बांकीपुर उपचुनाव के लिए प्रत्याशी के तौर पर जन सुराज ने आधिकारिक तौर पर प्रशांत किशोर उर्फ पीके के नाम की घोषणा कर दी है. इसके साथ ही कांग्रेस ने संकेत दिए थे कि वह प्रशांत किशोर के पक्ष में अपने उम्मीदवार खड़े नहीं करेगी. लेकिन, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने भाजपा और जनसुराज के विरोध में अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर दिया है. इसके साथ ही कांग्रेस भी अपनी दावेदारी के साथ आगे आ गई है. ऐसे में अब उभर रहे नए राजनीतिक समीकरण के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिखरे हुए विपक्ष के बीच क्या प्रशांत किशोर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अभेद्य किले को दरका सकते हैं? सवाल यह भी कि अगर आरजेडी और कांग्रेस की आपसी समन्वय की कमी के बीच क्या बांकीपुर से बीजेपी हार भी सकती है? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि बीते 30 वर्षों से भाजपा इस सीट पर जीत प्राप्त करती रही है, और बीते चुनाव में भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने 51 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज की थी.
बांकीपुर का चुनावी इतिहास और नितिन नवीन का दबदबा
बता दें कि नामांकन की प्रक्रिया 6 जुलाई से 13 जुलाई तक चलेगी और 30 जुलाई को वोट डाले जाएंगे. इस बीच यहां की राजनीति अब रोचक मोड़ पर आ गई है, क्योंकि बांकीपुर सीट को भारतीय जनता पार्टी का सबसे सुरक्षित और अभेद्य गढ़ माना जाता है. पूर्व में ‘पटना पश्चिम’ और साल 2008 के परिसीमन के बाद ‘बांकीपुर’ बनी इस सीट पर पिछले तीन दशकों से भाजपा का एकछत्र राज है. भाजपा के निवर्तमान विधायक और वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने इस सीट पर लगातार पांच बार जीत दर्ज की है. बीते 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में नितिन नवीन ने एकतरफा मुकाबले में रिकॉर्ड 98, 000 से अधिक वोट हासिल किए थे और आरजेडी की रेखा कुमारी को 51,936 वोटों के भारी अंतर से शिकस्त दी थी.
पिछले चुनाव के आंकड़े और अन्य प्रत्याशियों का वोट गणित
बता दें कि बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3 लाख 91 हजार है. खास बात यह है बीते चुनाव में यहां का मतदान प्रतिशत बेहद कम यानी लगभग 39.51% रहा था. इसके तहत कुल 1 लाख 54 हजार 723 वैध मत डाले गए थे. यहां त्रिकोणीय मुकाबले में मुख्य लड़ाई भाजपा के नितिन नवीन को 98,299 वोट मिले थे और आरजेडी की रेखा कुमारी 46,363 मत प्राप्त हुए थे. इनके अतिरिक्त चुनावी मैदान में उतरीं जन सुराज की तत्कालीन उम्मीदवार वंदना कुमारी ने 6,420 वोट हासिल कर तीसरा स्थान प्राप्त किया था. वहीं, बहुजन समाज पार्टी (BSP) के प्रत्याशी अजय कुमार को महज 1,114 वोट मिले थे, जबकि 1,322 मतदाताओं ने किसी भी उम्मीदवार को पसंद न करते हुए नोटा (NOTA) का बटन दबाया था.
अन्य उम्मीदवारों का कोई वजूद भी नहीं दिखा
इनके अतिरिक्त मैदान में मौजूद अन्य निर्दलीय और छोटे दलों के उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी और वे मिलकर भी 1,500 वोटों का आंकड़ा पार नहीं कर सके थे. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि राजद या फिर महागठबंधन ही मुख्य मुकाबले में है, जबकि जन सुराज ने अपनी थोड़ी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश की थी. दरअसल, जातीय समीकरण के तहत यह किला भाजपा का मजबूत किला माना जाता है और यही कारण है कि बीते तीस सालों से भाजपा को कोई हरा नहीं पाया है.
बांकीपुर का सामाजिक और जातीय समीकरण
बता दें कि बांकीपुर पूरी तरह से एक शहरी विधानसभा क्षेत्र है, जिसकी सामाजिक बनावट बिहार के अन्य ग्रामीण इलाकों से काफी अलग है. यहां का समाजिक समीकरण कुछ ऐसा बना हुआ है जो भाजपा को स्वाभाविक तौर पर बढ़त दिला जाता है. आइए जानते हैं कि आखिर यहां की समाजिक समीकरण राजनीति पर कैसे प्रभाव डालता है.
