प्रशांत किशोर का कहना है कि अगर राजनीति में नई राह बनानी है तो बांकीपुर के लोगों को जाति और धर्म से ऊपर उठ कर वोट देना होगा। उपदेश देना आसान है लेकिन उस पर अमल करना बहुत ही मुश्किल। आदर्शवाद का उदाहरण पहले उन्हें खुद पेश करना चाहिए था। फिर जनता से उम्मीद करनी चाहिए थी। लेकिन वे ऐसा नहीं कर पा रहे। आम लोगों को सीख देने वाले प्रशांत किशोर खुद जाति के नाम पर मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं। बिलौटी (भोजपुर) जाकर भरत तिवारी के परिजनों से मुलाकात कर ब्राह्मण कार्ड खेला।
अभी जांच रिपोर्ट आई भी नहीं है और वे उपचुनाव में भरत तिवारी को शहीद बता रहे हैं। करबिगहिया में बंटी यादव की मां से मिल कर ले यह बता रहे हैं कि पुलिस, गमछे का हरा रंग देख कर गोली मार रही है। निशाना सम्राट चौधरी पर है। उन्होंने कहा था कि आई हरा रंग के गमछा वालों को तुरंत पकड़ लेगा। यहां हरा रंग का गमछा का प्रयोग परोक्ष रूप से राजद के लिए किया गया है।
जब चुनाव आया तो भरत तिवारी को शहीद बता रहे प्रशांत
प्रशांत किशोर की पदयात्रा के दौरान एक ऐसा भी पोस्टर दिखा था जिसमें भरत तिवारी को शहीद के रूप में दर्शाया गया था। यानी प्रशांत किशोर भरत तिवारी के एनकाउंटर को गलत और उन्हें शहीद मानते हैं। भरत तिवारी को शहीद बता कर वे बांकीपुर के ब्राह्मण वोटरों की भावनाओं को इतना झकझोरना चाहते हैं। वे भाजपा से टूट कर जन सुराज की तरफ आ जाएं।
प्रशांत किशोर की नजर करबिगहिया के बंटी यादव हत्याकांड पर भी है। वे यादव और पिछड़े वोटरों पर प्रभाव जमाने के लिए इस घटना को ‘हरे गमछे’ पर अत्याचार के रूप में पेश कर रहे हैं। अब यादव वोटर राजद को छोड़ कर उनका साथ दें या न दें, लेकिन ‘हरा गमछा’ के नैरेटिव को गढ़ कर वे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के खिलाफ माहौल जरूर बना रहे हैं।
क्या जाति कार्ड खेलने से प्रशांत किशोर को फायदा मिलेगा?
क्या प्रशांत किशोर बांकीपुर में जाति का कार्ड खेल कर कोई राजनीतिक लाभ ले पाएंगे? पिछले चुनाव में तो वे जातीय समीकरण साधने में विफल रहे थे। आंकड़ों के माहिर प्रशांत किशोर ने सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए सभी 241 सीटों सर्वे किया था। इस सर्वे के आधार पर ही टिकट दिए गए।
शुरू की दो सूचियों में कुल 116 उम्मीदवार थे। इनमें सबसे अधिक 31 अति पिछड़ा वर्ग के प्रत्याशी थे। आबादी के हिसाब से बिहार में अति पिछड़े वोटरों की संख्या सबसे अधिक है। बाद में जनसुराज ने कुल 238 सीटों पर चुनाव लड़ा। इनमें से 236 पर उसकी जमानत जब्त हो गई। अगड़ा-पिछड़ा कोई कार्ड काम न आया।
2025 में मुस्लिम वोटरों ने भी नकार दिया था प्रशांत किशोर को
इसी तरह जन सुराज के 116 में 21 उम्मीदवार मुस्लिम वर्ग के थे। मुसलमान वोटरों को लुभाने के लिए प्रशांत किशोर ने टोपी भी पहनी थी। आबादी के हिसाब से उनको राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की बात कही थी। लेकिन नतीजा क्या निकला? सरफराज आलम अररिया के पूर्व सांसद थे और जोकीहाट से चार बार विधायक रहे थे।
2025 में वे जन सुराज के टिकट पर जोकीहाट से लड़े थे। मुस्लिम वोटरों ने प्रशांत किशोर पर बिल्कुल भरोसा नहीं किया और सरफराज आलम को तीसरे नंबर पर धकेल दिया। बाकी मुस्लिम उम्मीदवारों का तो और भी बुरा हाल रहा।
कथनी और करनी में अंतर- 2025 में 108 उम्मीदवारों पर आपराधिक मुकदमे
कथनी और करनी में अंतर होने के कारण अब वोटर प्रशांत किशोर पर शायद ही भरोसा करते हैं। प्रशांत किशोर कहते हैं जब तक पढ़े-लिखे और वैचारिक रूप से अच्छे लोग राजनीति में नहीं आएंगे, तब तक बिहार का भविष्य नहीं बदल सकता। उनका तर्क था, राजनीतिक दल अच्छे लोगों को टिकट दें तभी बदलाव आएगा। साफ-सुथरी राजनीति का दावा करने वाले प्रशांत किशोर ने खुद क्या किया?
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में जनसुराज के 233 उम्मीदवारों में से 108 पर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। 12 उम्मीदवारों पर हत्या का आरोप और 25 पर हत्या के प्रयास का आरोप लगा था। 14 उम्मीदवारों पर महिला उत्पीड़न से संबंधित केस चल रहा था। ऐसे में सवाल उठता है कि प्रशांत किशोर की आदर्शवादी बातों पर भला कौन भरोसा करेगा?







