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विश्व जनसंख्या दिवस : हर हाथ को अवसर, हर जीवन को सम्मान…………….

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July 11, 2026
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विश्व जनसंख्या दिवस : हर हाथ को अवसर, हर जीवन को सम्मान…………….
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दस वर्ष पूर्व जहां बढ़ती जनसंख्या पूरी दुनिया के लिए चिंता थी, वहीं आज घटती जनसंख्या को लेकर मंथन किए जा रहे हैं। इस संदर्भ में इस शताब्दी की शुरुआत में फ्रांस समेत यूरोप के कई देशों की जनसंख्या संबंधी नीति का स्मरण हो आता है। उन देशों में बच्चे पैदा करने, विशेष तौर पर तीसरे बच्चे, के लिए अनेकानेक प्रोत्साहन-जैसे सवेतन अवकाश, रेल यात्रा में छूट, सरकारी परिलाभ आदि प्रचलित थे। उस समय भारत जहां बढ़ती आबादी से जूझ रहा था, वहीं वे देश घटती जन्म दर और प्रवासी श्रमिकों पर बढ़ती निर्भरता को लेकर चिंतित थे। हालांकि, भारत दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाला देश हो गया है, किंतु वर्तमान युवा पीढ़ी की संतानोत्पत्ति के प्रति बढ़ती बेरुखी के चलते, आने वाला समय निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण होने वाला है।

संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया में पिछले बीस वर्षों में बाल विवाह की दर आधी रह गई है। इसकी बड़ी वजह युवाओं का शिक्षा की ओर बढ़ता रुझान, बेरोजगारी, आवास की लागत और समाज की बदलती सोच है। दुनिया के कई देशों में युवा शादी से दूरी बना रहे हैं। इसके पीछे अच्छा जीवनसाथी या स्थायी नौकरी न मिलना, आर्थिक परेशानियां और निजी आजादी में कमी का डर जैसे कारण हैं। यह सभ्यता के लिए सकारात्मक लक्षण नहीं है। जीने की औसत आयु और स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता में बढ़ोतरी और सामाजिक परिवर्तन के चलते बच्चे पैदा करना अब लोगों की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है। इसके अलावा, संकोच और सामाजिक वर्जनाओं के कारण परिवारों में शादी, यौन संबंध, गर्भधारण और मातृत्व जैसे विषयों पर खुलकर बात नहीं हो पाती। यही बंधन विद्यालयों में भी है। नतीजतन, हर स्तर पर लोगों के अपने अलग-अलग विचार हैं। इन विषमताओं को देखते हुए अब युवाओं के लिए रुकावटें खड़ी करने के बजाय नए विकल्प तैयार करने की सोच पर जोर दिया जा रहा है। अस्सी के दशक में फैमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया के डॉ. महिंदर वात्सा और अवाबाई वाडिया व नेशनल वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन की ओर से विद्यालयों में पारिवारिक जीवन शिक्षा के तहत इन विषयों हेतु अभियान चलाया गया था, पर वह परवान न चढ़ सका। वर्तमान सरकार ने नई शिक्षा नीति के तहत इस विषय को प्रमुखता से प्रसारित करने की मंशा जाहिर की है। युवा से वृद्ध होती आबादी के लिए चीन और जापान के उदाहरण नजीर हैं कि समय रहते कदम उठाए जाने चाहिए।

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इसी वजह से इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र ने विश्व जनसंख्या दिवस की थीम युवाओं की इच्छाओं और जरूरतों पर केंद्रित रखी है, ताकि वे अपने अधिकारों का सही उपयोग करते हुए अपनी पसंद का बेहतर भविष्य बना सकें। आवश्यकता युवा संवाद द्वारा युवाओं में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करते हुए आने वाली संतति के लिए उपयुक्त वातावरण और अवसर के प्रति आश्वस्त करने की है। सामाजिक बदलावों के कारण परिवारों में आपसी विश्वास व समझ कम हुई है, जिससे दूरी और टकराव बढ़ा है। ऐसे में, कुटुंब प्रबोधन के जरिये परिवार की ताकत का एहसास कराना और दूरियों को कम करना जरूरी है, ताकि तेजी से हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव की गति को रोका जा सके। हर व्यक्ति को इस विषय पर जागरूक होकर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

