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MPID एक्ट क्या है, महाराष्ट्र में क्यों मचा है बवाल? जानिए टोरैस घोटाले का पूरा विवाद

UB India News by UB India News
February 22, 2025
in कानून, कारोबार, खास खबर
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MPID एक्ट क्या है, महाराष्ट्र में क्यों मचा है बवाल? जानिए टोरैस घोटाले का पूरा विवाद

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महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ इंटरेस्ट ऑफ डिपॉजिटर्स (MPID) एक्ट एक कानून है जो महाराष्ट्र में निवेशकों के हितों की रक्षा करता है. यह कानून उन वित्तीय संस्थानों पर लागू होता है जो जमाकर्ताओं से पैसे लेते हैं और उन्हें ज्यादा रिटर्न का वादा करते हैं. अगर कोई वित्तीय संस्थान निवेशकों के साथ धोखाधड़ी करता है या उनका पैसा वापस नहीं करता है, तो एमपीआईडी एक्ट के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है.

हाल ही में, महाराष्ट्र में एमपीआईडी एक्ट को लेकर काफी बवाल मचा हुआ है. इसका कारण है टोरैस निवेश घोटाला. इस घोटाले में टोरैस नाम की एक कंपनी ने निवेशकों से करोड़ों रुपये ठगे. कंपनी ने निवेशकों को ज्यादा रिटर्न का वादा किया था, लेकिन बाद में कंपनी गायब हो गई. इस घोटाले के कारण कई निवेशकों को भारी नुकसान हुआ है.

हालांकि, अब मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने टोरैस पोंजी घोटाले में ठगी के शिकार निवेशकों को राहत की खबर दी है. अगले छह महीनों में निवेशकों को लगभग 40 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है. मुंबई पुलिस ने आरोपियों की जब्त की गई संपत्तियों की नीलामी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. एमपीआईडी एक्ट के तहत यह नीलामी की जाएगी. नीलामी से मिलने वाले पैसों को निवेशकों में बांटा जाएगा.

टोरैस घोटाले का पर्दाफाश कैसे हुआ 
EOW की जांच में पता चला कि टोरैस कंपनी ने कई ऐसी स्कीम चलाईं जिनमें लोगों को महंगे गहने खरीदने के लिए फुसलाया गया. हफ्ते के हिसाब से ब्याज इतना ज्यादा बताया गया कि कुछ स्कीमों में तो साल का 500% रिटर्न मिलने का झांसा दिया गया. इतना ही नहीं, लोगों को आईफोन, गहने, ब्रांडेड बैग, गाड़ियां और यहां तक कि फ्लैट जैसे महंगे तोहफे देने का लालच भी दिया गया.

फिर, दिसंबर 2024 में लोगों का अचानक उनकी लगाई हुई रकम पर मिलने वाला ब्याज बंद हो गया. जब लोगों को उनके पैसे नहीं मिले, तो वो सड़क पर उतर आए और हंगामा करने लगे. ऐसे खुला टोरैस का खेल. जनवरी में मुंबई में टोरैस के कई ठिकानों पर हजारों लोगों ने हल्ला बोल दिया.

ये सारा फ्रॉड टोरैस ब्रांड की मालिक कंपनी प्लैटिनम हर्न प्राइवेट लिमिटेड ने किया. इन्होंने मोटा मुनाफा देने का झांसा देकर 1.25 लाख से भी ज्यादा निवेशकों को लूटा और करोड़ों का घोटाला किया.

कितने निवेशक ठगे, कितने करोड़ की धोखाधड़ी?
टोरैस घोटाले की जांच शिवाजी पार्क पुलिस स्टेशन और ईओडब्ल्यू कर रही है. अब तक छह आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है और करीब 40 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई है, जिसमें नकदी, बैंक खाते, सोना, चांदी के गहने और कीमती पत्थर शामिल हैं.

