रेलवे भर्ती बोर्ड की ग्रुप डी की परीक्षा उत्तर प्रदेश के ४४ केंद्रों में आयोजित हुई। इसमें परीक्षा छोड़ने वाले उम्मीदवारों की तादाद ४० प्रतिशत से ज्यादा रही। १०३७६९ पदों के लिए मार्च‚ २०१९ में परीक्षा आयोजित की जानी थी‚ लेकिन यह १७ अगस्त‚ २०२२ से शुरू की गई। यह कंप्यूटर आधारित ऑनलाइन परीक्षा है। कुल परीक्षार्थियों की संख्या १‚१५‚६७‚२४८ यानी एक पद के लिए सौ से ज्यादा उम्मीदवारों के आवेदन करने का दावा किया गया। यह परीक्षा तीन से चार महीने तक चल सकती है। परीक्षार्थियों के बीच परीक्षाओं के प्रति भरोसे के कम होने के जो कारण बताए जाते हैं‚ उनमें मुख्यतः यही है कि परीक्षा की प्रक्रिया संदेहास्पद है। बेरोजगार या बेहतर अवसर की तलाश में रहने वाली पीढ़ी का परीक्षाओं से विश्वास लगातार कम होता जा रहा है। भारतीय शासन व्यवस्था के भीतर यह नई परिघटना है। आम तौर पर माना जाता है कि संस्थाओं को बेहतर उम्मीदवारों की तलाश रहती है ताकि उस संस्था को बेहतर तरीके से संचालित किया जा सके। दुनिया भर में यह एक पद्धति विकसित हुई है कि किसी भी जिम्मेदारी को निभाने के लिए निश्चित न्यूनतम मानदंड पूरा करने वाले उम्मीदवारों को खुला आमंत्रण दिया जाता है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी बनाए रखना अच्छा समझा जाता है ताकि कम से कम कीमत में ज्यादा से ज्यादा अच्छा उम्मीदवार का किसी पद या जिम्मेदारी के लिए चयन किया जा सके।
इस तरह की खबरें बहुत चर्चा में रहती हैं कि न्यूनतम स्तर के पदों के लिए उच्चतम स्तर की डिग्रियां लेने वाले आवेदन करते हैं ताकि वे बेरोजगारी के हालात से बाहर आ सकें। जैसे किसी विभाग में चतुर्थ श्रेणी के लिए विश्वविद्यालयों से प्राप्त सबसे बड़ी डिग्री के धारक आवेदन करते हैं। पदों की संख्या चाहें जितनी कम हो बेरोजगारों की एक बड़ी भीड़ उसे हासिल करने की प्रक्रिया में खुद को शामिल कर लेती है। समय‚ श्रम और पैसे खर्च करके नौकरी के लिए इंटरव्यू या लिखित परीक्षा के लिए तिथि का इंतजार करने लगती है। फिर परीक्षा की तैयारी के लिए पैसे खर्च करती है। परीक्षा के लिए दूरदराज के शहरों तक धक्के खाकर यात्रा करती है। परीक्षा खत्म होने के बाद परिणाम का इंतजार करती है‚ लेकिन उससे पहले परीक्षा के रद्द किए जाने की आशंका से पीडि़त और भयभीत रहती है। बेरोजगारी तक पहुंचने के लिए जीवन का जो हिस्सा गुजरता है‚ उसके बाद रोजगारयुक्त कहलाने के लिए जिंदगी का उतना ही वक्त गुजर सकता है। उसके साथ उसका पूरा परिवार भी यातनाओं के जंजाल में फंसा रहता है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इन हालात के भीतर एक नई बात हुई है। यह कि बेरोजगारी से निकलने तक की जो प्रक्रियाएं रही हैं‚ उनके प्रति भी भरोसा खत्म हो रहा है। यह अकारण नहीं है कि पिछले वर्ष आत्महत्या करने वालों की तादाद बढ़ी है‚ और उनमें सबसे ज्यादा संख्या रोजगार खोने वालों व रोजगार प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाने वालों की है। बेरोजगारी से निकलने की प्रक्रिया आत्महत्या के हालात तक पहुंचने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं छोड़ती। चिंताजनक सवाल खड़ा होता है कि क्या रोजगार हासिल करने की प्रक्रिया लगातार