- कायस्थ बहुल आबादी: इस सीट पर सबसे निर्णायक भूमिका कायस्थ समाज की है, जिनकी संख्या करीब 60 से 70 हजार के बीच है. यह समाज पारंपरिक रूप से भाजपा का कोर वोटर माना जाता रहा है.
- वैश्य और सवर्ण मतदाता: कायस्थों के अलावा यहां वैश्य यानी व्यापारी वर्ग, राजपूत और ब्राह्मण मतदाताओं की भी बहुत बड़ी तादाद है, जो भाजपा के मजबूत आधार स्तंभ हैं.
- मुस्लिम-यादव और दलित वोट: क्षेत्र में लगभग 40 हजार मुस्लिम और 30 हजार के करीब यादव मतदाता हैं, जो अमूमन आरजेडी के पाले में जाते हैं.
- इस क्षेत्र में कुर्मी और कोइरी मतदाताओं की भी अच्छी संख्या है. बीते समय में मोटे तौर पर इनकी एकजुटता नीतीश कुमार के नाम के साथ जमीन पर भी दिखती रही है.
- इनके साथ ही झुग्गी-झोपड़ियों और निचली बस्तियों में रहने वाले दलित और महादलित समाज के वोट भी हार-जीत में अहम भूमिका निभाते रहे हैं.
क्या है आंकड़ों का गणित, क्या एकजुट विपक्ष बदल सकता है बाजी?
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि यदि कांग्रेस और आरजेडी दोनों मिलकर प्रशांत किशोर को मौन या खुला समर्थन दे देते हैं, तो बांकीपुर की चुनावी लड़ाई बेहद दिलचस्प हो सकती है. लेकिन, अगर आरजेडी और कांग्रेस अलग-अलग चुनाव लड़ती है, या फिर आरजेडी या कांग्रेस में से कोई एक दल फाइट करता है तो भी पीके की जीत मुश्किल हो जाएगी. दरअसल, पिछले चुनावों के आंकड़ों को समझें तो भाजपा को यहां हमेशा 60% से अधिक मत मिलते रहे हैं, जबकि आरजेडी और कांग्रेस का संयुक्त वोट बैंक 30% से 33% के आसपास सिमट जाता है. लेकिन, दूसरी ओर प्रशांत किशोर की रणनीति इसी पारंपरिक राजनीतिक गणित को तोड़ने की है. मगर सवाल यह कि क्या आरजेडी और कांग्रेस के सहयोग के बिना वह यह दुरुह कार्य कर पाएंगे?
चढ़ावा चोरी, भरत तिवारी केस और स्थानीय मुद्दों पर राजनीति गर्म होगी?
हालांकि, एक बात अवश्य कही जा रही है कि अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला, हाल में बीते 17 जून को भोजपुर के भरत तिवारी कथित एनकाउंटर प्रकरण के बाद कहा जा रहा है कि भाजपा की साख में कमी आई है. सवर्ण मतदाताओं (विशेषकर ब्राह्मण) में भाजपा के प्रति नाराजगी कही जा है. दूसरी ओर जन सुराज के मंच से शिक्षित, प्रबुद्ध और मध्यमवर्गीय शहरी मतदाताओं को साध रहे हैं, जो मौजूदा ड्रेनेज सफाई, जलजमाव और ट्रैफिक जाम जैसी समस्याओं को लेकर नाराजगी जताते हैं.
देखना होगा जमीन पर राजनीति कैसी करवट लेती है!
अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि अगर बदली राजनीतिक परिस्थितियों के बीच अगर पीके भाजपा के कोर सवर्ण और वैश्य मतों में 20% से 25% की सेंधमारी करने में सफल हो जाते हैं, और साथ ही उन्हें आरजेडी-कांग्रेस के प्रभाव वाले मुस्लिम, यादव और दलित वोटों का एकमुश्त साथ मिल जाता है, तो भाजपा के 51 हजार से अधिक वोटों के अंतर को पाट सकती है. हालांकि, सबसे दिलचस्प पहलू होगा और यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि आरजेडी और कांग्रेस क्या फैसला लेती है. अगर ये पार्टियां खुद ही चुनावी मैदान में कूद आईं तो मामला कठिन हो जाएगा. वहीं, अगर इन दोनों ही पार्टियों ने पीके को सपोर्ट किया तो यह देखना दिलचस्प होगा कि इन दलों का जमीनी काडर पीके को कितनी सहजता से स्वीकार करता है.