हर हाथ को अवसर, हर जीवन को सम्मान

हर वर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस (World Population Day) मनाया जाता है। यह दिन केवल बढ़ती जनसंख्या पर चिंता व्यक्त करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह इस बात पर भी विचार करने का समय है कि प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान और न्याय कैसे उपलब्ध कराया जाए। वर्ष 2026 में विश्व जनसंख्या दिवस का संदेश विशेष रूप से समावेशी समाज (Inclusive Society) के निर्माण पर केंद्रित है, जहाँ प्रत्येक नागरिक अपनी क्षमता का पूर्ण विकास कर सके।

पीएम मोदी का संदेश
इसी संदर्भ में भारत के विधायी विभाग (Legislative Department) ने भी यह संदेश दिया है कि वह न्याय, समानता और विधि के शासन (Rule of Law) को मजबूत करने वाले विधायी ढांचे के निर्माण के लिए निरंतर कार्य कर रहा है, जिससे भारत की विकास यात्रा और अधिक सशक्त बन सके। यह दृष्टिकोण प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO India) द्वारा भी समय-समय पर व्यक्त किए गए “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के सिद्धांत के अनुरूप है।

विश्व जनसंख्या दिवस का इतिहास
विश्व जनसंख्या दिवस मनाने की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने वर्ष 1989 में की थी। इसकी प्रेरणा 11 जुलाई 1987 को मिली, जब विश्व की जनसंख्या पाँच अरब के आंकड़े तक पहुँच गई थी। इसे “फाइव बिलियन डे” कहा गया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने निर्णय लिया कि हर वर्ष 11 जुलाई को जनसंख्या से जुड़े मुद्दों पर वैश्विक जागरूकता बढ़ाई जाएगी। इस दिवस का उद्देश्य केवल जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि जनसंख्या की गुणवत्ता, मानव विकास, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, शिक्षा, रोजगार, महिलाओं के अधिकार और सतत विकास जैसे विषयों पर भी ध्यान केंद्रित करना है।

भारत: विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश
भारत आज विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। यह स्थिति केवल चुनौती नहीं, बल्कि एक बड़ा अवसर भी है। भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है, जिसे “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहा जाता है। यदि इन युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार और स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ, तो यही जनसंख्या देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। लेकिन यदि संसाधनों का समान वितरण नहीं हुआ, तो यही जनसंख्या बेरोजगारी, गरीबी, असमानता और सामाजिक तनाव जैसी समस्याओं को जन्म दे सकती है। इसलिए जनसंख्या प्रबंधन का अर्थ केवल परिवार नियोजन नहीं, बल्कि मानव संसाधन का समुचित विकास भी है।

समावेशी समाज क्यों आवश्यक है?
समावेशी समाज का अर्थ है ऐसा समाज जहाँ किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति या शारीरिक क्षमता के आधार पर भेदभाव न हो। प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर प्राप्त हों और वह सम्मानपूर्वक जीवन जी सके। समावेशी विकास के प्रमुख आधार हैं-
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ
महिलाओं का सशक्तिकरण
दिव्यांगजन के अधिकार
बुजुर्गों की सुरक्षा
सामाजिक न्याय
आर्थिक अवसरों की समान उपलब्धता
डिजिटल समावेशन
जब समाज का प्रत्येक वर्ग विकास की मुख्यधारा से जुड़ता है, तभी राष्ट्र का विकास संतुलित और स्थायी बनता है।

न्यायपूर्ण कानूनों की भूमिका
किसी भी लोकतांत्रिक देश की मजबूती उसके संविधान और कानूनों पर निर्भर करती है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा का अधिकार देता है। इन्हीं मूल्यों को व्यवहार में लागू करने के लिए संसद समय-समय पर नए कानून बनाती है और पुराने कानूनों में संशोधन करती है। विधायी विभाग का दायित्व है कि ऐसे कानून तैयार किए जाएँ जो समय की आवश्यकताओं के अनुरूप हों और समाज के कमजोर वर्गों को भी न्याय दिला सकें। भारत में हाल के वर्षों में अनेक ऐसे कानून और सुधार किए गए हैं जिनका उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना और न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है।
विधि का शासन (Rule of Law) क्यों महत्वपूर्ण है?
विधि का शासन लोकतंत्र की आधारशिला है। इसका अर्थ है कि देश में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। सभी नागरिक, संस्थाएँ और सरकार स्वयं भी कानून के दायरे में कार्य करती हैं। विधि का शासन सुनिश्चित करता है कि-
प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष न्याय मिले।
कानून सभी पर समान रूप से लागू हो।
भ्रष्टाचार पर नियंत्रण हो।
निवेश और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिले।
नागरिकों का शासन व्यवस्था पर विश्वास बना रहे।
जब कानून मजबूत होते हैं, तब समाज में स्थिरता आती है और विकास की गति तेज होती है।