12,783 पीड़ितों ने आधिकारिक तौर पर शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें कुल 130 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का दावा किया गया है. जब्त की गई संपत्ति को बेचकर और उसे निवेशकों में बांटकर उन्हें कुछ राहत मिलने की उम्मीद है. जांच अभी जारी है और माना जा रहा है कि और भी पीड़ित सामने आएंगे.

कब और क्यों बना MPID कानून?
महाराष्ट्र सरकार ने साल 1999 में महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ इंटरेस्ट ऑफ डिपॉजिटर्स एक्ट बनाया था. राष्ट्रपति ने 21 जनवरी 2000 को इस कानून को अपनी मंजूरी दी थी. जब ये कानून बनाया गया, तब महाराष्ट्र में कई ऐसी कंपनियां खुल रही थीं जो लोगों से पैसे जमा करवाती थीं और उन्हें मोटा मुनाफा देने का लालच देती थीं.

इनमें से कुछ कंपनियों का इरादा लोगों को धोखा देकर उनके पैसे हड़पना था. ऐसे जाल में फंसने वाले ज्यादातर लोग मिडिल क्लास और गरीब तबके के होते थे. सरकार का कहना था कि जनता के हित में ऐसा कानून बनाना जरूरी था जो ऐसी धोखेबाज कंपनियों पर लगाम लगा सके. इसीलिए एमपीआईडी एक्ट बनाया गया.

MPID एक्ट: आरोपी को कितने साल की सजा का प्रावधान है?
इस कानून के अनुसार, अगर कोई वित्तीय संस्थान धोखाधड़ी से निवेशकों का पैसा वापस नहीं करता, यानी मैच्योरिटी पर जमा राशि और उस पर मिलने वाला ब्याज, बोनस या मुनाफा नहीं देता है तो उस संस्थान से जुड़े हर व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. इसमें प्रमोटर, पार्टनर, डायरेक्टर, मैनेजर और व्यवसाय संचालन के लिए जिम्मेदार कर्मचारी भी शामिल हैं. अगर ये लोग दोषी पाए जाते हैं, तो उन्हें अधिकतम छह साल की जेल और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है.

इस कानून के तहत, सरकार को यह अधिकार है कि वह वित्तीय संस्थान द्वारा अर्जित की गई संपत्ति या पैसे को जब्त करने का आदेश जारी कर सकती है. एक बार आदेश पारित हो जाने के बाद अदालत संपत्ति की बिक्री और उससे मिली रकम को निवेशकों में समान रूप से बांटने के निर्देश जारी कर सकती है.

क्या MPID एक्ट असंवैधानिक है?
साल 2005 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एमपीआईडी एक्ट को असंवैधानिक घोषित कर दिया था. हाई कोर्ट का कहना था कि यह कानून कंपनी अधिनियम 1956 के तहत बने केंद्रीय कानून के खिलाफ है और महाराष्ट्र का यह कानून संसद के अधिकारों में दखल देता है, क्योंकि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों द्वारा भुगतान न करने का मामला पहले से ही कंपनी एक्ट और आरबीआई एक्ट 1934 में कवर किया गया है.

लेकिन 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ एक अपील पर सुनवाई की और तमिलनाडु के एक ऐसे ही कानून को भी देखा. सुप्रीम कोर्ट ने एमपीआईडी एक्ट और तमिलनाडु के कानून दोनों को सही ठहराया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन कंपनियों पर राज्य के कानूनों के तहत मुकदमा चलाया गया था, उन्होंने आरबीआई से कोई लाइसेंस नहीं लिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार के जो कानून हैं, वो राज्य के इन कानूनों के काम में दखल नहीं देते. राज्य के ये कानून धोखाधड़ी करने वाली कंपनियों की संपत्ति जब्त करके बेचने के लिए बनाए गए हैं, ताकि निवेशकों को जल्दी और आसानी से उनका पैसा वापस मिल सके. इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि एमपीआईडी एक्ट संवैधानिक है और निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया है. 2022 में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को सही ठहराया था.

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