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‘प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया’ की जगह ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ पर विवाद क्यों ……

UB India News by UB India News
September 7, 2023
in राष्ट्रपति भवन
0
‘प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया’ की जगह ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ पर विवाद क्यों ……
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G20 समिट में शामिल वर्ल्ड लीडर्स के लिए राष्ट्रपति भवन में 9 सितंबर को डिनर का आयोजन किया गया है। इसके लिए भेजे आमंत्रण पत्र में परंपरा से हटकर ‘प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया’ की जगह ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ लिखा है। इससे विवाद पैदा हो गया है।

क्या प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखना गैर-संवैधानिक है और कहां से आए दो नाम- इंडिया और भारत; अगर देश का अंग्रेजी नाम हटाना है तो क्या-क्या करना होगा, भास्कर एक्सप्लेनर में ऐसे 8 सवालों के जवाब जानेंगे…

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सवाल 1: भारत नाम का ओरिजिन कहां से हुआ और कैसे ये चलन में आया?

प्राचीनकाल से भारत के अलग-अलग नाम रहे हैं। जैसे जम्बूद्वीप, भारतखंड, हिमवर्ष, अजनाभवर्ष, भारतवर्ष, आर्यावर्त, हिन्द, हिन्दुस्तान और इंडिया। हालांकि, इनमें सबसे ज्यादा प्रचलित नाम भारत रहा है।

भारत शब्द का ओरिजिन

  • पौराणिक काल में भरत नाम के कई रेफरेंस मिलते हैं। जैसे- राजा दशरथ के बेटे और राम के छोटे भाई भरत। नाट्यशास्त्र के रचयिता भरतमुनि, पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के बेटे भरत जिनका जिक्र महाभारत में भी है। महाभारत में भरत को सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में गिना गया है।
  • पौराणिक मान्यताओं को आधार मानने पर भारत नाम के पीछे दुष्यंत के बेटे भरत का ही जिक्र आता है। ऋग्वेद की एक शाखा ऐतरेय ब्राह्मण में भी दुष्यंत के बेटे भरत के नाम पर ही भारत नामकरण का तर्क है। इसमें भरत को एक चक्रवर्ती राजा यानी चारों दिशाओं को जीतने वाला राजा कहा गया। ऐतरेय ब्राह्मण में इसका भी जिक्र है कि भरत ने चारों दिशाओं को जीतने के बाद अश्वमेध यज्ञ किया जिसके चलते उनके राज्य को भारतवर्ष कहा गया।
  • त्स्यपुराण में मनु को प्रजा को जन्म देने और उसका भरण-पोषण करने के कारण भरत कहा गया। जिस क्षेत्र पर मनु का राज था उसे भारतवर्ष कहा गया।
  • जैन धर्म के धार्मिक ग्रंथों में भी भारत नाम का जिक्र मिलता है। कहा जाता है कि भगवान ऋषभदेव के बड़े बेटे महायोगी भरत के नाम पर देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।
  • विष्णु पुराण में एक श्लोक है… उत्तर यत्समुद्रस्य हिताद्रेश्चैव दक्षिणम। वर्ष तत भारतम नाम भारती यत्र सन्ततिः।। यानी, जो समुद्र के उत्तर व हिमालय के दक्षिण में है, वह भारतवर्ष है और हम उसकी संतानें हैं।

    सवाल 2: इंडिया नाम का ओरिजिन कहां से हुआ, ये चलन में कैसे आया?

