थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) या थोक महंगाई दर दिसंबर में 2.37 प्रतिशत रही है। नवंबर में यह 1.89 प्रतिशत थी। यह जानकारी वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा मंगलवार को जारी किए गए डेटा से मिली। मंत्रालय के अनुसार, थोक महंगाई दर के सकारात्मक रहने की वजह खाद्य उत्पादों की कीमत बढ़ना और टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग की लागत में इजाफा होना है। दिसंबर 2023 में थोक महंगाई दर 0.73 प्रतिशत थी। दिसंबर में प्राथमिक वस्तुओं के सूचकांक में नवंबर 2024 के मुकाबले 2.07 प्रतिशत की कमी आई है। इसकी वजह महीने के दौरान खाद्य पदार्थों की कीमत में -3.08 प्रतिशत और कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की कीमत में -2.87 प्रतिशत की गिरावट होना है।
डेली यूज वाले सामान महंगे, खाने-पीने की चींजे सस्ती हुईं
- रोजाना की जरूरत वाले सामानों की महंगाई 5.49% से बढ़कर 6.02% हो गई।
- खाने-पीने की चीजों की महंगाई 8.92% से घटकर 8.89% हो गई।
- फ्यूल और पावर की थोक महंगाई दर -5.83% से घटकर -3.79% रही।
- मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की थोक महंगाई दर 2.00% से बढ़कर 2.14% रही।
- आलू की थोक महंगाई 82.79% से बढ़कर 93.20% पर रही।
- अंडे, मांस, मछली की होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) 3.16% से बढ़कर 5.43% पर रही।
- सब्जियों की थोक महंगाई 28.57% से बढ़कर 28.65% पर आई।
होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का आम आदमी पर असर
थोक महंगाई के लंबे समय तक बढ़े रहने से ज्यादातर प्रोडक्टिव सेक्टर पर इसका बुरा असर पड़ता है। अगर थोक मूल्य बहुत ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है तो प्रोड्यूसर इसका बोझ कंज्यूमर्स पर डाल देते हैं। सरकार केवल टैक्स के जरिए WPI को कंट्रोल कर सकती है।
जैसे कच्चे तेल में तेज बढ़ोतरी की स्थिति में सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी कटौती की थी। हालांकि, सरकार टैक्स कटौती एक सीमा में ही कम कर सकती है। WPI में ज्यादा वेटेज मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर जैसे फैक्ट्री से जुड़े सामानों का होता है।
होलसेल महंगाई के तीन हिस्से
प्राइमरी आर्टिकल, जिसका वेटेज 22.62% है। फ्यूल एंड पावर का वेटेज 13.15% और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट का वेटेज सबसे ज्यादा 64.23% है। प्राइमरी आर्टिकल के भी चार हिस्से हैं।
- फूड आर्टिकल्स जैसे अनाज, गेहूं, सब्जियां
- नॉन फूड आर्टिकल में ऑइल सीड आते हैं
- मिनरल्स
- क्रूड पेट्रोलियम
महंगाई कैसे मापी जाती है?
भारत में दो तरह की महंगाई होती है। एक रिटेल यानी खुदरा और दूसरी थोक महंगाई होती है। रिटेल महंगाई दर आम ग्राहकों की तरफ से दी जाने वाली कीमतों पर आधारित होती है। इसको कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) भी कहते हैं। वहीं, होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) का अर्थ उन कीमतों से होता है, जो थोक बाजार में एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से वसूलता है।
महंगाई मापने के लिए अलग-अलग आइटम्स को शामिल किया जाता है। जैसे थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 63.75%, प्राइमरी आर्टिकल जैसे फूड 22.62% और फ्यूल एंड पावर 13.15% होती है। वहीं, रिटेल महंगाई में फूड और प्रोडक्ट की भागीदारी 45.86%, हाउसिंग की 10.07% और फ्यूल सहित अन्य आइटम्स की भी भागीदारी होती है।







