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नितीश कुमार ने आज रचा इतिहास , आपस में धुर विरोधियो को भी बैठाया एक साथ …………….

UB India News by UB India News
June 24, 2023
in पटना, बिहार
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नितीश कुमार ने आज रचा इतिहास , आपस में धुर विरोधियो को भी बैठाया एक साथ …………….
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बिहार के राजनीतिक रिवाज और अंदाज में 90 के दशक के बाद ऐसा बदलाव आया कि जातीय जनाधार के बिना किसी नेता का उत्थान संभव नहीं था। लालू यादव ने मंडल-कमंडल की लड़ाई में अपनी पकड़ दलित और पिछड़ी जातियों के साथ मुसलमानों में ऐसी बना ली कि लगातार वे 15 साल तक बिहार की सत्ता के शीर्ष पर रहे। लालू की राजनीति की धुरी उनकी अहीर जाति बनी रही, जिसकी संख्या ओबीसी में सर्वाधिक 16-18 प्रतिशत मानी जाती है। इसके ठीक उलट नीतीश कुमार की राजनीति रही। वे जिस कुर्मी जाति से आते हैं, उसकी आबादी बिहार में महज 4-5 प्रतिशत आंकी जाती है। उनके साथ जातीय समीकरण के नाम पर कुशवाहा समाज की 5-6 प्रतिशत आबादी और जुड़ी। लेकिन महज 10-11 प्रतिशत की आबादी की जातीय गोलबंदी से सफल और बड़े राजनीतिज्ञ के रूप में नीतीश कुमार की पहचान बननी मुश्किल थी। इसके बावजूद वे अगर लगातार 18 साल से बिहार के सीएम बने हुए हैं तो यह स्वीकारने में किसी को हिचक नहीं होनी चाहिए कि सबको साथ लेकर चलने की उनमें अद्भुत क्षमता है।

विपक्षी नेताओं के महाजुटान में दिख गया नीतीश का कौशल
नीतीश कुमार का यह राजनीतिक कौशल है कि कम समय में उन्होंने डेढ़ दर्जन विपक्षी दलों को एक मंच पर बिठा दिया। नीतीश की राजनीतिक कुशलता के आकलन के लिए इतना ही बताना पर्याप्त होगा कि आपस में टकराते रहने वाले और एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाने वाले दल भी साथ बैठने को तैयार हो गए। अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी जैसे नेता कांग्रेस को देखना नहीं चाहते। ममता बनर्जी ने भी विपक्षी एकता की मुहिम शुरू की थी, लेकिन उसमें कमी यह थी कि वे कांग्रेस रहित विपक्ष का कन्सेप्ट लेकर चल रही थीं। नीतीश कुमार ने तब तक कदम नहीं बढ़ाया, जब तक कांग्रेस विपक्षी एकता के लिए तैयार नहीं हुई। कांग्रेस से ममता की नफरत का आलम यह कि हाल ही में कांग्रेस के टिकट पर और लेफ्ट के समर्थन से उपचुनाव जीत कर आए इकलौते विधायक को ममता ने अपनी पार्टी टीएमसी में शामिल करा लिया। आम आदमी पार्टी को कांग्रेस से इतनी चिढ़ है कि उसके नेता कांग्रेस के सामने अब भी यह शर्त रखते हैं कि दिल्ली और पंजाब को कांग्रेस भूल जाए तो वे मध्य प्रदेश और राजस्थान में अपने उम्मीदवार नहीं उतारेंगे। अगर ऐसे नेता विपक्षी एकता के लिए कांग्रेस के साथ बैठ कर बातचीत को तैयार हो गए तो इसका सारा श्रेय नीतीश कुमार को ही जाता है।

