देश में खिलाडि़यों की स्थिति हाल के दिनों में बेहतर तो हुई‚ मगर कुछेक घटनाएं निराश भी करती हैं। चर्चा में रहे दो वाकयों का जिक्र जरूरी है। पहला–उत्तर प्रदेश के सहारनपुर का है। यहां लड़़कियों की सब जूनियर कबड्ड़ी प्रतियोगिता के दौरान खिलाडि़यों को शौचालय में रखा खाना परोसा गया। समझना मुश्किल नहीं कि इन खिलाडि़यों ने क्या महसूस किया होगाॽ
दूसरा वाकया अंतरराष्ट्रीय स्तर के तीरंदाज रहे लिंबाराम का है। चलने और बोलने में असमर्थ लिंबाराम पांच साल से इलाज के लिए दर–दर भटक रहे हैं। पद्मश्री से सम्मानित यह खिलाड़़ी लाइन में लगकर इलाज कराने को मजबूर हैं। इन दो सच्ची घटना से खिलाडि़यों के प्रति सरकार और संबंधित खेल संस्थाओं की संवेदनहीनता का पता चल जाता है। देश को पदक दिलाने के वास्ते इन खिलाडि़यों ने क्या कुछ नहीं सहा और भोगा होगाॽ इस उम्मीद में कि सरकार आगे चलकर इन पर अपना प्यार लुटाएगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों कहा था कि स्वतंत्रता सेनानियों की तरह भारतीय खिलाड़ी भी उसी भावना के साथ मैदान में उतरते हैं। बहरहाल‚ खिलाडि़़यों के साथ ‘खेल’ करने का चलन अपने यहां पुराना है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाडि़यों के चाय की दुकान चलाते या सब्जी बेचते खबरें मीडि़या की सुर्खियां बनती रहती हैं। खेल से जुड़े़ संस्थान और मंत्रालय के अफसरों का खिलाडि़यों के प्रति यह मानसिकता इतना बताने के लिए पर्याप्त है कि टैलेंट होने के बावजूद हमारे खिलाड़़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर फेल क्यों हो जाते हैं।
खिलाडि़यों के साथ ‘खेल’ करने के इसी नजरिए ने हमें उन खेल प्रतिस्पर्धाओं में भी पीछे कर दिया‚ जहां हमें अव्वल रहने की उम्मीद थी। होनहार खिलाडि़यों के साथ राजनीति करने के बजाय सरकार को उनकी बेहतरी और सुख–सुविधाओं के प्रति सचेत रहने की जरूरत है। सामर्थ्य का सम्मान होने की बात भी गलत साबित होती दिखती है। खिलाडि़यों की संवेदना का ख्याल रखने से ही अच्छे परिणाम आ सकते हैं। हमें उन देशों से भी सीखने की जरूरत है‚ जो अपने खिलाडि़यों को ‘राजा बाबू’ की तरह रखते हैं। उनकी तमाम दुश्वारियों का त्वरित निवारण करते हैं। देश का प्रतिनिधित्व करने वाले इन खिलाडि़़यों को जब तक हम इज्जत नहीं बख्शेंगे‚ तब तक मेड़ल पाने और खेल में अव्वल आने की इच्छा मृग मरीचिका ही साबित होगी।







