भारत के आर्थिक सुधारों के जनक और दूरदर्शी राजनेता डॉ मनमोहन सिंह का 92 साल की उम्र में निधन हो गया. 1991 में देश को उसके सबसे गंभीर वित्तीय संकट से उबारने वाले मनमोहन सिंह के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों ने न केवल भारत को दिवालियापन से बचाया, बल्कि उसे एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में नई दिशा भी दी.
24 जुलाई 1991 को तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने अपना पहला बजट पेश किया था, जो प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की कैबिनेट में शपथ लेने के सिर्फ एक महीने बाद आया. यह बजट भारत के लिए एक ऐतिहासिक बजट था. आर्थिक संकट से निपटने के लिए सरकार ने इस बजट में कई बड़े और कड़े फैसले लिए थे. उसी समय सरकार ने एक नई औद्योगिक नीति भी पेश की. इस नीति ने उद्योगों के विकास में बाधा डालने वाली कई रुकावटों को दूर कर दिया.
आज से करीब 33 साल पहले भारत एक बड़े आर्थिक संकट से गुजरा था. लेकिन भारत इस संकट से कैसे पार पाया और कैसे तरक्की की राह पर आगे बढ़ा, यह जानना जरूरी है.
1991 का संकट क्या था?
साल 1991 का आर्थिक संकट भारत के इतिहास का एक कठिन समय था, जब देश विदेशी मुद्रा भंडार की भारी कमी से जूझ रहा था. मतलब, भारत के पास विदेशों से खरीदे गए सामान और सेवाओं का भुगतान करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं थी. देश के पास इतना भी पैसा नहीं था कि वह तीन हफ्तों तक के आयात का खर्च उठा सके.
1990-91 में हुए खाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं थी. इससे भारत को तेल आयात करने में ज्यादा पैसे खर्च करने पड़े. विदेशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले पैसे में भी कमी आ गई थी. इन सब कारणों से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम हो गया. भारत के पास सिर्फ 6 बिलियन डॉलर बचे थे, जो सिर्फ 2 हफ्ते के आयात के लिए काफी थे. सरकार का खर्च भी बढ़ गया था और विदेशों से लिया गया कर्ज भी बहुत ज्यादा था. बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ा दीं.
“आजाद भारत के इतिहास में ऐसा संकट हमने पहले कभी नहीं देखा”
1990-91 के बजट भाषण में मनमोहन सिंह ने कहा था, “एक महीने पहले ही सत्ता में आई नई सरकार को गहरे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है. विदेशों से लेन-देन की स्थिति नाजुक है. नवंबर 1989 तक, जब हमारी पार्टी सत्ता में थी, तब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्वास मजबूत था. लेकिन उसके बाद आई राजनीतिक अस्थिरता, सरकार के बढ़ते खर्च और खाड़ी युद्ध के कारण यह विश्वास कमजोर हो गया. विदेशों से आने वाले पैसे में भी कमी आई है. इस कारण, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से जुलाई 1990 और जनवरी 1991 में काफी ऋण लेने के बावजूद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम हो गया है. दिसंबर 1990 से ही हम मुश्किल में हैं और अप्रैल 1991 से स्थिति और भी गंभीर हो गई है.”

“विदेशी मुद्रा की कमी के कारण देश के विकास और आर्थिक तरक्की पर बुरा असर पड़ रहा है. देश के अंदर और बाहर की स्थिति भी अनुकूल नहीं है, जिससे महंगाई बहुत बढ़ गई है. आम आदमी को महंगाई का सामना करना पड़ रहा है, जिससे गरीब लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है. देश की अर्थव्यवस्था बहुत ही नाजुक स्थिति में है. आजाद भारत के इतिहास में हमने ऐसा संकट पहले कभी नहीं देखा.”
“केंद्र सरकार का आंतरिक कर्ज GDP का लगभग 55% हो गया”
बजट भाषण में मनमोहन सिंह ने कहा था, “भारत की राजकोषीय व्यवस्था गंभीर संकट से जूझ रही है. 1990-91 में GDP का 8% से ज्यादा हो गया है. 1980 के दशक की शुरुआत में यह 6% और 1970 के दशक के मध्य में 4% था. इस राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ा है. इस कारण केंद्र सरकार का आंतरिक कर्ज GDP का लगभग 55% हो गया है. सिर्फ ब्याज भुगतान ही GDP का लगभग 4% है और केंद्र सरकार के कुल खर्च का लगभग 20% है.”
