक नारों में नहीं, बल्कि व्यापक नीतिगत सुधारों में तलाशना होगा। नीट पेपरलीक की घटना केवल परीक्षा संचालन में हुई एक चूक नहीं है। जब तक इसके मूल कारण को नहीं समझा जाएगा, तब तक केवल सख्ती, गिरफ्तारी, प्रशासनिक कार्रवाई या एक मंत्री के इस्तीफे से समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चे को डाक्टर बनाने के सपने के लिए वर्षों तक लाखों रुपये कोचिंग पर खर्च करता है।
अनेक परिवार अपनी क्षमता से कहीं अधिक आर्थिक बोझ उठाते हैं। जब सफलता की संभावना अत्यंत सीमित हो और प्रतिस्पर्धा अत्यधिक तीव्र हो, तब कुछ लोग गलत रास्तों की ओर भी आकर्षित हो जाते हैं। पेपरलीक और परीक्षा माफिया इसी विकृत व्यवस्था की उपज है। इसलिए इन घटनाओं को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना पर्याप्त नहीं होगा। दरअसल यह समस्या उस शिक्षा व्यवस्था का परिणाम भी है, जिसमें मेडिकल प्रवेश परीक्षा धीरे-धीरे विद्यालयी शिक्षा से अलग एक समानांतर व्यवस्था बन चुकी है।
आज देश में सीबीएसई, आइसीएसई और विभिन्न राज्य बोर्डों के लाखों विद्यार्थी बारहवीं कक्षा की पढ़ाई करते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा का स्वरूप और तैयारी की पद्धति इन बोर्डों की नियमित पढ़ाई से काफी अलग हो चुकी है। इसी विसंगति ने देश में कोचिंग उद्योग को असाधारण रूप से विस्तार दिया है। समस्या का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मेडिकल शिक्षा में उपलब्ध सीटों और अभ्यर्थियों की संख्या के बीच लगातार बढ़ती खाई है।
हर वर्ष लाखों विद्यार्थी मेडिकल कालेजों में प्रवेश की परीक्षा नीट देते हैं, जबकि सरकारी मेडिकल कालेजों में सीटों की संख्या सीमित है। निजी मेडिकल कालेजों में सीटें अपेक्षाकृत अधिक हैं, लेकिन उनकी फीस इतनी अधिक है कि अधिकांश परिवारों के लिए वहां प्रवेश लेना संभव नहीं होता। परिणामस्वरूप कुछ अंकों का अंतर लाखों विद्यार्थियों के पूरे भविष्य का फैसला कर देता है। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक है कि एक प्रवेश परीक्षा का महत्व असामान्य रूप से बढ़ जाए।
जब पूरा भविष्य एक ही परीक्षा पर निर्भर हो और अवसर सीमित हों तो भ्रष्ट तत्वों के लिए भी अवैध कमाई के अवसर पैदा होते हैं। अब समय आ गया है कि मेडिकल प्रवेश व्यवस्था में व्यापक सुधारों पर गंभीरता से विचार किया जाए। जैसे कि विद्यालयी शिक्षा और नीट के पाठ्यक्रम के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करना होना चाहिए। यदि बारहवीं कक्षा में पढ़ाया जाने वाला विषय ही प्रवेश परीक्षा की वास्तविक तैयारी का आधार बने तो विद्यार्थियों का ध्यान स्वाभाविक रूप से विद्यालय की पढ़ाई पर लौटेगा।
इससे डमी स्कूलों की प्रवृत्ति घटेगी, कोचिंग पर अत्यधिक निर्भरता कम होगी और विद्यालयों की शैक्षणिक भूमिका फिर से मजबूत होगी। प्रवेश प्रक्रिया केवल एक दिन की परीक्षा तक सीमित न रहे। विद्यालयी प्रदर्शन, व्यावहारिक कौशल और निरंतर शैक्षणिक उपलब्धियों को भी उचित महत्व देने पर विचार किया जा सकता है। इससे विद्यार्थियों पर एक ही परीक्षा का अत्यधिक मानसिक दबाव कम होगा। केवल मेडिकल कालेजों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। सरकारी कालेजों में सीटें बढ़ाने, निजी मेडिकल कालेजों की फीस को अधिक पारदर्शी और संतुलित बनाने तथा शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। जब अवसर बढ़ेंगे, तभी असामान्य प्रतिस्पर्धा का दबाव कम होगा।
परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से अधिक सुरक्षित बनाना होगा। प्रश्नपत्रों का डिजिटल एन्क्रिप्शन, सुरक्षित इलेक्ट्रानिक वितरण, बहु-स्तरीय प्रमाणीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी तथा प्रत्येक स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही जैसी व्यवस्थाएं आज पूरी तरह संभव हैं। जिस देश ने आधार, यूपीआइ और विश्वस्तरीय डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना विकसित की है, वह अपनी परीक्षा प्रणाली को भी सुरक्षित और पारदर्शी बना सकता है। जब तक ऐसे अपराधों से जुड़े नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे, तब तक केवल नए नियम कानून बना देने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे।