प्रशांत किशोर के पक्ष में क्या है?
राजनीति के जानकार बता रहे हैं कि प्रशांत किशोर पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं, और उनका सीधे भाजपा अध्यक्ष के गढ़ में उतरने से मुकाबला इंट्रेस्टिंग हो गया है. खास बात यह है कि पीके ने इस चुनाव को बिहार सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह जैसा बताया है. उनकी व्यक्तिगत पहचान, राजनीतिक रणनीतिकार की छवि और पिछले चार वर्षों से चलाया गया जन सुराज अभियान उन्हें अलग पहचान दे भी रहा है. ऐसे में अगर आरजेडी और कांग्रेस खुलकर समर्थन देते हैं, तो उन्हें विपक्षी वोटों का बड़ा हिस्सा मिल सकता है. इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे शहरी मतदाता भी उनके साथ आ सकते हैं जो पारंपरिक दलों से अलग विकल्प तलाश रहे हैं और उनके लिए पीके का फेस बहुत बड़ा आकर्षण हो सकता है.
मगर भाजपा के पास अब भी बढ़त क्यों?
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि अगर विपक्ष की एकजुटता भी हो जाती है तब भी भाजपा की स्थिति उतनी कमजोर नहीं मानी जा सकती, जितनी कही जा रही है. इसका पहला कारण संगठन है और भाजपा का बूथ नेटवर्क इस सीट पर बेहद मजबूत माना जाता है. दूसरा कारण यह है कि नितिन नवीन कई वर्षों तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं और भाजपा का स्थायी वोट बैंक बना हुआ है. तीसरा कारण शहरी मतदाताओं का मतदान व्यवहार है, जहां उम्मीदवार के साथ-साथ पार्टी की ब्रांड वैल्यू भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. विशेष यह कि तमाम तरह की नाराजगी के बाद भी बीजेपी का कैडर या उनका वोटर जल्दी इधर से उधर नहीं होता है.
क्या बांकीपुर का इतिहास बदल सकता है?
हालांकि, बांकीपुर में टफ फाइट का सीन इसलिए बन रहा है क्योंकि यहां एक बड़ा पहलू यह भी है कि इस उपचुनाव में पहली बार भाजपा को ऐसा उम्मीदवार मिल रहा है जिसकी व्यक्तिगत पहचान पूरे बिहार में है. यदि कांग्रेस उम्मीदवार नहीं उतारती और आरजेडी आधिकारिक समर्थन देती है, तो मुकाबला निश्चित रूप से पहले की तुलना में कहीं अधिक रोचक और कांटे का हो सकता है. बांकीपुर के पिछले मतदान पैटर्न को देखें तो भाजपा अब भी शुरुआती बढ़त वाली पार्टी दिखाई देती है. विपक्षी एकजुटता मुकाबले को कठिन जरूर बना सकती है, लेकिन 30 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए केवल गणित नहीं, बल्कि जमीन पर बड़े स्तर का वोट ट्रांसफर भी साबित करना होगा.
क्या लिखी जाएगी बिहार की नई सियासी कहानी?
अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि बांकीपुर का यह उपचुनाव महज एक विधानसभा सीट का मुकाबला नहीं है, बल्कि यह प्रशांत किशोर के ‘पॉलिटिकल करियर’ का सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट है. हालांकि, पीके ने स्पष्ट कहा है कि वे किसी गठबंधन में चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन भाजपा विरोधी ताकत परोक्ष रूप से भी सही, अग उनके पीछे आते हैं तो एक नए ध्रुवीकरण को जन्म दे सकता है. यही नहीं अगर भाजपा अपने इस अभेद्य दुर्ग को बचाने में नाकाम रहती है, तो यह परिणाम बिहार के नए राजनीतिक घटनाक्रमों के लिए एक नया अध्याय लिख देगा. यही कारण है कि बांकीपुर उपचुनाव अब सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में वास्तविक राजनीतिक शक्ति बन चुके हैं या उन्हें अभी सियासी जमीन पर और संघर्ष करना होगा.







