नीतीश कुमार के एक पैंतरे से विपक्ष हलकान-परेशान है। विपक्षी नेताओं के पटना में पहले जुटान से वर्चुअल बैठक तक उनको संयोजक बनाए जाने की चर्चा होती रही। इसमें हो रहे विलंब को लेकर उनके नाराज होने की खबरें भी आईं। राहुल गांधी और उद्धव ठाकरे ने उन्हें मनाने की कोशिश भी की। राहुल गांधी ने वर्चुल बैठक में इस बात का रहस्य भी खोल दिया कि क्यों नीतीश को संयोजक बनाने में देर हो रही है। फिर नीतीश के नाम का प्रस्ताव भी उन्होंने ही किया। बैठक में शामिल हुए लोगों ने इस पर हामी भी भरी। पर, नीतीश ने बड़ी शालीनता से राहुल का प्रस्ताव ठुकरा दिया। इंडी अलायंस के पार्टनर समेत तमाम लोग आश्चर्य में हैं कि नीतीश ने ऐसा क्यों किया! नीतीश कुमार समझदार, अनुभवी और अच्छे गुणों से लैस नेता हैं। उन्होंने कुछ सोच-समझ कर ही फैसला लिया होगा।
अब सवाल उठ रहे हैं कि नीतीश कुमार आखिर संयोजक के पद से इनकार क्यों कर रहे हैं? बिहार में इसको लेकर चर्चा है कि NDA में जिस तरह से जॉर्ज फर्नांडिस ने भूमिका निभाई थी, वो I.N.D.I.A में नहीं निभाएंगे। दूसरे और भी कारण बताए जा रहे हैं।
बैठक के बाद बिहार सीएम हाउस से बाहर आए मंत्री संजय झा ने कहा कि बैठक में केवल संयोजक के मुद्दे पर बात हुई है। बैठक में नीतीश कुमार को संयोजक बनाने का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन नीतीश कुमार ने इस पर अपनी सहमति नहीं दी है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को ही चेयरमैन बनना चाहिए। संजय झा ने कहा कि पार्टी इस पर आगे क्या निर्णय लेगी ये बैठक के बाद तय किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सीट शेयरिंग या अन्य मुद्दों पर किसी प्रकार की कोई बातचीत नहीं हुई। बैठक में बिहार से नीतीश कुमार के अलावा जदयू संजय झा और ललन सिंह, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव शामिल हुए।
अब समझिए नीतीश कुमार का संयोजक पद से इनकार करने के मायने
1. संयोजक बन कर कुछ हासिल होने वाला नहीं था
शायद नीतीश यह बात समझ रहे हैं कि अब संयोजक बन कर वे क्या करेंगे। पीएम तो बनने से रहे। इसलिए कि ममता बनर्जी ने मल्लिकार्जुन खरगे का नाम पहले ही प्रस्तावित कर दिया है। चुनाव सिर पर है। यह भी सबको पता है कि अयोध्या में 22 जनवरी के राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद किसी वक्त लोकसभा चुनाव का ऐलान हो सकता है। सीटों के बंटवारे का काम अब भी उलझा हुआ है। बिहार में सीटों पर सहमति नहीं बन पाई। उत्तर प्रदेश में सीटों को लेकर घमासान मचा है। ममता बनर्जी बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों से बिदकी हुई हैं। महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे सीटों की जिद पर अड़े हुए हैं। नीतीश कुमार अगर संयोजक का पद स्वीकार कर लेते तो उन्हें ऐसे ही लफड़ों से पहले दो-चार होना पड़ता। मान लेते हैं कि नीतीश इस लफड़े को सुलझाने में कामयाब भी हो जाते तो उन्हें हासिल क्या होता? बिहार की गद्दी छिनने का खतरा बढ़ जाता और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी कोई मुकम्मल भूमिका भी नहीं रहती।
2. बिहार की सत्ता छोड़ने का आरजेडी दबाव बनाता
