बिहार के राजनीतिक गलियारों में पिछले दो दिनों से प्रशांत किशोर फिर से चर्चा का टॉपिक बने हैं. एक अंग्रेजी अखबार में पिछले दिनों कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी की जनसुराज संस्थापक प्रशांत किशोर की गुप्त मीटिंग की खबर छपी. इस खबर को कांग्रेस और जनसुराज ने ना तो मुहर लगाई है और ना ही स्पष्टता से खंडन किया है. बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज के सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है, वहीं कांग्रेस केवल छह सीटों पर सिमट गई है. चट्टी चौराहों पर चर्चा हो रही है कि क्या दो हारे हुए लोग जिनके पास अपनी-अपनी ताकतें हैं, अपनी-अपनी कमजोरियां हैं। क्या साथ आएंगे?
क्या प्रशांत किशोर जो राह पहले छोड़कर आए हैं वो वापस उसपर लौटेंगे. बीजेपी इस खबर को किस तरह से देख रही है? यह केवल अफवाह है या इसमें कोई दम भी है? इन तमाम सवालों का जवाब मौजूदा राजनीतिक हालात के नजरिए ये तलाशने की कोशिश करते हैं.
मीडिया में कांग्रेस के सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर और प्रियंका गांधी की मुलाकात एक अनौपचारिक थी. यहां यह समझना होगा कि जब दो नेता आपस में मिलते हैं या बात करते हैं तो वो कुछ भी अनौपचारिक नहीं होता है. ऐसी मीटिंग ज्यादातर औपचारिक होती है. नेता जब भी मिलते हैं तो बात राजनीति पर जरूर ही होती है. हां यह सवाल जरूर है कि राजनीति किस तरीके की है और बातचीत का स्तर किस स्तर तक जाएगी?
यहां यह देखने के जरूरत है कि प्रशांत किशोर का एक बहुत बड़ा गुब्बारा बिहार चुनाव रिजल्ट में फुस्स साबित हुआ है. चुनाव से पहले कई राजनीतिक विश्लेषक और सर्वे एजेंसियां दावा कर रहे थे कि प्रशांत किशोर 10 से 12 फीसदी वोट हासिल कर लेंगे. प्रशांत को सीएम की रेस में भी मजबूत दावेदार दिखाया जा रहा था. सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर भी प्रशांत किशोर करीब 3 फीसदी वोट ही हासिल कर पाए. इससे यह साफ हो चुका है कि प्रशांत किशोर के पास फिलहाल बिहार में ऐसा वोट बैंक नहीं है जिसके आधार पर वह कोई हैसियत दिखा पाएं.

बिहार चुनाव के पहले वह एक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर जाने जाते रहे. तमाम इंटरव्यू के जरिए उन्होंने यह फ्रेमिंग करते रहे हैं कि वो जहां जिसकी मदद करते हैं वो चुनाव जीत जाता है। लेकिन बिहार चुनाव में उनकी कलई पूरी तरीके से खुल गई है. बिहार की जनता ने जिस तरह से प्रशांत को धड़ाम गिराया है उसके बाद से शायद उन्हें अहसास हो गया है कि राजनीति एक अलग चीज है.
जरूरत से ज्यादा महत्वाकांक्षी हैं प्रशांत किशोर
प्रशांत किशोर को लेकर दूसरी बात सामने आई है कि वह अतिमत्वाकांक्षी हैं. वह एक बार में ही किसी भी क्षेत्र का सर्वोच्च पाना चाहते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद प्रशांत किशोर ने कांग्रेस के टॉप ऑर्डर लीडरशीप के सामने कई राउंड की प्रेजेंटेशन देकर पार्टी के पुनरुत्थान का प्लान बताया. प्रशांत खुद स्वीकार चुके हैं कि वह कांग्रेस में चुनावी रणनीतिकार के तौर पर नहीं बल्कि पार्टी में पावरफुल पद पाकर आना चाहते थे. कहा जाता है कि राहुल गांधी इसके लिए तैयार नहीं थे. वो चाहते थे कि प्रशांत पहले पार्टी के साथ जुटें, फिर उनके काम को देखकर उनकी जिम्मेदारी तय की जाए.
