पिछले दो लोकसभा चुनावों की तरह 2024 चुनाव से पहले बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग तेज होने लगी है। बिहार में जातीय गणना की रिपोर्ट जारी होने और इसके आधार पर आरक्षण का दायरा बढ़ाने के बाद अब सीएम नीतीश कुमार इस मुद्दे पर केंद्र की मोदी सरकार को घेरने की तैयारी में हैं। उन्होंने ऐलान किया है कि विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिला तो राज्य भर में आंदोलन करेंगे। नीतीश कैबिनेट ने इस संबंध में प्रस्ताव पास कर केंद्र को मंजूरी के लिए भेजा है।
नीतीश कुमार की इस मांग को चुनावी शिगूफा बताने वाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव भी उनके साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा है कि अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिला तो केंद्र से नरेंद्र मोदी सरकार को उखाड़ फेकेंगे।
ऐसे में सवाल है कि विशेष राज्य का दर्जा होता क्या है? इसके मिल जाने से क्या लाभ मिलेगा? क्या बिहार को ये दर्जा मिल पाना संभव है या ये बस एक चुनावी मुद्दा भर है।
1. विशेष राज्य का दर्जा क्या है और कैसे मिलता है ?
बिहार लोक वित्त और नीति संस्था के एसोसिएट प्रोफेसर और अर्थशास्त्री सुधांशु कुमार बताते हैं कि संविधान में विशेष राज्य का दर्जा देने का प्रावधान नहीं है। इसकी शुरुआत 5वें केंद्रीय वित्त आयोग की अनुशंसा से हुई । इनमें वे राज्य थे, जो अन्य राज्यों की तुलना में भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक संसाधनों के लिहाज से पिछड़े थे। नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल ने पहाड़, दुर्गम क्षेत्र, कम जनसंख्या, आदिवासी इलाका, अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर, प्रति व्यक्ति आय और कम राजस्व के आधार पर इन राज्यों की पहचान की।
विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए लिए जो तरीका अपनाया गया है, वो गार्डगिल फॉर्मूला के नाम से जाना जाता है। इसमें कुछ क्राइटेरिया तय किया गया है। इसके मुताबिक चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों, ऐसे राज्य जो अंतर्राष्ट्रीय सीमा के आसपास हैं और वहां इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना बहुत जरूरी है। इसके साथ ही आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों को सहायता देने के लिए विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था।
2. पहली बार कब और अब तक कितने राज्यों को मिला है विशेष राज्य का दर्जा
1969 में पांचवें वित्त आयोग ने गार्डगिल फॉर्मूूले के तहत पहली बार 3 राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया था। इनमें असम, नगालैंड और जम्मू-कश्मीर थे। देश में अब तक 11 राज्यों को विशेष दर्जा मिला है। इनमें अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड शामिल हैं। 1969 तक केंद्र के पास राज्यों को अनुदान देने का कोई निश्चित मानक नहीं था, तब केंद्र की ओर से राज्यों को सिर्फ योजना आधारित अनुदान राशि दी जाती थी।
3. विशेष राज्य का दर्जा पाने वाले राज्यों को क्या फायदा है?
अर्थशास्त्री और पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य नवल किशोर चौधरी के मुताबिक विशेष राज्य का दर्जा पाने वाले राज्यों को केंद्र सरकार द्वारा दी गई राशि में 90% अनुदान और 10% रकम बिना ब्याज के कर्ज के तौर पर मिलती है। दूसरी श्रेणी के राज्यों को केंद्र सरकार द्वारा 30% राशि अनुदान के रूप में और 70% राशि कर्ज के रूप में दी जाती है। अनुदान वाली राशि केंद्र को नहीं लौटानी होती है। हालांकि, ऋण लौटाना पड़ता है। इसके अलावा विशेष राज्यों में इंडस्ट्री लगाने को लेकर टैक्स में छूट दी जाती है। एक्साइज, कस्टम, कॉर्पोरेट, इनकम टैक्स आदि में भी रियायत मिलती है।
4. विशेष राज्य का दर्जा पाने वाले राज्य को कोई लाभ मिला ?
