पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल व पुदुचेरी में विधानसभा चुनावों के नतीजे भारतीय राजनीति के नक्शे को फिर से आकार देने वाले तो हैं ही, इन्हें राष्ट्रीय राजनीतिक धाराओं के दिशासूचक के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसमें भाजपा अपनी पैठ वहां तक बढ़ा रही है, जहां उसके राजनीतिक पदचिह्न अब तक नहीं पड़े थे, जबकि विपक्षी दलों के लिए अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने की जरूरत स्पष्ट दिख रही है। पश्चिम बंगाल को ही लें, जहां एक दशक पहले तक भाजपा हाशिये की पार्टी थी, पर 2016 की तुलना में उसके वोट प्रतिशत में करीब 35 फीसदी का भारी उछाल और पहली बार राज्य की सत्ता पर काबिज होना कभी वामपंथ और फिर तृणमूल के अभेद्य दुर्ग माने जाने वाले इस राज्य में उसकी वैचारिक स्वीकार्यता का ही प्रमाण है। ममता की हार के पीछे पंद्रह वर्षों का सत्ता विरोधी रुझान तो था ही, कानून-व्यवस्था की कमजोरी, महिलाओं की असुरक्षा, उद्योग धंधों का बंद होना और एक खास तबके के प्रति तुष्टिकरण की नीति भी मुख्य कारण रहे। लेकिन इसका श्रेय प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली भाजपा के उस माइक्रो मैनेजमेंट को भी जाता है, जिसकी बदौलत 2014 के बाद से पहले उसने उत्तर व मध्य भारत में अपने आधार को ताकत दी तथा अब वह पूर्वी व पूर्वोत्तर भारत में परिवर्तन का चेहरा बनकर उभर रही है। पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व जीत और असम में लगातार तीसरी बार वापसी भाजपा को एक तरह से मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाती है, जिसने यह मिथक तोड़ दिया कि वह पूर्वी भारत के सांस्कृतिक-राजनीतिक ढांचे में स्थायी जगह नहीं बना सकती। हालांकि, असम में मिली जीत का श्रेय हिमंत बिस्वा सरमा को भी जाता है, जिनकी पहचान, सुरक्षा, विकास और क्षेत्रीय अस्मिता आधारित रणनीति ने विपक्ष को हाशिये पर धकेल दिया। केरल में हालांकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन को जीत मिली है, पर चाहे तमिलनाडु हो, महाराष्ट्र हो, उत्तर प्रदेश हो या फिर बिहार, सभी जगहों पर क्षेत्रीय सहयोगियों पर उसकी निर्भरता देख यही लगता है कि वह अपने पुराने राजनीतिक वैभव का अक्स मात्र ही रह गई है। तमिलनाडु में द्रमुक और असम में कांग्रेस का प्रदर्शन विपक्षी दलों की रणनीतियों पर प्रश्नचिह्न लगाता है, जहां इनके नेतृत्वकर्ता ही अपनी सीट नहीं बचा सके। ये नतीजे भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल तो बढ़ाएंगे ही, विपक्ष को भी आत्ममंथन के लिए प्रेरित करेंगे। इसका फायदा भाजपा को अगले वर्ष यूपी, उत्तराखंड और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों में तो मिलेगा ही, इस जीत की गूंज राष्ट्रीय राजनीति में भी यकीनन सुनाई देगी।
2021 से मिले सबक, जिनसे बीजेपी ने बदली रणनीति और ढहा दिया ‘दीदी का किला’
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का जनादेश सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि रणनीतिक बदलाव की कहानी भी है. 2021 में मिली करारी हार के बाद बीजेपी ने आत्ममंथन किया, अपनी कमजोरियों को पहचाना और उसी के आधार पर नई चुनावी रणनीति तैयार की. इस बार पार्टी ने आक्रामकता से ज्यादा संतुलन, चेहरों से ज्यादा संगठन और नारों से ज्यादा जमीनी मुद्दों पर भरोसा किया, जिसका नतीजा सीधे तौर पर नजर आया.