आरजेडी ने नीतीश को साथ लाने का फैसला ही इसीलिए किया था कि वे बिहार की गद्दी लालू यादव के बेटे और बिहार के डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव को सौंप कर राष्ट्रीय राजनीति में जाएंगे। उन्हें तो आरजेडी नेताओं ने विपक्ष के पीएम फेस बनाने का भरोसा भी दिया था। आरजेडी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने खुल्लमखुल्ला कहा था कि नीतीश जी को लालू जी ने पीएम बनने का आशीर्वाद दे दिया है। लालू का आशीर्वाद कभी बेकार नहीं जाता। इंद्र कुमार गुजराल, एचडी देवेगौड़ा जैसे नेता पीएम बने तो उसमें लालू की ही भूमिका थी। आफर आकर्षक था। इसलिए कि तत्काल उनकी सीएम की कुर्सी पर कोई खतरा नजर नहीं आ रहा था। हालांकि नीतीश ने यहां भी आरजेडी के मंसूबों को यह कह कर ध्वस्त कर दिया था कि 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव तेजस्वी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। यानी बड़ी चालाकी से उन्होंने 2025 तक टाइम बाई कर लिया। संयोजक बनने का प्रस्ताव कबूल करते तो नीतीश पर सीएम की कुर्सी छोड़ने का आरजेडी दबाव बनाता। नीतीश भी नैतिक रूप से मजबूर होते। इसलिए कि संयोजक बनने के बाद दो भूमिकाएं निभानी आसान नहीं होतीं। नीतीश कुमार सीएम की निश्चित कुर्सी छोड़ अनिश्चित भविष्य की गाड़ी के सवार बन कर रह जाते।
3. कांग्रेस को उसके ही अंदाज में नीतीश ने समझाया
नीतीश कुमार को कांग्रेस से कोफ्त तो उसी दन हो गई थी, जब सोनिया से मिलने के लिए उन्हें लालू यादव का सहारा लेना पड़ा। मुलाकात हुई भी तो कंक्रीट जवाब सोनिया ने नहीं दिया। इस बीच नीतीश याचक भाव से कांग्रेस नेताओं से विनती करते रहे कि विपक्ष को एकजुट करने में विलंब घातक होगा। कभी सलमान खुर्शीद के सामने उन्होंने आग्रह किया तो कभी प्रदेश स्तर के नेताओं के माध्यम से अपना संदेश कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाने की कोशिश की। आखिरकार कांग्रेस ने उन्हें विपक्षी एकजुटता का काम आगे बढ़ाने के लिए ग्रीन सिग्नल तो दिया, लेकिन जैसे ही नीतीश ने डेढ़ दर्जन दलों को जुटाया, कांग्रेस ने कमान अपने हाथ में ले ली। नीतीश की भूमिका दूसरी से पांचवीं बैठक तक एक सामान्य साझीदार दल के नेता की रह गई। गठबंधन के फैसले कांग्रेस लेती रही। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस ने गठबंधन की गतिविधियां ठप कर दीं। इसके लिए नीतीश कांग्रेस को कोसते रहे। इस बीच नीतीश को संयोजक बनाए जाने की चर्चा भी चलती रही। नीतीश की पार्टी में विघटन का खतरा भी उन्हें अलायंस पार्टनर आरजेडी से दिखने लगा। ममता बनर्नी तो नीतीश को संयोजक बनने के खिलाफ ही थीं। यह बात भी बैठक में राहुल गांधी ने ही बताई। नीतीश के सयोजक बनने से इनकार की एक नहीं, ऐसी कई वजहें रहीं, जो कांग्रेस ने पैदा की।
4. इंडी अलायंस का भविष्य अच्छा नहीं दिख रहा हो
नीतीश कुमार को इंडी अलायंस का हश्र भी शायद 2019 की तरह दिख रहा होगा। टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र प्रदेश का सीएम रहते वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले विपक्ष की ऐसी ही गोलबंदी की थी। बाद गठबंधन की गांठें तो छितरा ही गई थीं, नायडू का सीएम पद भी चला गया। ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे जैसे गठबंधन में शामिल नेताओं के हाव-भाव से तो यही लगता है कि आखिरी वक्त तक इडी अलायंस अक्षुण्ण रह भी पाएगा या नहीं। बीजेपी के राम मंदिर अभियान से देश में भगवा लहर चल रही है। विपक्ष के कई नेता राम और सनातन को लेकर अपनी बयानबाजी से भाजपा के मजबूत होने की राह आसान कर रहे हैं। नीतीश ने हर धर्म के प्रति सम्मान का भाव अभी तक रखा है। संभव है कि नीतीश के मन में गठबंधन के भविष्य को लेकर शंका पैदा हो गई हो।
5. सीट शेयरिंग में देरी और कांग्रेस के रवैये से नीतीश नाराज