इस सवाल पर नवल किशोर चौधरी कहते हैं कि ये एक गंभीर सवाल है। ऐसा अभी तक नहीं हुआ है। अगर विशेष राज्य का दर्जा मिलने से राज्यों का विकास होता तो आज ऐसे राज्य विकसित राज्यों की श्रेणी में शामिल होते। इसके बाद भी वे पीछे हैं। ये सारे राज्य आज भी विकसित राज्यों की श्रेणी में शामिल नहीं हो पाए हैं।
उन्होंने कहा कि बिहार के सीएम को इन राज्यों के अनुभव से सीखना चाहिए। इस मुद्दे को उठाने की जगह लैंड रिफॉर्म्स कमीशन की रिपोर्ट और कॉमन स्कूल सिस्टम आयोग की अनुशंसा लागू करने पर फोकस करना चाहिए। बिहार की स्थिति को बदलने में ये काफी अहम साबित हो सकता है।
5. बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलने के राह में क्या रोड़े हैं?
अर्थशास्त्री नवल किशोर चौधरी कहते हैं कि इसके पीछे दो बड़े कारण हैं। एक ये कि विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए जो जरूरी शर्ते हैं, उसे बिहार पूरा नहीं करता है। दूसरा बड़ा कारण राजनैतिक है। विशेष राज्य की मांग करने वाले राज्यों की संख्या बढ़ गई है।अगर ये बिहार को मिलेगा तो झारखंड, उड़ीसा और बंगाल भी मांगेंगे। इनके अलावा भी कई राज्य हैं, जो इसके मानक पर खरा नहीं उतरते हैं। इसके बावजूद इसकी मांग करेंगे। इनकी मांगों को पूरा कर पाना केंद्र सरकार के लिए संभव नहीं है।
6. ये जायज मांग है या केवल चुनावी स्टंट है?
नवल किशोर चौधरी कहते हैं कि आज की तिथि में पूरी तरह पॉलिटिकल स्टंट है। नीतीश कुमार जब एनडीए के साथ सत्ता में रहते हैं, तब इसकी मांग नहीं करते हैं। जब एनडीए से बाहर होते हैं और राजनीति में उनका महत्व कमता है तो विशेष राज्य को एक मुद्दा बना कर खुद राज्य की राजनीति के साथ देश की राजनीति के अगुआ बनने की कोशिश करते हैं। नीतीश कुमार ने हमेशा राजनीतिक हथियार के रूप में इसका इस्तेमाल किया है।
7. जिस रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट का जिक्र नीतीश कुमार बार-बार कर रहे हैं वो क्या है?
समय-समय पर देश के अलग-अलग राज्यों से विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठने के बाद तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने रघुराम राजन कमेटी का गठन किया था। 2013 में ही इस कमेटी की रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में उन्होंने कहा था कि विशेष राज्य का दर्जा देने के कोई मायने नहीं है। इसके बदले राज्यों को उनकी जरूरत और प्रशासनिक दक्षता के आधार पर मदद दी जाए। आगे चल कर केंद्रीय वित्त आयोग ने भी लगभग इसी तरह की अनुशंसा की।
हालांकि, रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट के एक सदस्य शैबाल गुप्ता ने इस रिपोर्ट से असहमति जताते हुए अपनी राय रखी थी। उन्होंने इसमें अपनी असहमति जाहिर करते हुए लिखा था कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए।
8. रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट के बाद अब तक क्या कार्रवाई हुई है?
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट के बाद 14वें केंद्रीय वित्त आयोग ने भी माना कि विशेष राज्य का दर्जा देने की जगह राज्यों को अधिक राजकोषिय संसाधन दिए जाए। जिसका उपयोग राज्य अपनी विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने में कर सकेंगे। आयोग ने केंद्र सरकार के संपूर्ण कर से राजस्व संग्रह में राज्यों की हिस्सेदारी 32% से बढ़ाकर 42% किया जाए। इससे राज्यों को केंद्र से मिलने वाले राजस्व में वृद्धि हुई। 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के सामान ही 15वें वित्त आयोग की भी अनुशंसा की थी।