डायरेक्ट अटैक से परहेज, नैरेटिव की नई रणनीति
2021 के चुनाव में बीजेपी का कैंपेन काफी हद तक ममता बनर्जी पर केंद्रित था. ‘दीदी vs बीजेपी’ का सीधा मुकाबला बनाकर पार्टी ने चुनाव को व्यक्तित्व आधारित बना दिया था, जिसका फायदा टीएमसी को मिला. लेकिन 2026 में बीजेपी ने इस रणनीति को पूरी तरह बदला. इस बार ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत हमलों से दूरी बनाई गई और फोकस सरकार की नीतियों, प्रशासनिक विफलताओं और स्थानीय असंतोष पर ज्यादा रखा गया. इससे चुनाव का नैरेटिव व्यक्ति से हटकर मुद्दों पर शिफ्ट हो गया, जो बीजेपी के लिए ज्यादा अनुकूल साबित हुआ.
VIP चेहरे नहीं, जमीनी कार्यकर्ताओं पर दांव
2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने कई हाई-प्रोफाइल चेहरों और दल-बदलुओं को टिकट दिया था, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष उपजा था. इस बार (2026) की चुनावी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए, पार्टी ने VIP चेहरों के बजाय जमीनी कार्यकर्ताओं (Grassroots Workers) पर दांव लगाया है. इसका दोहरा फायदा हुआ. एक तरफ कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा, दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर चुनावी मैनेजमेंट ज्यादा प्रभावी हुआ.
आंतरिक कलह पर सख्ती, एकजुटता पर जोर
बीजेपी की एक पुरानी रणनीति रही है कि चुनाव के समय संगठन के भीतर विरोध को पनपने नहीं दिया जाता. 2021 में यह संतुलन कुछ हद तक बिगड़ा था, लेकिन 2026 में पार्टी ने इसे अपनी प्राथमिकता बनाया. टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार तक, हर स्तर पर असंतोष को तुरंत संभाला गया. वरिष्ठ नेतृत्व ने लगातार मॉनिटरिंग की, जिससे पार्टी एकजुट नजर आई. यह एकजुटता चुनावी मैदान में सीधे तौर पर असर डालती दिखी.
लोकल मुद्दों पर सीधा हमला
इस बार बीजेपी ने राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय स्थानीय समस्याओं को अपना हथियार बनाया. पंचायत स्तर से लेकर शहरी इलाकों तक, बिजली, पानी, भ्रष्टाचार, कटमनी, महिला सुरक्षा और प्रशासनिक पक्षपात जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया गया. इस रणनीति ने बीजेपी को बाहरी पार्टी के टैग से बाहर निकलने में मदद की और उसे एक लोकल विकल्प के रूप में स्थापित किया.
महिला सुरक्षा बना बड़ा चुनावी मुद्दा
महिला सुरक्षा इस चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे प्रभावी मुद्दों में से एक बनकर उभरा. पार्टी ने संदेशखाली और आरजी कर जैसे मामलों को लगातार उठाया और इसे कानून-व्यवस्था की विफलता से जोड़ा. सबसे अहम बात यह रही कि बीजेपी ने सिर्फ मुद्दा उठाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि पीड़ित महिलाओं को चुनावी प्रक्रिया में शामिल किया. उन्हें टिकट दिया और मंच पर जगह दी. इससे पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह महिलाओं की आवाज को सीधे राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलना चाहती है.
‘पीड़िता से प्रत्याशी’ संदेश की ताकत
संदेशखाली से लेकर आरजी कर तक, जिन महिलाओं ने अत्याचार झेला, उन्हें या उनके परिजनों को बीजेपी ने उम्मीदवार बनाकर चुनाव मैदान में उतारा. यह कदम प्रतीकात्मक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक भी था. इससे बीजेपी ने एक मजबूत भावनात्मक और नैतिक नैरेटिव तैयार किया कि वह सिर्फ विरोध नहीं कर रही, बल्कि बदलाव का मंच भी दे रही है. इसका असर महिला वोटर्स पर खास तौर पर देखने को मिला.
रणनीति बदली, समीकरण बदले
2021 की हार से सीखे गए सबक. जैसे ओवर-अटैक से बचना, संगठन को मजबूत करना, लोकल मुद्दों पर फोकस और सही उम्मीदवार चुनना. इन सभी ने मिलकर बीजेपी की जीत की नींव रखी.







