पिछले एक महीने में राष्ट्रीय राजनीति तथा संसद का समीकरण जिस तरह से बदला है उसकी कल्पना किसी को नहीं थी। क्या भाजपा या राजग विरोधी दलों, नेताओं में से किसी ने सोचा था कि बंगाल का चुनाव परिणाम आते ही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस टूट जाएगी और उसके 28 में से 20 लोकसभा सदस्य अलग समूह बनाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के समर्थन की घोषणा करेंगे?
इस सिलसिले की शुरुआत आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में शामिल होने से हुई। टीएमसी के राज्यसभा सदस्यों के भी इस्तीफे हो रहे हैं। एक तरह से ममता बनर्जी का खुद की तृणमूल पर कोई अधिकार नहीं रह गया है। उद्धव ठाकरे की बची-खुची शिवसेना भी उनके हाथ से फिसलती जा रही है।
बीते दिनों उनके छह सांसद राजग के साथ चले गए। पहले भी कुछ सांसद एवं विधायक एक दल छोड़कर दूसरी ओर गए हैं, लेकिन इस तरह की घटना राष्ट्रीय राजनीति में पहले कभी नहीं हुई। माहौल ऐसा बन गया है कि अनेक पार्टियों के शीर्ष नेता दिन-रात इस भय में हैं कि पता नहीं उनके कितने सांसद या विधायक अचानक साथ छोड़कर दूसरी ओर जाने की घोषणा कर दें।
पहली दृष्टि में ऐसा लगता है कि भाजपा अंदर ही अंदर नेताओं को दल-बदल के लिए तैयार करा रही है, पर क्या यही सच है?
कांग्रेस या अन्य पार्टियां भाजपा पर भले आरोप लगाएं, किंतु इस प्रक्रिया से उन सबको भयभीत होना चाहिए, जो बदलते हुए सामूहिक राष्ट्रीय मानस और धारा के विपरीत काम कर रहे हैं।
विपक्ष के इस आरोप को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि भाजपा ने ईडी, सीबीआइ, इनकम टैक्स और अन्य दबावों से यह स्थिति पैदा की है। इतनी बड़ी संख्या में सांसद और विधायक वर्षों का साथ छोड़कर सीधे भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ जा रहे हैं तो यह परिघटना सामान्य नहीं मानी जाएगी। इनमें से कितने सांसद, विधायक होंगे जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले हैं?
सारे सांसदों, विधायकों में से बहुत कम पर भ्रष्टाचार या अपराध के संगीन मामले हैं। बदलते घटनाक्रम में शरद पवार और सुप्रिया सुले के कदमों ने जता दिया है कि इन सबमें बुद्धिमान वही निकले। अगर शरद पवार ने राजग के साथ जाने का संकेत नहीं दिया होता तो उनके आठ में से छह सांसद और सभी दसों विधायक साथ छोड़कर चले जाते।
हालांकि शरद पवार ने राष्ट्रीय स्तर पर बदलती राजनीति, जनमानस और धारा को समझने में काफी देर की। अगर वह पहले समझ गए होते और महाविकास आघाड़ी या आइएनडीआइए के सपने में नहीं जीते तो उनकी पार्टी एक होती और शीर्ष नेता वही माने जाते।
सांसदों-विधायकों के टूटने की घटना को गत 17 अप्रैल को 131वें संविधान संशोधन विधेयक के लोकसभा में गिर जाने से भी जोड़कर देखा जा रहा है। यानी विपक्षी दलों के सांसदों के अंदर भय पैदा हो गया है कि महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण का हमने समर्थन नहीं किया और विरोध में चले गए तो हम कभी जीत नहीं पाएंगे, किंतु इसी कारण केवल सांसद और विधायक भाजपा या राज्य की ओर आ रहे हों, यह मान लेना भी पूरी स्थिति का सामान्य विश्लेषण होगा।
बंगाल के बारे में कहा जा सकता है कि वहां सत्ता में आने वाली पार्टी लंबे समय रहती है और पूर्ववर्ती सत्तारूढ़ पार्टी लगभग समाप्त हो जाती है। इसलिए जिन सांसदों, विधायकों को लग रहा है कि अब तृणमूल कांग्रेस का समय गया तो वे उसका साथ छोड़ रहे हैं। हालांकि यह भी एक कारण हो सकता है, पर संपूर्ण नहीं।
कई बार हम तात्कालिक परिणाम या घटनाओं के विश्लेषण में बहुत सारे तथ्यों की अनदेखी कर देते हैं। दरअसल 2014 का चुनाव परिणाम भारतीय राजनीति में युगांतकारी परिवर्तन का संकेतक था। राष्ट्र-भाव की प्रबल भूमिका उसमें स्पष्ट दिख रही थी और आगे भी उतार-चढ़ाव के साथ भाजपा की विजय में इस एक कारक की अंततः प्रमुख भूमिका रही है।
बंगाल में हिंदुओं के बहुत बड़े वर्ग ने ममता बनर्जी की मुस्लिमपरस्त और हिंदू विरोधी राजनीति के विरुद्ध विद्रोह कर भाजपा के पक्ष में मतदान किया। विपक्ष ने 2024 लोकसभा चुनाव परिणाम का अपने अनुसार गलत आकलन किया। राहुल गांधी ने कह दिया कि हमने अयोध्या मूवमेंट को हरा दिया।
अखिलेश यादव वहां के सांसद अवधेश प्रसाद को लोकसभा में आगे बिठाकर भाजपा को चिढ़ाते रहे। देश में इसकी प्रतिक्रिया हुई, जो बाद में महाराष्ट्र, हरियाणा से लेकर दिल्ली आदि के चुनाव परिणाम में स्पष्ट दिखी भी।
किसी सरकार से न हर कोई संतुष्ट होता है और न केवल उसके पास उपलब्धियां ही होती हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों से सामाजिक न्याय का स्वरूप बदला है और आम लोगों तक उसके लाभ पहुंचे हैं, जिनमें महिलाएं आगे हैं। इसी तरह देश में आधारभूत संरचना के निर्माण के साथ विकास के काम भी लोग सामने देख रहे हैं।
विपक्षी पार्टियों ने मुस्लिम वोट के लिए वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध किया। मतदाताओं में इसका संदेश विपरीत गया। लोगों के मन में यह भाव गहरा रहा है कि भाजपा जैसी भी हो, भारतीयता के लिए अंततः खड़ी होती है। विपक्षी दल हमारे धर्म, संस्कृति, सभ्यता, विरासत, भारत की पहचान और इन सबके साथ हमारी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाएंगे। इस प्रक्रिया को नहीं समझने वाले विपक्षी नेता अपनी पार्टी को कमजोर कर रहे हैं।







