भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो से एससीओ समिट के दौरान हाथ नहीं मिलाया. एस जयशंकर शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक के दौरान मंच पर सदस्य देशों के सभी विदेश मंत्रियों का स्वागत कर रहे थे. इस दौरान बैठक में भाग लेने आए पाकिस्तानी विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जब मंच पर पहुंचे तो जयशंकर ने हाथ मिलाने की बजाय दूर से नमस्ते किया. इसके जवाब में बिलावल भुट्टो को भी नमस्ते ही करना पड़ा. फोटो सेशन के बाद भारतीय विदेश मंत्री ने भुट्टो को मंच से दूसरी तरफ जाने का इशारा किया.
इस साल भारत एससीओ की अध्यक्षता कर रहा है. बैठक से पहले भारत के विदेश मंत्री ने एससीओ के मंच से संबोधित किया, जिसमें आतंकवाद का मुद्दा प्रमुखता से उठाया. जयशंकर ने कहा, आतंकवाद को किसी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता. आतंकवाद को हर स्वरूप में खत्म करना चाहिए. आतंक की आर्थिक रसद बंद करने के लिए भी प्रभावी कार्रवाई जरूरी है. यह ध्यान रखना चाहिए कि आतंकवाद से लड़ना SCO के स्थापना संकल्पों में से एक है.
बिलावल भुट्टो के लिए खास है भारत दौरा……
पाकिस्तान (Pakistan) के लिए आज का दिन बहुत अहम है क्योंकि अपने चीर प्रतिद्वदी कहे जाने वाले भारत के साथ संबंधों को लेकर पूरी दुनिया की नजरें उस पर हैं. पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो (Bilawal Bhutto) आज भारत पहुंचे हैं. वो यहां शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO)की ओर से आयोजित विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेंगे. खास बात यह है कि एक दशक यानी 12 वर्ष बाद कोई पाकिस्तानी विदेश मंत्री भारत की सर जमीं पर कदम रख रहा है. वो भी ऐसे समय जब भारत-पाकिस्तान के बीच संबंध कुछ ठीक नहीं हैं. आतंकवाद से लेकर सीमा सुरक्षा संबंधी कई मुद्दों पर भारत लगातार पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर उजागर कर चुका है. बहरहाल यहां हम बात कर रहे हैं बिलावल भुट्टो के भारत दौरे की. बिलावल का ये भारत दौरा बहुत खास है. आइए कुछ बिंदुओं के जरिए समझते हैं बिलावल के भारत आने के मायने.
क्या है बिलावल भुट्टो के भारत आने के मायने
1. कंगाल पाकिस्तान को सहारा
SCO बैठक में शामिल होने के लिए बिलावल भुट्टो भारत तो आए हैं, लेकिन यहां उनकी मंशा अपने देश को कंगाली में सहारा दिलाने की है. दरअसल इस बैठक में चीन से लेकर रूस तक उन देशों के विदेश मंत्री भी हिस्सा ले रहे हैं जिनकी मदद के सहारे ही पाकिस्तान अपने दिन काट रहा है. लेकिन हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि अब बिलावल भुट्टो और पाकिस्तान के पास किसी भी हाल में किसी भी देश की मदद की मदद का ही सहारा है. ऐसे में बिलावल चाहेगा कि वो इस समिट में पाकिस्तान के साथ ट्रेड को लेकर कोई सकारात्मक नोट के साथ पाकिस्तान लौटे.
2. रूस-चीन के सामने न्यूट्रल बने रहना
पाकिस्तान वैसे तो लगातार भारत को लेकर गलत बयानबाजियां वैश्विक स्तर पर करता रहा है. लेकिन इस समिट में उसे रूस-चीन से मदद की दरकार है, लिहाजा वो ऐसा बिल्कुल नहीं चाहेगा कि इन देशों के सामने उसकी किसी भी तरह किरकिरी हो. यही वजह कि ना चाहते हुए भी पाकिस्तान ने अपने विदेश मंत्री को भारत भेजा है, जिससे वो इन देशों के बीच खुद को न्यूट्रल बता सके.