“अब समय आ गया है कि हम अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए कड़े कदम उठाएं. सरकार और अर्थव्यवस्था दोनों ही अपनी सीमा से ज्यादा खर्च नहीं कर सकते. अगर हम आर्थिक सुधारों में और देरी करते हैं, तो हालात बेकाबू हो जाएंगे और महंगाई बर्दाश्त से बाहर हो जाएगी.”
मनमोहन सिंह ने बजट में क्या-क्या ऐलान किए
कंपनियों पर पहले से ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा. कॉर्पोरेट टैक्स की दर 5% बढ़ाकर 45% कर दी गई. बैंक पर रखे गए पैसे पर कुछ टैक्स लगाया गया, जिसे डीटीएस कहा गया. रसोई गैस सिलेंडर, खाद और पेट्रोल की कीमतें बढ़ा दी गईं. पहले चीनी सस्ती मिलती थी क्योंकि सरकार इस पर सब्सिडी देती थी, लेकिन अब यह सब्सिडी हटा दी गई. सरकार ने निजी कंपनियों को म्यूचुअल फ़ंड शुरू करने की अनुमति दी और विदेशों में रहने वाले लोगों के लिए भारत में निवेश करना आसान बनाया.
यह बजट भारत के लिए एक नई शुरुआत था. इसमें लिए गए कड़े फैसलों से लोगों को कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन इन फैसलों से भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में मदद मिली और भारत ने तेज आर्थिक विकास की राह पकड़ी.
काले धन को सफेद करने की योजना
इस बजट में काले धन को सफेद करने के लिए एक खास योजना की घोषणा की गई. इस योजना के तहत लोगों को अपना काला धन घोषित करने का मौका दिया गया. ऐसा करने पर उन पर कोई मुकदमा नहीं चलाया जाएगा. उनसे कोई ब्याज या जुर्माना भी नहीं लिया जाएगा.
मनमोहन सिंह ने कहा था, “सरकार जानती है कि बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी हो रही है, आय के मामले में और संपत्ति के मामले में भी. अगर अगले कुछ महीनों में टैक्स चोरी में कमी नहीं आती है, तो सरकार के पास कड़ी कार्रवाई करने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं होगा. टैक्स चोरी करने वालों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. लेकिन कड़ी कार्रवाई करने से पहले, मैं टैक्स चोरी करने वालों को एक आखिरी मौका देना चाहता हूं कि वे अपना काला धन घोषित कर दें. इस तरह से इकट्ठा किए गए काले धन का इस्तेमाल झुग्गी बस्तियों को हटाने और ग्रामीण गरीबों के लिए सस्ते घर बनाने जैसे सामाजिक कार्यों के लिए किया जाएगा.”

विदेशी कंपनियों के लिए भारत के दरवाजे खुले
वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने कई महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिन्हें ‘1991 का आर्थिक उदारीकरण’ कहा जाता है. इन सुधारों का मुख्य उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘लाइसेंस राज’ से मुक्त करना और उसे वैश्विक बाजार के लिए खोलना था. इससे पहले, अधिकांश उद्योगों को शुरू करने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था, जो एक लंबी और जटिल प्रक्रिया थी. अब कई क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों को सीधे निवेश करने की अनुमति दी गई और विदेशी इक्विटी की सीमा को बढ़ाया गया.
मनमोहन सिंह ने बजट भाषण में कहा था, “40 सालों तक उद्योगों को बढ़ावा देने की योजना बनाने के बाद अब हम विकास के उस मुकाम पर पहुंच गए हैं जहां हमें विदेशी निवेश से डरने के बजाय उसका स्वागत करना चाहिए. हमारे उद्यमी किसी से कम नहीं हैं. हमारा उद्योग अब परिपक्व हो गया है. विदेशी निवेश से हमें पूंजी, तकनीक और बाजारों तक पहुंच मिलेगी. यह हमारे उद्योगों को धीरे-धीरे विदेशी प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करेगा.”