अविश्वसनीय होती जा रही हैॽ और इससे समाज में हताशा एवं निराशा के हालात बढ़ेंगे और आत्महत्याओं की संख्या भी बढ़ेगी और साथ ही साथ भारतीय दंड विधान संहिता में परिभाषित अपराधों की भी घटनाएं बढ़ेंगीॽ इस तरह की चिंताजनक स्थिति के मजबूत लक्षण दिखाई दे रहे हैं। लेखक इस चिंता को जाहिर करने के लिए क्यों बाध्य हुआ है‚ इसके लिए कुछेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। एक पीएचडी धारक को छत्तीसगढ़ से दिल्ली के एक कॉलेज में एक पद के लिए इंटरव्यू यानी मौखिक परीक्षा के लिए आना था। पहला तो उसने यह भरोसा खो दिया कि किसी भी संस्थान में नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकलें। उनमें यह तय है कि किसी दलित‚ किसी आदिवासी‚ पिछड़े वर्ग के किसी सदस्य की नियुक्ति उन पदों पर हो सकती है जो सामान्य के लिए आरक्षित हैं। सामान्य के लिए आरक्षित होने का मतलब भारतीय समाज में वर्चस्व रखने वाली जातियों के सदस्यों से है‚ जिन्हें आम तौर पर ऊँची जाति व सवर्ण के रूप में संबोधित किया जाता है। नियुक्तियों के संदर्भ में सामान्य का मतलब सवर्ण किया जा चुका है। दूसरा आर्थिक रूप से कमजोर का मतलब भी सवर्ण किया जा चुका है यानी सामाजिक तौर पर अवर्ण या शुद्र के लिए कुछेक जगहें ही निश्चित कर दी गई हैं। छत्तीसगढ़ का वह उम्मीदवार शुद्र है। दूसरा उसने साहस करके अपना आवेदन सामान्य नागरिक के तौर पर भेजा लेकिन उसने यह विश्लेषण किया कि क्या किसी भी ऐसे उम्मीदवार को किसी भी संस्थान में नियुक्ति दी गई है जिसने शुद्र या अवर्ण होते हुए सवर्णों के लिए आरक्षित पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन किया हो। उसे निराशा हाथ लगती है। उसने यह अनुभव हासिल कर लिया है कि नियुक्तियों के लिए जो प्रक्रियाएं जारी रखी जाती हैं दरअसल‚ वे उस पद पर नियुक्त किए जा चुके उम्मीदवार के लिए मुहर लगाने की प्रक्रिया है। यह भी कि उस उम्मीदवार के नाम या नामों की घोषणा करने के लिए इस तरह की परीक्षाएं आयोजित करने की प्रक्रिया होती है यानी नियुक्तियां करने के बाद विज्ञापन निकाले जाते हैं।
लेकिन यह भी पुरानी स्थिति कही जा सकती है यानी इसमें कोई नई बात नहीं है। दरअसल‚ नई बात इसके विस्तार में है‚ और वह चिंताजनक है। मसलन‚ रेलवे को सबसे ज्यादा नौकरियां देने वाला क्षेत्र माना जाता है। रेलवे के विज्ञापनों‚ आवेदनों‚ परीक्षाओं‚ बहालियों की काफी चर्चा रही हैं। बेरोजगारी के हालात का इससे अंदाजा लगता है कि नौकरियां कैसे क्षेत्र विशेष में सिमटती जा रही हैं। रेलवे की परीक्षा का जो आलम है‚ वहां अविश्वसनीयता का विस्तार होने के संकेत मिल रहे हैं यानी भीड़ के स्तर पर यह विश्वसनीयता बढ़ी है।
परीक्षार्थियों के बीच परीक्षाओं के प्रति भरोसे के कम होने के जो कारण बताए जाते हैं‚ उनमें मुख्यतः यही है कि परीक्षा की प्रक्रिया संदेहास्पद है। कुछेक परीक्षाओं में देखा गया है कि परीक्षार्थियों के बीच भी कुछेक के लिए विशेष व्यवस्था की गई तो किसी को परीक्षा से पहले ही वे प्रश्न मिल गए जिनका उन्हें जवाब लिखकर सफल होना है। विभिन्न स्तरों पर लोगों के बीच भरोसे जब कम होने लगते हैं‚ तो यह समाज के तनावों और बेचैनी की थाह लेने के लिए बाध्य करता है।







