साल का कैलेंडर बाजार में छपकर आ गया है। साथ ही‚ 2023 के पंचांग की चर्चा हो रही है। लगन और राशि देखते हुए लोग नव वर्ष का फलादेश बांच रहे हैं। पर भारतीय कूटनीति का नया साल इसी दिसम्बर माह से शुरू हो गया है। अगला एक वर्ष विश्व फलक पर भारत की साख और उसके ग्लोबल एजेंडा के लिए खासा अहम है। इस बात को इस पृष्ठभूमि के साथ बेहतर समझा जा सकता है कि इंडोनेशिया में हुए जी–२० शिखर सम्मेलन के बाद ‘बाली–डिक्लेरेशन’ से जुड़ी वार्ता में भारत ने अहम भूमिका निभाई थी। यह भारत के कूटनीतिक हस्तक्षेप के साथ विश्व मंच पर उसके समन्वयी किरदार को जाहिर करता है। दिलचस्प है कि बाली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन को खासी अहमियत मिली थी। व्हाइट हाउस ने आगे बढ़कर भारत के प्रधानमंत्री के उस बयान की तारीफ की‚ जिसमें उन्होंने कहा था–‘आज का युग युद्ध का नहीं है।’ अमेरिकी सरकार ही नहीं‚ वहां के मीडिया जगत में भी भारत की धमक साफ सुनी गई॥। गौरतलब है कि सीएएन अपने संपादकीय में भारत को एशिया में नई उभरती हुई ताकत पहले ही बता चुका है। चीन और जापान की मौजूदगी के बीच भारत के उभार को कबूल करना अमेरिका सहित दुनिया की सबसे ताकतवर कूटनीतिक लॉबी की समझ को साफ करता है। प्रधानमंत्री मोदी की वैश्विक परिपेक्ष्य में राय को दुनिया किस गंभीरता से ले रही है‚ इसे सीएनएन के संपादकीय से समझा जा सकता है। सीएनएन लिखता है कि बाली में जी–२० सम्मेलन में सभी देशों ने मिलकर एक साझा बयान जारी किया‚ जिसमें रूस की ओर से यूक्रेन पर किए गए हमले की निंदा की गई। इसमें एक चीर–परिचित वाक्य को दोहराया गया–आज का दौर युद्ध का नहीं है। यह वही वाक्य है‚ जो इस साल सितम्बर में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई मुलाकात में कहा था।
दिलचस्प है कि इंडोनेशिया में जी–२० शिखर सम्मेलन में रूस शामिल नहीं हुआ था‚ उलटे यूक्रेन के राष्ट्रपति को संबोधन के लिए आमंत्रित किया गया। निश्चित रूप से यह सब अमेरिका और उसके नेतृत्व में नाटो का दबाव था। इस दबाव के बीच संतुलन और समन्वय की रेखा खींचना एक जोखिम हो सकता था‚ पर नरेन्द्र मोदी ने न सिर्फ इस जोखिम को उठाया‚ बल्कि अहिंसा और सहअस्तित्व को लेकर भारत के चिर–परिचित रु ख को दुनिया के सामने रखते हुए वे खासे आत्मविश्वास से भरे दिखे। विशेष रूप से कोविड महामारी के प्रकोप के बाद दुनिया में बने नये शक्ति संतुलन और यूक्रेन संकट के बीच भारत ने रूस और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को जिस तरह संतुलित किया है‚ वह आज कूटनीतिक दुनिया में चर्चा का विषय है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के ज्यादातर जानकार इस बात पर एकमत हैं कि नरेन्द्र मोदी एक ऐसे नेता के रूप में उभर रहे हैं‚ जिनका सभी पक्ष सम्मान कर रहे हैं। एक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ के रूप में भारत की मजबूत होती स्थिति उसकी नई वैश्विक स्थिति की मोहरबंदी है।
सीएनएन जब अपने लेख में जानकारों के हवाले से लिखता है कि बाली में भारत का जी–२० के लिए एजेंडा नपा–तुला होने के साथ खासा सधा था‚ तो वह भारत की उन प्राथमिकताओं को मिली अहमियत है‚ जिनके लिए भारत प्रयासरत है। भारत का एजेंडा लगातार यह रहा है कि वह युद्ध के परिणामस्वरूप ऊर्जा‚ जलवायु और आर्थिक स्तर पर हुई उथल–पुथल के मुद्दों के ईद–गिर्द चर्चा करना चाहता है। उसका यह रुख बाली में भी साफ–साफ दिखा। भारत की बात पश्चिमी नेताओं ने इस क्षेत्र में एक प्रमुख हितधारक के रूप में सुनी है‚ क्योंकि भारत एक ऐसा देश है जो पश्चिमी देशों और रूस‚ दोनों के करीब है। भारत की यह स्थिति तटस्थता या गुटनिरपेक्षता से आगे समन्वयवादी तकाजे के साथ विकास और विश्व कल्याण की राह पर बढ़ना है।