जनसंख्या और सतत विकास
विश्व जनसंख्या दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि बढ़ती आबादी के साथ प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी बढ़ता है। जल, भूमि, ऊर्जा, खाद्यान्न और पर्यावरण का संतुलित उपयोग अत्यंत आवश्यक है। यदि जनसंख्या वृद्धि के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, तो सतत विकास (Sustainable Development) का लक्ष्य प्राप्त करना कठिन हो जाएगा। इसलिए संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में गरीबी उन्मूलन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वच्छ जल, स्वास्थ्य और जलवायु संरक्षण जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई है।

महिलाओं का सशक्तिकरण
विश्व जनसंख्या दिवस का एक महत्वपूर्ण संदेश महिलाओं के अधिकारों से भी जुड़ा है। जब महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार और निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलती है, तब परिवार और समाज दोनों अधिक समृद्ध होते हैं। महिला सशक्तिकरण के प्रमुख लाभ-
मातृ मृत्यु दर में कमी
बाल स्वास्थ्य में सुधार
परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता
आर्थिक विकास में महिलाओं की भागीदारी
लैंगिक समानता को बढ़ावा

युवाओं की भूमिका
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका युवा वर्ग है। यदि युवाओं को आधुनिक शिक्षा, तकनीकी कौशल, स्टार्टअप, नवाचार और रोजगार के अवसर मिलते हैं, तो भारत विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है। नई शिक्षा नीति, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी पहलें इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
स्वास्थ्य और जनसंख्या
स्वस्थ नागरिक ही विकसित राष्ट्र की नींव होते हैं। विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच पर विशेष बल दिया जाता है। आवश्यक है कि-
प्रत्येक गर्भवती महिला को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ मिलें।
बच्चों का पूर्ण टीकाकरण हो।
पोषण अभियान को मजबूत बनाया जाए।
किशोर स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हो।

शिक्षा: सबसे बड़ा निवेश
किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसकी शिक्षित जनसंख्या होती है। शिक्षा न केवल रोजगार के अवसर बढ़ाती है, बल्कि नागरिकों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक बनाती है। डिजिटल शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और उच्च शिक्षा तक समान पहुँच विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
विकसित भारत 2047 की दिशा
भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति तभी संभव है जब-
जनसंख्या को मानव संसाधन में बदला जाए।
कानून पारदर्शी और प्रभावी हों।
न्याय सभी तक पहुँचे।
महिलाओं और युवाओं को समान अवसर मिलें।
पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक विकास हो।
समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचे।

नागरिकों की जिम्मेदारी
विश्व जनसंख्या दिवस केवल सरकारों के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए भी जिम्मेदारी का संदेश है।
हमें-
परिवार नियोजन के प्रति जागरूक होना चाहिए।
बाल विवाह का विरोध करना चाहिए।
बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए।
महिलाओं का सम्मान करना चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण में योगदान देना चाहिए।
कानूनों का पालन करना चाहिए।
सामाजिक समरसता बनाए रखनी चाहिए।

समावेशी विकास की राह पर भारत
विश्व जनसंख्या दिवस हमें यह समझाता है कि किसी देश की वास्तविक शक्ति उसकी जनसंख्या की संख्या में नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और अवसरों में निहित होती है। यदि प्रत्येक नागरिक को समान अवसर, न्याय और सम्मान मिले, तो वही जनसंख्या राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी बन जाती है। भारत आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ उसकी युवा आबादी, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएँ, विकसित हो रहा विधायी ढांचा और समावेशी विकास की नीति उसे नई ऊँचाइयों की ओर ले जा सकती है। न्याय, समानता और विधि के शासन को मजबूत करने वाले कानून, प्रभावी प्रशासन और जागरूक नागरिक मिलकर ही “विकसित भारत 2047” के संकल्प को साकार कर सकते हैं।

हर हाथ को अवसर, हर जीवन को सम्मान- विश्व जनसंख्या दिवस
विश्व जनसंख्या दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है, हर नागरिक को समान अवसर मिलना चाहिए और विकास की यात्रा में किसी को भी पीछे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। जब समाज समावेशी होगा, कानून न्यायपूर्ण होंगे और प्रत्येक नागरिक अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग कर सकेगा, तभी भारत वास्तव में एक सशक्त, समृद्ध और विकसित राष्ट्र के रूप में विश्व के सामने अपनी पहचान स्थापित करेगा।

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