    सिन्धु नदी को ग्रीक भाषा में इंडस नाम से जानते थे। इंडस शब्द लैटिन भाषा से लिया गया है। यूनान के इतिहासकार हेरोटोस ने 440 ईसा पूर्व इंडिया शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने तुर्की और ईरान से इंडिया की तुलना करते हुए कहा था कि इंडिया स्वर्ग जैसा है। जहां की मिट्टी उपजाऊ है और जिस क्षेत्र में काफी ज्यादा आबादी रहती है।

    वर्ल्ड हिस्ट्री वेबसाइट के मुताबिक 300 ईसा पूर्व पहली बार यूनान के राजदूत मेगस्थनीज ने सिंधु नदी के पार के इलाके के लिए इंडिया शब्द का इस्तेमाल किया।

    मेगस्थनीज एक प्राचीन ग्रीक हिस्टोरियन, डिप्लोमेट और इंडियन एथनोग्राफर थे। उन्हें मौर्य साम्राज्य के वक्त भारत का ऐंबैस्डर कहा जाता है।
    मेगस्थनीज एक प्राचीन ग्रीक हिस्टोरियन, डिप्लोमेट और इंडियन एथनोग्राफर थे। उन्हें मौर्य साम्राज्य के वक्त भारत का ऐंबैस्डर कहा जाता है।

    हिन्द और हिन्दुस्तान शब्द का इतिहास भी लगभग 2500 साल पुराना है। माना जाता है कि बाहर से आने वाले लोग ‘स’ को ‘ह’ बोलते थे। इसलिए सिंध बन गया हिंद। आगे चलकर इस सभ्यता से जुड़े लोगों को हिंदू कहकर पुकारा जाने लगा और इस क्षेत्र को हिंदुस्तान।

    262 ईस्वी में ईरान के सासानी सम्राट शापुर प्रथम के नक्श-ए-रुस्तम शिलालेख में हिन्दुस्तान का उल्लेख है। यह भी माना जाता है कि हिंदुकुश की पहाड़ियों के पीछे का क्षेत्र हिंदुस्तान कहा जाता था।

    अरबों ने इस देश को अल हिन्द कहा और तुर्की के आक्रांताओं, दिल्ली के सुल्तानों और बादशाहों ने अपने भारतीय प्रभुत्व वाले भू-भाग का हिन्दुस्तान के रूप में उल्लेख किया।

    इतिहासकार इयान जे बैरो ने अपने आर्टिकल ‘फ्रॉम हिन्दुस्तान टु इंडिया: नेम्स चेंजिंग इन चेंजिंग नेम्स’ में लिखा है कि 18वीं शताब्दी के मध्यकाल से इसके अंत तक दुनिया के दूसरे हिस्से में हिंदुस्तान शब्द का इस्तेमाल अक्सर मुगल सम्राट के शासन वाले क्षेत्रों के लिए किया जाता था। 19वीं सदी में अंग्रेजों ने इंडिया शब्द का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू कर दिया।

    इसके बाद अंग्रेजों के असर की वजह से रियासतों के राजा भी अपने राज्यों में भारत नाम बोलने के लिए इंडिया शब्द का इस्तेमाल करने लगे थे। 1857 ईस्वी तक भारत के एक बड़े क्षेत्र पर अंग्रजों यानी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा हो गया। 1857 के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने उन इलाकों पर अधिकार कर लिया जो ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार क्षेत्र में थे। इसी समय इंडिया नाम का इस्तेमाल देश और दुनिया में तेजी से बढ़ा।

    सवाल 3: संविधान सभा में भारत के नामों पर क्या चर्चा हुई?

    भारत का संविधान मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया था। जो भी ड्राफ्ट पेश किया गया और बहस के दौरान जो भी प्रस्ताव रखे गए वो अंग्रेजी में थे। संविधान सभा की बहस के दौरान 17 सितंबर 1949 को ‘संघ का नाम और राज्य क्षेत्र’ खंड चर्चा के लिए पेश हुआ। जैसे ही अनुच्छेद 1 पढ़ा गया- ‘India, that is Bharat, shall be a Union of States’, संविधान सभा में इसे लेकर मतभेद उभर आए। फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्य हरि विष्णु कामथ ने अंबेडकर कमेटी के उस मसौदे पर आपत्ति जताई जिसमें देश के दो नाम इंडिया और भारत थे।