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गठबंधन में सरकार चलाने का हुनर आता है नीतीश को
बिहार में लगातार नीतीश गठबंधन की ही सरकार चलाते रहे हैं। लंबे समय तक वे बीजेपी के साथ रहे तो दूसरी बार महागठबंधन के साथ सरकार चला रहे हैं। विपक्षी एकता मिशन की कामयाबी को लेकर बीजेपी के अलावा राजनीतिक विश्लेषक भी संदेह जताते रहे हैं। पर, नीतीश को इसमें कोई संदेह कभी नहीं रहा। शायद इसलिए कि उन्होंने विपक्षी एकता की कामयाबी पहले देखी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन को बड़ी सफलता मिली थी। लोकसभा की कुल 40 सीटों में भाजपा गठबंधन (एनडीए) को 31 सीटें मिली थीं। अकेले भाजपा के खाते में 22 सीटें गई थीं। भाजपा की सहयोगी पार्टी राम विलास पासवान की एलजेपी को 6 और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी को 3 सीटें मिली थीं। आरजेडी के खाते में 4, कांग्रेस और जेडीयू के दो-दो और एनसीपी के खाते में एक सीट आई थी। नीतीश चूंकि खुद को सर्वस्वीकार्य समझते थे, इसलिए परिणाम से वे दुखी हुए। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। दलित समाज से आने वाले जीतन राम मांझी को नीतीश ने बिहार का सीएम बना दिया।

पहली बार उपचुनाव के नतीजों ने नीतीश को साहस दिया
लोकसभा का चुनाव खत्म होते ही बिहार की राजनीति में ध्रुवीकरण शुरू हो गया। विधानसभा की खाली पड़ीं 10 सीटों पर उपचुनाव हुए तो राजनीति के कट्टर विरोधी लालू और नीतीश ने एक दूसरे से हाथ मिला लिया। इसका सुखद परिणाम सामने आया। कुल 10 में से 6 सीटों पर भाजपा हार गई। आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस तब महागठबंधन में थे। नवंबर 2015 में विधानसभा के चुनाव हुए तो महागठबंधन ने भाजपा को उसकी औकात बता दी। 243 सीटों वाली विधानसभा में महागठबंधन ने 178 सीटें जीतीं, जबकि एनडीए 58 पर ही सिमट गया। दोनों के बीच 120 सीटों और 7.6 फीसद वोटों का अंतर था। महागठबंधन में आरजेडी 80 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी। जेडीयू को 71 और कांग्रेस को 27 सीटें आई थीं। आरजेडी और जेडीयू ने 101-101 और कांग्रेस ने 41 पर सीटों पर चुनाव लड़े थे। भाजपा 160 सीटों पर लड़कर सिर्फ 53 सीटें जीती तो राम विलास पासवान की लोजपा 40 सीटों पर लड़ कर केवल 2 सीटें ही जीत पाई। उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी 23 पर लड़कर 2 और जीतन राम मांझी की पार्टी हम (HAM) 20 पर लड़कर एक सीट ला पाई थीं। महागठबंधन का पहला प्रयोग सफल रहा। आज अगर अति आत्मविशास से नीतीश विपक्षी एकता का अलख जगाए हुए हैं तो इसके पीछे 2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की भूमिका ही है।

नाटकीय ढंग से नीतीश कुमार फिर एनडीए में चले गए
विधानसभा में बड़ी पार्टी होने के बावजूद आरजेडी ने उदारता दिखाई और जेडीयू नेता नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बना दिया। नीतीश की सरकार में आरजेडी और कांग्रेस शामिल हुए। तकरीबन 20 महीने यह सरकार चली। 26 जुलाई 2017 को नाटकीय ढंग से नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया। दरअसल वे अपने सहयोगी दल आरजेडी के विधायक दल के नेता और डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोपों से खिन्न थे। इस्तीफे के कुछ ही देर बाद वे उस बीजेपी के साथ चले गए, जिसके खिलाफ मिले जनादेश से वे सीएम बने थे। कहने का मतलब यह कि नीतीश कुमार को एनडीए और महागठबंधन के साथ रह कर नफा-नुकसान का व्यापक अनुभव है। वे गठबंधन सरकार चलाने के मास्टर बन गए हैं।

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