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हार के बाद मेहनत जरूरी या सैर-सपाटा ?

UB India News by UB India News
December 28, 2025
in पटना, राजद
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हार के बाद मेहनत जरूरी या सैर-सपाटा ?
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तेजस्वी यादव पिछले 25 दिनों से यूरोप में तफरीह कर रहे हैं। वे अपनी पत्नी राजश्री, पुत्री कात्यायनी, पुत्र इराज के साथ विदेश में छुट्टियां मना रहे हैं। क्रिसमस के बाद नया साल भी संभवत: विदेश में ही मनाएंगे। यानी जनवरी 2026 में पटना लौटेंगे। कुछ लोगों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति अपने परिवार के साथ छुट्टियां मना रहा है तो यह उसका निजी मामला है। इस पर राजनीतिक टीका-टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए। लेकिन उनके विदेश यात्रा को लेकर विवाद इसलिए हो रहा है क्यों कि उन्होंने अपने विधायी जिम्मेदारी को बीच छोड़ कर विदेश जाने का फैसला लिया।

सदन के सत्र से बीच में ही गायब
वे बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद आसीन है। परम्परा यही रही है कि नयी विधानसभा के गठन के बाद नेता प्रतिपक्ष सदन में राज्यपाल के अभिभाषण और धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान जरूर शामिल रहता है। 3 दिसम्बर को राज्यपाल का अभिभाषण था और 4 दिसम्बर को धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा थी। नेता प्रतिपक्ष इन दोनों महत्वपूर्ण मौकों पर विधानसभा से गैरहाजिर रहे। वे 1 और 2 दिसम्बर को सदन की कार्यवाही शामिल हुए। लेकिन 2 दिसम्बर की शाम ही वे दिल्ली के लिए रवाना हो गये। विदेश यात्रा पर जाना निजी फैसला हो सकता है लेकिन इसकी टाइमिंग को लेकर सवाल खड़ा हो गया। यह एक संक्षिप्त सत्र (1 से 5 दिसम्बर 2025) था। तेजस्वी अपने विधायी कार्य निबटा कर 5 दिसम्बर को निजी यात्रा पर जा सकते थे। लेकिन वे बिहार विधानसभा के सत्र को बीच में छोड़ कर विदेश चले गये। इसलिए अब यह कहा जा रहा है कि तेजस्वी अपनी विधायी और राजनीतिक जवाबदेही के प्रति गंभीर नहीं हैं।

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बड़ी हार की छोटी समीक्षा
करारी हार के बाद दल के नेता (तेजस्वी) की इतनी लंबी छुट्टी पर जाने से पार्टी के विधायक (25) असमंजस में हैं। जो पार्टी 77 से 25 पर लुढ़क गयी हो उस दल के नेता को भला छुट्टी मनाने का ख्याल कैसे आ सकता है। ये आत्ममंथन का समय था। ईमानदारी से हार की समीक्षा का समय था। 17 नवम्बर को हार की समीक्षा के लिए सभी पराजित उम्मीदवार पार्टी के कार्यालय में जुटे भी थे। तेजस्वी इस बैठक में रहे। लेकिन चर्चा सिर्फ तीन घंटे चली। इतनी बड़ी हार की इतनी छोटी समीक्षा पर्याप्त नहीं। बैठक कई दिन और कई बार होनी चाहिए थी। हर एक सीट की हार के लिए पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन होना चाहिए था। लेकिन इसके लिए डाटा और मेहनत की जरूरत थी। यह इच्छा शक्ति तेजस्वी यादव में नहीं दिखी। वे बुझे-बुझे और खामोश नजर आने लगे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहने वाले तेजस्वी ने हार के आठ दिनों तक कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की। क्या तेजस्वी यादव पार्टी की करारी हार और पारिवारिक विवाद के कारण तनाव में हैं ?

लालू यादव से सीखें!
क्या प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उनका आत्मविश्वास टूट गया है? क्या अपने इसी तनाव से मुक्त होने के लिए छुट्टियों पर गये हैं? हार तो और मेहनत के लिए प्रेरित करती है। यूपीएससी की तैयारी करने वाले कई प्रतिभागी तो चौथे प्रयास में सफल होते हैं। संघर्ष से ही जीत का रास्ता निकलता है। लालू प्रसाद 1977 में छपरा लोकसभा चुनाव जीत कर हीरो बन गये थे। लेकिन 1980 में वे छपरा में हार गये थे। लेकिन इस हार से टूटे नहीं। 1980 का विधानसभा चुनाव आया तो छपरा छोड़ कर सोनपुर से लड़े। विधायक बने। 1985 में भी सोनपुर से ही विधायक बने। आज वे बिहार के दिग्गज राजनीतिज्ञ हैं।

‘सीएम नीतीश भी हारे थे’
इसी तरह नीतीश कुमार 1977 और 1980 में विधानसभा का चुनाव हार गये थे। लगातार दो हार से उनके परिवार के लोग हताश हो गये थे। नीतीश कुमार को भी बड़ा झटका लगा था। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। चुनाव लड़ने के लिए उनके पास पैसा नहीं था। तब अपनी पत्नी मंजू सिन्हा से एक और मौका देने की बात कही। उनकी पत्नी सरकारी हाईस्कूल में शिक्षक थीं। उन्होंने अपने वेतन से बचा कर 20 हजार रुपये जमा किये थे। ये रुपये उन्होंने अपने पति (नीतीश कुमार) को चुनाव लड़ने के लिए दे दिये। 1985 में नीतीश कुमार पहली बार विधायक बने। आज वे ऐतिहासिक ऊंचाई पर खड़े हैं। बिहार में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है।

बिहार ही छोड़ दिया
लेकिन तेजस्वी ने तो हार के बाद बिहार ही छोड़ दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेता प्रतिपक्ष के लिए यह पलायनवादी सोच ठीक नहीं। हार के बाद ही टीम को अपने कप्तान की सबसे अधिक जरूरत होती है। वह अपने सहयोगियों को हौसला देता है और आगे का रास्ता तैयार करता है। चुनाव परिणाम के करीब डेढ़ महीने बीत गये लेकिन राजद के विधायक आगे की रणनीति को लेकर उहापोह में हैं। विपक्षी, तेजस्वी यादव को लापता बता कर व्यंग्य कस रहे हैं।

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