बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट रिवीजन यानी SIR (Bihar SIR Hearing On Supreme Court) को लेकर सूबे में सियासी घमासान मचा हुआ है. इस सियासी खींचतान के बीच सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर आज भी सुनवाई चल रही है. वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी दलीलों में सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू फैसले का जिक्र किया, जिसमें पिछले चुनावों में मतदान कर चुके मतदाताओं को सूची से बाहर करने के संबंध में दिशानिर्देश दिए गए हैं. जिन मामलों में नागरिकता को लेकर संदेह है, वहां ERO फैसला लेने से पहले गृह मंत्रालय सहित संबंधित प्राधिकारियों से परामर्श कर सकता है.
सुप्रीम कोर्ट में SIR पर बड़ी सुनवाई LIVE:
अभिषेक मनु सिंघवी ने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि अगर ERO अभी भी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है, तो उसे पहले सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का संदर्भ लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि असम में, नागरिकता से संबंधित विवादित मामलों पर निर्णय लेने के लिए विदेशी ट्रिब्यूनल है. इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सिविल कोर्ट को इस मामले में अधिकार नहीं है.
जस्टिस बागची ने सिंघवी से क्या पूछा?
जस्टिस बागची ने सिंघवी से कहा कि हमें आधार को बाहर करने को लेकर आपका तर्क समझ आ गया है. लेकिन दस्तावेज़ों की संख्या का मुद्दा वास्तव में मतदाताओं के अनुकूल है, उनके ख़िलाफ नहीं. उन दस्तावेज़ों की संख्या पर गौर करें जिनसे आप नागरिकता साबित कर सकते हैं.
जब सिंघवी आधार, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र स्वीकार न किए जाने की शिकायत करते रहे, तो जस्टिस जयमाल्या बागची ने कहा कि हम आधार के बारे में आपके बहिष्करण संबंधी तर्कों को समझते हैं. लेकिन देखिए, चुनाव आयोग पहचान के लिए दस्तावेज़ों की संख्या बढ़ा रहा है, जबकि संक्षिप्त संशोधन के दौरान पहचान साबित करने के लिए केवल 7 दस्तावेज़ों की अनुमति थी, अब इसे बढ़ाकर 11 कर दिया गया है. यह मतदाता हितैषी है, बहिष्करणकारी नहीं. उन दस्तावेज़ों की संख्या पर गौर कीजिए जिनके आधार पर आप नागरिकता साबित कर सकते हैं.
जस्टिस कांत ने कहा कि अगर उन्होंने 11 दस्तावेज़ों पर ज़ोर दिया गया होता तो यह मतदाता विरोधी होता. लेकिन अगर कोई एक दस्तावेज़ मांगा जाता है तो यह मतदाता हितैषी है.
SIR मतदाताओं के खिलाफ क्यों नहीं?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग ने पहचान पत्र के दस्तावेजों की संख्या में वृद्धि ही की है. आधार को लेकर याचिकाकर्ताओं की मांग हो सकती है, लेकिन समरी रिवीजन में जहां 7 दस्तावेज मान्य थे वहीं SIR में 11 दस्तावेज मान्य हैं.अगर चुनाव आयोग कहता कि सभी 11 दस्तावेज देना अनिवार्य है उसी स्थिति में इस SIR को मतदाताओं के खिलाफ कहा जा सकता है. लेकिन यहां तो 11 में से एक दस्तावेज ही मांगा जा रहा है.
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ था?
बता दें कि इस मामले में मंगलवार को भी सुनवाई हुई थी, दोनों ही पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें दी. ऐसा माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट SIR को लेकर आज कोई बड़ा फैसला सुना सकता है. आपको बता दें कि पहले दिन की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम टिप्पणियां भी की थीं. कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग सही कह रहा है कि आधार को नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है. ज्यादा से ज्यादा यह किसी की पहचान का प्रमाण हो सकता है. आधार ऐक्ट की धारा 9 ऐसा कहती है.
वहीं, चुनाव आयोग ने सुनवाई के दौरान कोर्ट से कहा कि नियमों के अनुसार चुनाव आयोग को शामिल न किए गए लोगों की अलग सूची तैयार करने की आवश्यकता नहीं है.नियमों के अनुसार चुनाव आयोग को किसी को शामिल न किए जाने का कारण प्रकाशित करने की आवश्यकता नहीं है.ऐसी किसी भी सूची को अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता है.जिन लोगों को शामिल नहीं किया गया है, वे सभी इसका उपायों का सहारा ले सकते हैं.चुनाव आयोग ने कहा कि उसके पास ऐसा करने का अधिकार है.उसके पास यह निर्धारित करने का संवैधानिक कर्तव्य और अधिकार है कि मतदाताओं द्वारा नागरिकता की आवश्यकता पूरी की गई है या नहीं, लेकिन मतदाता के रूप में अयोग्य ठहराए जाने के कारण किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त नहीं की जाएगी.