    इसके बाद उन्होंने संशोधन प्रस्ताव रखा जिसमें इंडिया की जगह भारत नाम सुझाया गया। एक अन्य सदस्य सेठ गोविंद दास ने कहा कि वेदों, महाभारत, कुछ पुराणों और चीनी यात्री ह्वेन-सांग के लेखों में भारत देश का मूल नाम था। इसलिए स्वतंत्रता के बाद संविधान में इंडिया को प्राथमिक नाम के रूप में नहीं रखा जाना चाहिए।

    भारतीय संविधान सभा का एक दृश्य। इसमें सरदार वल्लभ भाई पटेल और अन्य नेता बैठे दिख रहे हैं।
    भारतीय संविधान सभा का एक दृश्य। इसमें सरदार वल्लभ भाई पटेल और अन्य नेता बैठे दिख रहे हैं।

    संयुक्त प्रांत के पहाड़ी जिलों का प्रतिनिधित्व करने वाले हरगोविंद पंत ने स्पष्ट किया कि उत्तर भारत के लोग भारतवर्ष नाम चाहते हैं और कुछ नहीं। कॉन्स्टीट्यूशन कमेटी ने कोई भी संशोधन प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए और हमारे संविधान में देश का नाम भारत और इंडिया दोनों रखे गए। भारतीय संविधान की हिंदी कॉपी में आर्टिकल 1(1) में लिखा है, ‘भारत अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा’। यानी भारत और इंडिया दोनों को बराबर माना गया है।

    सवाल 4: G20 के डिनर आमंत्रण में ‘प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया’ की जगह ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ लिखना क्या गैर-संवैधानिक है?

    सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता के मुताबिक ये गैर-संवैधानिक नहीं है। भारत का संविधान मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया। इसके आर्टिकल 1 (1) में लिखा है- ‘India, that is Bharat, shall be a Union of States’। संविधान की हिंदी कॉपी में लिखा है ‘भारत अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा’। यानी हमारे देश का नाम भारत और इंडिया दोनों है। इन दोनों का इस्तेमाल संवैधानिक है। अगर इन दोनों नामों के इतर कोई हिंदुस्तान, आर्यावर्त या जंबूद्वीप लिखने लगे, तो इसे संविधान के खिलाफ माना जाएगा।

    ‘प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया’ की जगह ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ लिखकर एक परंपरा का निर्वहन नहीं किया गया है। इसे इसी रूप में देखना चाहिए, न कि संविधान के उल्लंघन के रूप में।

    सवाल 5: अगर ये गैर-संवैधानिक नहीं है, तो दिक्कत क्या है? इस पर कॉन्ट्रोवर्सी क्यों हो रही है?

    ये कॉन्ट्रोवर्सी राजनीतिक है। चूंकि विपक्षी दलों के गठबंधन ने अपना नाम INDIA रख लिया है, इसलिए मोदी सरकार ने इस नाम का इस्तेमाल कम कर दिया है। भारत नाम पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। विपक्ष इस पर आपत्ति जता रहा है।

    कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने लिखा, ‘ये खबर वाकई सच है। राष्ट्रपति भवन ने 9 सितंबर को G20 डिनर के लिए जो इनविटेशन भेजा है, उसमें परंपरा से उलट प्रेसिडेंट ऑफ India की जगह प्रेसिडेंट ऑफ Bharat लिखा गया है।’
    कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने लिखा, ‘ये खबर वाकई सच है। राष्ट्रपति भवन ने 9 सितंबर को G20 डिनर के लिए जो इनविटेशन भेजा है, उसमें परंपरा से उलट प्रेसिडेंट ऑफ India की जगह प्रेसिडेंट ऑफ Bharat लिखा गया है।’

    दिल्ली CM अरविंद केजरीवाल ने कहा, ‘INDIA नाम के अलायंस बनने के बाद ये देश का नाम बदल रहे हैं। अगर कल इंडिया अलायंस ने मीटिंग करके अपना नाम भारत रख लिया तो क्या ये भारत का नाम भी बदल देंगे और क्या ये भारत का नाम बीजेपी रख देंगे।’

    सवाल 6: अगर देश का अंग्रेजी नाम इंडिया खत्म करना है तो सरकार को क्या करना होगा?