भारत के लिए भी अहम
बिलावल भुट्टो को अपनी जमीं पर बुलाकर भारत ने भी दुनिया को बड़ा संदेश दे दिया है. भारत ने कश्मीर ने जब से धारा 370 हटाई है तभी से पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ था. इसको लेकर उसने भारत को दुनिया के कई मंचों पर बदनाम करने की नापाक कोशिश भी की, लेकिन इसमें कामयाब नहीं हुआ. बावजूद इस रुख के भारत ने अपने यहां एससीओ समिट का आयोजन कर लिया और पाकिस्तान को अपनी तिलमिलाहट के बीच यहां आना पड़ा. ये कूटनीति के लिहाज से भारत की बड़ी जीत में से एक है.
क्यों SCO है जरूरी
पाकिस्तान और बिलावल भुट्टो सरकार के लिए एससीओ काफी अहम है. दरअसल शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO की ताकत का अंदाजा लगाना है तो इसमें शामिल देशों को जानना बहुत जरूरी है. एससीओ के सदस्यों की बात करें तो इसमें कुल आठ सदस्य देश हैं. भारत के अलावा चीन, रूस, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, कजागिस्तान, ताजिकिस्तान और पाकिस्तान हैं. इसके अलावा चार पर्यवेक्षक देश भी शामिल हैं. इनमें बेलारूस, मंगोलिया, ईरान और अफगानिस्तान हैं.
जुल्फिकार भुट्टो के जहन में भारत के लिए जहर
जुल्फिकार अली भुट्टो के बयानों से पता चलता है कि उनकी पूरी राजनीति खुद को ‘कट्टर भारत विरोधी’ साबित करने पर केंद्रित थी. उन्होंने यह तक कहा था कि घास की रोटी खाएंगे लेकिन परमाणुबम जरूर बनाएंगे. जुल्फिकार को भारत से नफरत विरासत में मिली थी, जिसकी आग को उन्होंने पाकिस्तान पहुंचने के बाद और फैलाने का काम किया. बचपन से ही उनके दिमाग में पाकिस्तान बनाने की योजना ने घर कर लिया था. पड़ोसी मुल्क के ज्यादातर लोगों की तरह उनके जहन में भारत के खिलाफ जहर भरा था.
मोहम्मद अली जिन्ना को लिखा था खत
भुट्टो भारत को अपने लिए हमेशा से ही एक खतरा मानते थे. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब 1943 में जब वह महज 15 साल के थे तब उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को खत लिखा था. इसमें उन्होंने लिखा था कि मुसलमानों को यह महसूस करना चाहिए कि हिंदू कभी भी हमारे साथ एकजुट नहीं हो सकते हैं और न ही कभी एकजुट होंगे. वह हमारे पैगंबर के सबसे घातक दुश्मन हैं. उन्होंने भारत से हर तरह की दुश्मनी दिखाई थी.
बिलावल की मां बेनजीर भुट्टो ने भी किया था भारत दौरा
इतना ही नहीं बिलावल भुट्टो भी इसी रास्ते पर रहे. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमर्याजदित टिप्पणी की थी. यह भी कहा था कि भारत से कश्मीर का एक-एक हिस्सा वापस लेंगे. यही कारण है कि उनकी भारत यात्रा पर सबकी नजर है. वो भी ऐसे समय पर जब भारत कई बार पाकिस्तान को आतंकवाद को लेकर चेतावनी दे चुका है. बिलावल से पहले उनकी मां बेनजीर भुट्टो भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान भारत आईं थीं. उस समय भी ऐसा लगा था कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधरेंगे. अब बिलावल की भारत यात्रा को लेकर भी यही सवाल उठ रहे हैं क्या भारत-पाक के रिश्तों में सुधार होगा.