अलबत्ता‚ वाशिंगटन पोस्ट में छपे एक विश्लेषण में कहा गया है कि भारत और चीन रूस को लेकर अपना रुख बदलते दिख रहे हैं। दरअसल‚ यह दृष्टि अमेरिकी वर्चस्व को आगे करके देखने वाले थिंकटैंक की है। यह विश्लेषण सवाल और संभावनाओं के बीच जिस एक बात को लेकर स्पष्ट है‚ वह यह है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश मानते हैं कि यूक्रेन युद्ध में रूस पर दबाव बनाना बिना भारत और चीन के सहयोग के संभव नहीं है। अगर इस सोच को मान भी लें तो यह तो साफ है कि नाटो के प्रभुत्व और वर्चस्ववादी दबंगई के बावजूद यह माना जा रहा है कि युद्ध की स्थिति के बीच हस्तक्षेप की कोई भी पहल बगैर भारत को शामिल किए कारगर नहीं होगी। लिहाजा‚ भारत जब कहता है कि ‘आज का समय युद्ध वाला दौर नहीं है’‚ तो यह विश्व शांति के लिए एक सर्द अलाप भर नहीं है। बाली सम्मेलन के पहले दिन अपनी बात रखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा‚ ‘कोविड के बाद एक नई विश्व व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर है। इस वक्त की जरूरत है कि हम एक साथ मिल कर शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए ठोस संकल्प दिखाएं।’ अपने इसी संबोधन में वे आगे कहते हैं–‘मुझे यकीन है कि बुद्ध और गांधी की धरती पर पर जी–२० के नेता मिलेंगे‚ तो हम दुनिया में शांति का एक मजबूत पैगाम देंगे।’ अब जब जी–२० में बाली के बा नई दिल्ली के रंग में रंगे बारहमासे की बारी है‚ तो प्रधानमंत्री मोदी की मन की बात में कही यह बात मायने रखती है कि वह जी–२० की सदारत को एक ऐसे अवसर के तौर पर देखते हैं‚ जिसमें देश के जन–जन का सकर्मक सहभाग हो। यह सहभाग विश्व शांति और कल्याण की शपथ के साथ विकास और समृद्धि की राह पर बढ़ चले देश का अगले २५ वर्षों का रोडमैप है।
साफ है कि लोकल और ग्लोबल के बीच संभावना और उपलब्धि की लकीर खींचने वाले नरेंद्र मोदी अगले एक वर्ष में भारत में विकास के साथ यहां के लोकमानस की समन्वयिता और सहअस्तित्व को दुनिया में प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। अगर कोई चाहे तो इसे भारतीय राजनीति के सूर्य के उत्तरायण से दक्षिणायन होने का वैश्विक ऐलान भी कह सकता है।
शांति और सहअस्तित्व के साथ प्रकृति और जलवायु को लेकर बढ़ी मुश्किलों और विकास की चुनौती के मुद्दे को भारत जिस तरह विश्व मंच पर रख रहा है‚ वह एक युगधर्म के निर्वाह की तरह है। भारत अगले एक वर्ष में जी–२० की अध्यक्षता करते हुए जिन कार्यक्रमों को तवज्जो देने जा रहा है‚ उनमें निश्चित रूप से यह युगधर्म दिखेगा। बड़ी और अच्छी बात यह है कि इन सबके बीच ही सांस्कृतिक आदान–प्रदान और पर्यटन जैसे क्षेत्र में भारत अपने लिए बड़ी संभावनाएं भी देख रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मन की बात’ में इस संभावना को लेकर अपनी बातें रखी भी हैं।
भारतीय कूटनीति का नया साल इसी दिसम्बर माह से शुरू हो गया है। अगला वर्ष विश्व फलक पर भारत की साख और उसके ग्लोबल एजेंडा के लिए खासा अहम है। इस बात को इस पृष्ठभूमि के साथ बेहतर समझा जा सकता है कि इंडोनेशिया में हुए जी–२० शिखर सम्मेलन के बाद ‘बाली–डिक्लेरेशन’ से जुड़ी वार्ता में भारत ने अहम भूमिका निभाई थी। यह भारत के कूटनीतिक हस्तक्षेप के साथ विश्व मंच पर उसके समन्वयी किरदार को जाहिर करता है। दिलचस्प है कि बाली में प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन को खासी अहमियत मिली थी। व्हाइट हाउस ने आगे बढ़कर भारत के प्रधानमंत्री के उस बयान की तारीफ की‚ जिसमें उन्होंने कहा था–‘आज का युग युद्ध का नहीं है।’ अमेरिकी सरकार ही नहीं‚ वहां के मीडिया जगत में भी भारत की धमक साफ सुनी गई