    विराग गुप्ता के मुताबिक अगर देश का अंग्रेजी नाम इंडिया खत्म करके सिर्फ भारत करना है तो इसके लिए संविधान संशोधन करना पड़ेगा। संविधान संशोधन की प्रक्रिया आर्टिकल 368 में दी गई है। संसद के पास ये शक्ति है कि वो संविधान संशोधन कर सकती है। इसके लिए एक विधेयक लाना होगा और दो-तिहाई बहुमत से पारित करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट में 13 जजों की खंडपीठ ने केशवानंद भारती केस में ऐतिहासिक फैसला दिया था कि संविधान संशोधन से संविधान के बुनियादी ढांचे में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए।

    इस पूरे मामले को एक और तरीके से समझना चाहिए। सरकार ने हाल ही में तीन बड़े कानूनों में बदलाव का प्रस्ताव रखा है। इसमें इंडियन पीनल कोड की जगह भारतीय न्याय संहिता रखा है। इसका गैर-हिंदी भाषी राज्यों में विरोध हो रहा है। अगर सरकार ने इंडिया नाम खत्म किया तो इसका भी कई राज्य पुरजोर विरोध कर सकते हैं।

    सवाल 7: अगर इंडिया नाम खत्म हो गया तो क्या-क्या चुनौतियां आएंगी?

    अगर इंडिया नाम हटा दिया गया तो संविधान से लेकर तमाम संस्थाओं तक में इसे बदलना पड़ेगा। मसलन कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ भारत हो जाएगा, सुप्रीम कोर्ट ऑफ भारत हो जाएगा। इसी तरह तमाम वैश्विक संगठन जैसे- यूनाइडेट नेशंस की लिस्ट में इंडिया नाम ही चलता है। वहां भी संशोधन करने पड़ेंगे।

    सवाल 8: क्या देश का अंग्रेजी नाम इंडिया हटाने की पहले भी कोशिश हुई है?

    2012 में कांग्रेस सांसद रहे शांताराम नाइक ने राज्यसभा में एक बिल पेश किया था। इसमें उन्होंने मांग की थी कि संविधान की प्रस्तावना में अनुच्छेद एक में और संविधान में जहां-जहां इंडिया शब्द का उपयोग हुआ हो, उसे बदल कर भारत कर दिया जाए।

    उन्होंने इस मौके पर ‘भारत माता की जय’ के आजादी के नारे और ‘जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़ियां करती है बसेरा, वो भारत देश है मेरा’ गीत भी गाया था। उन्होंने कहा कि इंडिया शब्द से एक सामंतशाही शासन का बोध होता है, जबकि भारत से ऐसा नहीं है। शांताराम नाइक गोवा कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

    2014 में योगी आदित्यनाथ ने लोकसभा में एक निजी विधेयक पेश किया था। इसमें संविधान में ‘इंडिया’ शब्द के स्थान पर ‘हिन्दुस्तान’ शब्द की मांग की गई थी, जिसमें देश के प्राथमिक नाम के रूप में ‘भारत’ का प्रस्ताव किया गया था।

    जून 2020 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। इसमें संविधान में दर्ज ‘इंडिया दैट इज भारत’ को बदलकर केवल भारत करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इंडिया ग्रीक शब्द इंडिका से आया है। इसलिए इस नाम को हटाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने अदालत से अपील की थी कि वो केंद्र सरकार को निर्देश दे कि संविधान के अनुच्छेद-1 में बदलाव कर देश का नाम केवल भारत कर दिया जाए।

    उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए इस मामले में दखल देने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि संविधान में पहले से ही भारत का जिक्र है। संविधान में लिखा है ‘इंडिया डैट इज भारत। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस याचिका को संबंधित मंत्रालय में भेजा जाना चाहिए और याचिकाकर्ता सरकार के सामने अपनी मांग रख सकते हैं।

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