चौथी बैठक के बाद नीतीश कुमार की लगातार नाराजगी की चर्चा सामने आ रही है। नीतीश कुमार भी कई मौकों पर इस बात का जिक्र कर चुके हैं कि कांग्रेस के कारण गठबंधन में कई फैसले लेने में देरी हो रही है। नीतीश कुमार चाहते थे कि दिसंबर तक सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय हो जाए, लेकिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के कारण कांग्रेस ने इसे नजरअंदाज किया। पॉलिटिकल एक्सपर्टी की मानें तो नीतश कुमार को अब लगने लगा है कि वो भले इस गठबंधन के सूत्रधार हैं, लेकिन अब वह पूरी तरह हाशिए पर हैं। न ही उनके एजेंडे को तवज्जो दिया जा रहा है और न ही उनकी बातों को माना जा रहा है। यही कारण है कि नीतीश कुमार की पार्टी के नेता पहले नीतीश कुमार को पीएम कैंडिडेट बनाने की घोषणा की। इसके बाद अब वे खुलकर बोलने लगे हैं कि जेडीयू 17 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। जबकि अभी तक सीट शेयरिंग पर कोई फैसला नहीं हो पाया है।
6. एनडीए के लिए ऑप्शन खुला रखना चाहते हैं नीतीश
ललन सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा कर पार्टी की कमान अपने हाथों में लेने के बाद इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए का ऑप्शन भी खुला रखना चाहते हैं। इस बीच एक तरफ जहां पूरा विपक्ष राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा की आलोचना कर रहा है तो जेडीयू की तरफ से दो टूक कह दिया है कि आस्था और आराध्य पर इस तरह का बयान देने वाले को जनता बर्दाश्त नहीं करेगी। हालांकि बीजेपी की तरफ से फिलहाल इस मामले पर कोई भी नेता खुल कर नहीं बोल रहे हैं। एक्सपर्ट कहते हैं कि फिलहाल ये संभव होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। जब तक की नीतीश कुमार बीजेपी की शर्तों को नहीं मान लेते हैं।
7. संयोजक बनाने पर चौथी मीटिंग के बाद से ही मंथन
नीतीश कुमार को संयोजक बनाने को लेकर पिछले 15 दिनों से इस पर मंथन चल रहा है। 19 दिसंबर को दिल्ली में हुई गठबंधन की चौथी बैठक में बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पीएम कैंडिडेट बनाने का प्रस्ताव पेश किया था। इसके बाद से सीएम नीतीश कुमार नाराज बताए जा रहे थे। इस बीच 29 दिसंबर को अचानक उन्होंने जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह को हटा खुद पार्टी की कमान अपने हाथ में ले ली।
अब समझिए नीतीश के नाम पर क्यों बचते रहे गठबंधन के नेता
1. विधानसभा प्रकरण के बाद छवि को नुकसान पहुंचा
INDIA गठबंधन की बैठकों के बीच बिहार विधानसभा के शीतकालीन सत्र में नीतीश कुमार के जनसंख्या नियंत्रण को लेकर दिए गए बयान पर देश भर में आलोचना हुई। इस बयान पर बीजेपी ने नीतीश कुमार को देश भर में घेरा। हालांकि बाद में नीतीश कुमार ने अपने इस बयान के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी। लेकिन इस प्रकरण के बाद नीतीश कुमार की छवि को काफी नुकसान पहुंचा।
2. कभी भी NDA के साथ जाने का खतरा
पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते हैं कि नीतीश कुमार अपने लिए सभी ऑप्शन खुला रखना चाहते हैं, लेकिन मौजूदा सियासत में वे फिलहाल बुरी तरह घिरे हुए दिख रहे हैं। ललन सिंह के इस्तीफे के बाद ऐसा माना जा रहा था कि नीतीश कुमार एक बार फिर से बीजेपी के साथ डील करना चाह रहे हैं। लेकिन जेडीयू और बीजेपी की तरफ से इनकार कर दिया गया है। ऐसे में नीतीश कुमार के रेकॉर्ड को देखते हुए गठबंधन के नेताओं का नीतीश कुमार पर भरोसा कर पाना मुश्किल हो रहा।
इधर, मांझी ने कसा तंज
नीतीश कुमार की तरफ से इंडिया गठबंधन में संयोजक का पद स्वीकार नहीं करने पर पूर्व सीएम जीतन राम मांझी ने तंज कसा है। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा है कि अब किसी को ‘राजा’ बनाने का सपना दिखाकर ‘सेनापति’ बना दिजिएगा तो उ काहे सेनापति बनेगा? जवाब तो लालू जी को देना चाहिए कि आखिर ऊ नीतीश जी के साथ ऐसा काहे किएं? “अच्छा भला आदमी को सपना दिखाकर कईसा बना दिया है सब”। हम बहुत दुखी हैं।







