अब यह बात बिल्कुल साफ हो गई है कि इस बार लोकसभा के चुनाव में भाजपा अपने पारंपरिक मुद्दों के अलावा भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाने वाली है। जिस तरह भ्रष्टाचार की परतें उधेड़ने में केंद्र सरकार की एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं और पीएम नरेंद्र मोदी ने उन्हें खुली छूट दे दी है, उससे तो यही लगता है। हिंदुत्व और राष्ट्रीयता भाजपा के पारंपरिक मुद्दे रहे हैं। इस बार भाजपा अपना तीसरा सबसे बड़ा और नवीनतम चुनावी हथियार भ्रष्टाचार को बनाएगी। विपक्षी नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ केंद्र सरकार की जांच एजेंसियों की कार्रवाई को बदले की भावना और राजनीतिक रंजिश करार देने की पुरजोर कोशिश करते रहे हैं। इन्हीं आधारों पर वे अदालतों तक जाते रहते हैं। पर, अच्छी और स्वागत योग्य बात यह है कि अदालतों से भी उन्हें अभी तक कोई बड़ी राहत नहीं मिली है। वे जनता के बीच जाते हैं तो भाजपा के खिलाफ इसे ही मुद्दा बनाते हैं। उनका आरोप है कि जान-बूझकर बीजेपी विपक्षी नेताओं को परेशान कर रही है। जनहित का कोई मुद्दा तो अभी तक विपक्ष के पास है ही नहीं। कांग्रेस के नेता तो जनता को यह कह कर बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर इस बार नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो देश में लोकतंत्र ही समाप्त हो जाएगा। चुनाव की कोई नौबत ही नहीं आएगी। ऐसा कहते समय वे या उनके जैसे नेता यह भूल जाते हैं कि भारत की गिनती विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में होती है। अब तो भारत के प्रति बड़े-बड़े सूरमा देशों का भी भ्रम दूर हो गया है।
जनता के लिए अग्नि परीक्षा साबित होगा चुनाव
इस बार का लोकसभा का चुनाव जनता के लिए भी किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। इसलिए कि उसे दो में से किसी एक का ही चुनाव करना है। जनता क्या अपनी गाढ़ी कमाई के लुटेरों को सत्ता सौंपने के लिए तैयार होगी या लुटेरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई पर आमादा नरेंद्र मोदी का चयन करेगी, यह इस बार के लोकसभा चुनाव में साफ हो जाएगा। जो लोग यह मानते रहे हैं कि भाजपा सिर्फ हिन्दू भावनाओं को भुनाने वाली पार्टी मात्र है, उन्हें दो बार से केंद्र में बैठती आई भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई भी तो दिख ही रही होगी। देश में सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स जैसे महकमे पहली बार नहीं बने हैं और न नरेंद्र मोदी की सरकार की ये देन हैं। सच तो यह है कि इनकी स्थापना तो पूर्ववर्ती उन्हीं सरकारों ने किया था, जिनके नेता आज इनकी गिरफ्त में धड़ल्ले से आने लगे हैं।
वैधानिक संस्थाओं का विपक्ष अपमान कर रहा
भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को विपक्षी नेता बदले की कार्रवाई बता कर विधि सम्मत गठित केंद्रीय संस्थाओं का जिस तरह अपमान करते रहे हैं या उन पर सवाल उठाते रहे हैं, वह अलग ही चिंता की बात है। सीबीआई, ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों का गठन कांग्रेस शासन के दौरान ही हुआ है। उन्हें जांच या धर-पकड़ के अधिकार भी नरेंद्र मोदी की सरकार ने नहीं दिए हैं। सच तो यह है कि अभी तक इन एजेंसियों को सही तरीके से अपना काम ही नहीं करने दिया गया। पूर्ववर्ती सरकारों ने इन्हें पंगु बना कर रखा था। कभी-कभार ये एजेंसियां सक्रिय होती भी थीं तो ऐसा वे सत्ता में बैठे लोगों के इशारे पर ही। यही वजह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जैसी देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी को कांग्रेस राज में सरकारी तोता तक बता दिया था। आज जो विपक्ष में बैठे हैं, उनके खिलाफ अब यही एजेंसियां खुले मन से कार्रवाई करने लगी हैं। कल तक इनको पंगु बना कर रखने वाले नेताओं को अब इनका काम बदले की कार्रवाई नजर आता है।