इसके बाद प्रशांत किशोर ने पहले पदयात्रा फिर जनसुराज पार्टी बनाई. बिहार के किसी क्षेत्र विशेष से राजनीति शुरू करने के बजाय सीधे पूरे राज्य में कूद पड़े. बड़े-बड़े दावे कर और सोशल मीडिया की हेल्प से खुद को स्थापित नेता के रूप में प्रोजेक्ट करने लगे. खुद चुनाव तक नहीं लड़े और इसपर तर्क देने लगे कि वह सभी 243 सीटों पर प्रचार करने में समय देना चाहते हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि जब प्रशांत किशोर अपनी पार्टी जनसुराज में नंबर वन के अलावा दूसरे की सोचते भी नहीं है। जब किसी दूसरी पार्टी में जाएंगे तो नंबर दो के अलावा किसी तीसरी भूमिका में आने में उनको दिक्कत है. इससे पहले जब नीतीश कुमार उन्हें जेडीयू में लेकर आए तब भी वह पूरी पार्टी को ही अपने हिसाब से चलाने की कोशिश में थे, जिसके बाद उन्हें वहां से हटाया गया.
विचारधारा विहीन छवि को कैसे मिटाएंगे प्रशांत किशोर?
प्रशांत किशोर की अब तक के सार्वजनिक जीवन पर नजर डालें तो वह पूरी तरह से विचारधारा विहीन नजर आते हैं. जनता के बीच भी कमोबेश उनकी यही छवि दिखती है. बिहार चुनाव के दौरान एक इंटरव्यू में प्रशांत किशोर से जब विचारधारा पर सवाल पूछे गए तब उन्होंने खुद को कांग्रेस के करीब बताया था. लेकिन यहीं पर क्रॉस क्वेश्चन उठता है कि उन्होंने अपनी चुनावी रणनीतिकार की पारी ही नरेंद्र मोदी के साथ शुरू की. 2012 का गुजरात विधानसभा चुनाव हो चाहे 2014 का लोकसभा चुनाव, दोनों मौकों पर प्रशांत नरेंद्र मोदी के लिए कैंपेन डिजाइन किया और ब्रांड मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में अहम रोल निभाया. केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद प्रशांत यहां भी अपने लिए फ्रीडम वाला रोल चाह रहे थे, लेकिन बात नहीं बनी तो विरोधी नेताओं की मदद में जुट गए.
प्रशांत कब किसके साथ चले जाएं पता नहीं
प्रशांत को लेकर दूसरा परसेप्शन यह है कि वह एक धुरी पर टिक नहीं रहते हैं. वह पीएम मोदी, ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार सभी विचारधारा वाले नेताओं के साथ कंफर्टेबल हैं। इसी में गौर करने वाली बात यह है कि पीएम नरेंद्र मोदी का एक ट्रैक रिकॉर्ड है कि जो उनके साथ रहता है वह लंबे समय तक टिकता है. अगर आप उनकी टीम को देख ले तो 15 साल से ज्यादा का ही ट्रैक रिकॉर्ड है। नरेंद्र मोदी अपने अपने लोगों को छोड़ते नहीं है और उनके साथ जो जुड़े होते हैं. सवाल है कि क्या कारण है कि प्रशांत किशोर 2014 चुनाव के बाद वहां टिक नहीं पाए। ऐसी कौन सी बात है? तो यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है।
भारतीय राजनीति पर नजर डालें तो अतिमहत्वाकांक्षी नेता पूरी तरीके से सेल्फ सेंटर्ड इंसान होता है. ऐसे नेता राजनीति में तभी कामयाब होते हैं जब वो अत्यधिक लोकप्रिय हो। ऐसे नेता कभी भी संगठन को धरातल पर नहीं खड़ा कर पाते हैं. यह अरविंद केजरीवाल वाले केस में दिख चुका है.