“कुछ खास जरूरी उद्योगों में 51 फीसदी तक विदेशी हिस्सेदारी की अनुमति होगी, अगर विदेशी पैसा मशीनें खरीदने के लिए काफी हो और कंपनी अपने मुनाफे के बराबर निर्यात करे. निर्यात करने वाली कंपनियों में 51 फीसदी तक विदेशी हिस्सेदारी की अनुमति होगी. बड़ी विदेशी कंपनियों से बातचीत करने और कुछ खास क्षेत्रों में निवेश को मंजूरी देने के लिए एक बोर्ड बनाया जाएगा. यह उन बड़े निवेशों को आकर्षित करने के लिए है जो हमें अच्छी तकनीक और विश्व बाजार तक पहुंच दिला सकें.”
पेट्रोल की कीमतें भी बढ़ी
तब मनमोहन सिंह ने पेट्रोल, LPG और कुछ अन्य पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होने की बात कही थी. लेकिन गरीबों को राहत देने के लिए मिट्टी का तेल सस्ता किया गया था. डीजल की क़ीमत नहीं बढ़ाई गई और किसानों के हितों का भी ध्यान रखा गया.
तत्कालीन वित्त मंत्री ने कहा था, जुलाई 1991 में रुपये के कीमत में कमी होने से कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के आयात का खर्च बढ़ जाएगा. इसलिए, घरेलू उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ाना जरूरी है. पेट्रोल, घरेलू LPG और घरेलू उपयोग के लिए विमानन टरबाइन ईंधन की कीमतों में 20% की बढ़ोतरी होगी. डीजल और गैर-औद्योगिक इस्तेमाल के लिए मिट्टी के तेल को छोड़कर बाकी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में 10% की बढ़ोतरी होगी. गैर-औद्योगिक उपयोग के लिए मिट्टी के तेल की कीमत में 10% की कमी की जाएगी. डीजल की कीमत में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी.”
बजट के बाद भी जारी रहे सुधार
बजट के बाद अगले आठ महीनों में सरकार ने आर्थिक सुधारों को जारी रखने के लिए कई और कदम उठाए. निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नई व्यापार नीतियां बनाई गईं. छोटी कंपनियों को विकसित करने के लिए खास योजनाएं बनीं. वित्तीय क्षेत्र में सुधार के लिए आरबीआई के पूर्व गवर्नर एम नरसिम्हम की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई. टैक्स सुधारों के लिए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री राजा चेल्लैया की अध्यक्षता में समिति बनी.
इसके अलावा, 1991 में भारत सरकार ने रुपये की कीमत कम करने का फैसला लिया. यह फैसला दो चरणों में लिया गया. 1 जुलाई 1991 को रुपये की कीमत मुख्य विदेशी मुद्राओं के मुकाबले 9% तक कम कर दी गई. फिर दो दिन बाद 3 जुलाई को रुपये की कीमत फिर से 11% तक कम कर दी गई. रुपये की कीमत कम करने से भारतीय सामान विदेशों में सस्ते हो गए. इससे भारतीय सामान की मांग बढ़ने और निर्यात बढ़ने की उम्मीद बढ़ी. भारत को विदेशी मुद्रा कमाने में मदद मिली.
विरोध के बावजूद ऐतिहासिक कदम
मनमोहन सिंह के इस बजट को जब पेश किया गया, तो इसके खिलाफ कई राजनीतिक दलों ने विरोध किया था. विपक्ष ने इसे जनता के खिलाफ और अमीरों के पक्ष में बताया. लेकिन मनमोहन सिंह ने अपनी नीतियों का दृढ़ता से बचाव किया और आर्थिक सुधारों के महत्व को स्पष्ट किया. उनका कहना था कि अगर ये सुधार नहीं किए गए, तो भारत को आर्थिक रूप से पूरी तरह से संकट का सामना करना पड़ सकता था.
मनमोहन सिंह के द्वारा किए गए सुधारों का असर जल्द ही दिखने लगा. भारत की आर्थिक वृद्धि दर में वृद्धि हुई, विदेशी निवेश बढ़ा और देश के विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार हुआ. 1991 के बाद से भारत ने लगातार उच्च वृद्धि दर हासिल की और एक वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ाया.