कोई बुलाने पर नहीं आ रहा तो कहीं हमले हो रहे
झारखंड में सीएम रहते हेमंत सोरेन पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो ईडी ने उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया। उन्हें प्रवर्तन निदेशलाय (ईडी) ने 10 समन जारी किए। वे पहले तो समन को नकारते रहे। बचाव के लिए वकीलों से सलाह लेते रहे। अदालतों का चक्कर काटते रहे। राहत नहीं मिली तो ऐंठ के साथ अपने आवास पर एजेंसी को आने के लिए कहा। आखिरकार उन्हें गिरफ्तार होना पड़ा। यह भी सच है कि जब तक आरोप साबित नहीं हो जाता, उन्हें अपराधी नहीं माना जा सकता। वे लगातार कहते रहे कि राजनीतिक रंजिश में उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है। कुछ देर के लिए इसे सही भी मान लिया जए तो अदालतों की व्यवस्था तो इसी काम के लिए है न। अदालतों के निर्णय आने तक जांच एजेंसियों को सहयोग करने में किसी को क्यों परेशानी होनी चाहिए। आम आदमी ऐसे मामलों से रोज दो-चार होता है। उसे तो किसी ने पूर्व निर्धारित जांच व्यवस्था को नकारते कभी नहीं देखा है। पश्चिम बंगाल में जांच करने गई ईडी की टीम पर हमले हुए। अफसरों के वाहन तोड़े गए और मार-पीट कर जख्मी कर दिया गया। वे तो अपनी ड्यूटी करने गए थे। अगर किसी को अपना बचाव करना है तो वह अदालत की शरण क्यों नहीं लेता। क्यों बनी-बनाई वैधानिक व्यवस्था पर सवाल उठाए जाते हैं, यह आम आदमी की समझ से परे नहीं है।
केजरीवाल ने पांचवां समन नकारा, हाजिर नहीं हुए
दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल से ईडी शराब घोटाले में पूछताछ करना चाहता है। उन्हें ईडी ने पांच समन भेजे। वे हर बार टालते रहे हैं। पांचवां समन देकर ईडी ने उन्हें शुक्रवार को ही बुलाया था। बिहार में लालू यादव के परिवार के लोग भी ईडी और सीबीआई के निशाने पर हैं। कई बार वे भी टाल-मटोल करते रहे हैं। जब वे जांच के लिए जाते हैं तो समर्थकों का हुजूम जुटाते हैं। नारेबाजी कराते हैं। झारखंड के पूर्व सीएम हेमंत सोरेन ने बाजाप्ता ईडी अफसरों के छापे से नाराज होकर उनके खिलाफ एससी-एसटी थाने में केस ही दर्ज करा दिया। ईडी की टीम 20 जनवरी को जब उनसे पूछताछ करने गई तो बंगाल की घटना से सबक लेते हुए केंद्रीय बलों को तैनात करना पड़ा। केंद्रीय बलों के खिलाफ भी केस दर्ज हुए। मान लेते हैं कि केस करना किसी का भी हक हो सकता है, पर अपने खिलाफ जांच से ही ये नेता क्यों बेचैन हो जा रहे हैं।
ईडी ने करप्शन मामले में कई को किया अरेस्ट
प्रीवेंशन आफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत ईडी लगातार नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। अभी तक सौ से अधिक लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो भी चुकी है। कई नेता गिरफ्तार भी हो चुके हैं। पश्चिम बंगाल में मंत्री रहते पार्थ चटर्जी और ज्योतिप्रिय मल्लिक को ईडी ने गिरफ्तार किया है। बंगाल की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी के कई नेता पकड़े गए हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, दिल्ली सरकार में मंत्री रहे सत्येंद्र जैन, मनीष सिसोदिया, झारखंड के सीएम और जेएमएम नेता हेमंत सोरेन के अलावा तमिलनाडु में डीएमके सरकार में मंत्री रहे सेंथिल बालाजी को ईडी ने गिरफ्तार कर जेल भेजा है। ईडी के निशाने पर अभी ममता बनर्जी के भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी, छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल, बिहार के पूर्व डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के सिर पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। यूं समझिए कि हेमंत सोरेन तो इस साल लोकसभा चुनाव 2024 से पहले शुरुआत भर हैं।







