कहावत है कि क्रिकेट और राजनीति अनिश्चिताओं का खेल होते है। क्रिकेट में पारी की आखिरी बॉल टीम को जीता भी सकती है और हरा भी सकती है। क्या किसी ने कभी सोचा था कि चरण सिंह‚ वीपी सिंह‚ चंद्रशेखर‚ आईके गुजराल और एचडी देवेगौड़ा भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे‚ जबकि किसी के पास प्रधानमंत्री बनने लायक सांसद तो क्या उसका पांचवां हिस्सा भी नहीं था। गुजराल तो ऐसे प्रधानमंत्री थे जो अपने बूते एक लोक सभा की सीट भी नहीं जीत सकते थे। फिर भी ये सब प्रधानमंत्री बने। वो अलग बात है कि इनका प्रधानमंत्री बनना किसी अखिल भारतीय आंदोलन की परिणिति नहीं था बल्कि उस समय की राजनैतिक परिस्थितियों ने इन्हें यह मौका उपलब्ध कराया।
एक बार फिर देश के हालात ऐसे हो रहे हैं कि देश की बहुसंख्यक आबादी शायद सत्ता परिवर्तन देखना चाहती है। एक तरफ वो लोग हैं‚जो मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता घटी नहीं है‚ और भाजपा के समान ताकत‚ पैसा और संगठन किसी दल के पास नहीं है। इसलिए २०२४ का चुनाव एक बार फिर मोदी के पक्ष में ही जाएगा पर दूसरी तरफ वो राजनैतिक विश्लेषक हैं जो यह बताते हैं कि देश की कुल ४१३९ विधानसभा सीटों में से भाजपा के पास केवल १५१६ सीटें ही हैं‚ जिनमें से ९५० सीटें ६ राज्यों में ही हैं। आज भी देश की ६६ फीसद सीटों पर भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा है। इसलिए उनका कहना है कि देश में भाजपा की कोई लहर नहीं है। इसलिए मुख्यधारा की मीडिया द्वारा भाजपा का रात–दिन जो प्रचार किया जाता है‚ वह जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। इनका यह भी कहना है कि मतदाता का भाजपा से अब तेजी से मोहभंग हो रहा है।
पहले पांच साल तो आश्वासनों और उम्मीद में कट गए‚ लेकिन एनडीए २ के दौर में किसानों की दुर्दशा‚ महंगाई और बेरोजगारी जैसी बड़ी समस्याओं का कोई हाल अभी तक नजर नहीं आ रहा। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार भारत में पिछले वर्ष दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्याएं तेजी से बढ़ी हैं। आत्महत्या करने वालों में हर चौथा व्यक्ति दिहाड़ी मजदूर है‚ जो देश के गरीबों की दयनीय दशा का प्रमाण है। सरकार द्वारा करोड़ों लोगों को मुफ्त का राशन दिया जाना सिद्ध करता है कि देश में इतनी गरीबी है कि एक परिवार दो वक्त पेट भर कर भोजन भी नहीं कर सकता। स्वास्थ्य और शिक्षा की बात तो भूल ही जाइए। इस दुर्दशा के लिए आजादी के बाद से आई हर सरकार जिम्मेदार है। ‘गरीबी हटाओ’ का बरसों नारा देने वाली कांग्रेस पार्टी गरीबी नहीं हटा पाई। इसलिए उसे ‘मनरेगा’ जैसी योजनाएं लाकर गरीबों को राहत देनी पड़ी। यह वही योजना है जिसका भाजपा की सरकार ने शुरू में कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए खूब मजाक उड़ाया था। पर इस योजना को बंद करने का साहस भाजपा भी नहीं दिखा सकी। कोविड काल में तो ‘मनरेगा’ से ही सरकार की इज्जत बच पाई। मतलब यह कि ‘सबका साथ सबका विकास’ का भाजपा का नारा भी ‘गरीबी हटाओ’ के नारे की तरह हवा–हवाई ही रहाॽ
हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि पिछले आठ बरसों में हमारे देश के एक उद्योगपति गौतम आडानी दुनिया के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति बन गए‚ जबकि आठ बरस पहले दुनिया के धनी लोगों की सूची में उनका नाम दूर–दूर तक कहीं नहीं था। अगर इतनी अधिक न सही पर इसके आस–पास की भी आर्थिक प्रगति भारत के अन्य औद्योगिक घरानों ने की होती या औसत हिंदुस्तानी की आय थोड़ी भी बढ़ी होती तो आंसू पौंछने लायक स्थिति हो जाती। तब यह माना जा सकता था कि वर्तमान सरकार की नीति ‘सबका साथ और सबका विकास’ करने की है। इन हालात में दक्षिण भारत के छोटे से राज्य तेलंगाना के आर्थिक विकास का उदाहरण धीरे–धीरे देश में चर्चा का विषय बनता जा रहा है। देश का सबसे युवा प्रदेश तेलंगाना आठ बरस पहले जब अलग राज्य बना तो इसकी आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी। कृषि‚ उद्योग‚ रोजगार‚ स्वास्थ्य‚ शिक्षा जैसे हर मामले में यह एक पिछड़ा राज्य था पर लंबा संघर्ष कर तेलंगाना राज्य को बनवाने वाले के चंद्रशेखर राव (केसीआर) नये राज्य के मुख्यमंत्री बन कर ही चुप नहीं बैठे। उन्होंने किसानी के अपने अनुभव और दूरदृष्टि से सीईओ की तरह दिन–रात एक करके‚ हर मोर्चे पर ऐसी अद्भुत कामयाबी हासिल की है कि इतने कम समय में तेलंगाना भारत का सबसे तेजी से विकसित होने वाला प्रदेश बन गया है।
पिछले हफ्ते पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्य मंत्री तेजस्वी यादव ने भी सार्वजनिक रूप से तेलंगाना की प्रगति की प्रशंसा की। उससे एक हफ्ता पहले देश के २६ राज्यों के किसान संगठनों के १०० से अधिक किसान नेता तेलंगाना पहंुचे‚ यह देखने की केसीआर के शासन में तेलंगाना का किसान कितना खुशहाल हो गया है। ये सब किसान नेता उसके बाद इस संकल्प के साथ अपने–अपने प्रदेशों को लौटे कि अपने राज्यों की सरकारों पर दबाव डालेंगे कि वे भी किसानों के हित में तेलंगाना के मॉडल को अपनाएं। मैंने खुद तेलंगाना के विभिन्न अंचलों में जा कर तेलंगाना के कृषि‚ सिंचाई‚ कुटीर व बड़े उद्योग‚ शिक्षा‚ स्वास्थ्य और समाज कल्याण के क्षेत्र में जो प्रगति देखी वो आश्चर्यचकित करने वाली है।
दिल्ली में चार दशक से पत्रकारिता करने के बावजूद न तो मुझे इस उपलब्धि का कोई अंदाजा था और न ही केसीआर के बारे में सामान्य से ज्यादा कुछ भी पता था‚ लेकिन अब लगता है कि विपक्षी एकता का प्रयास या २०२४ का लोक सभा चुनाव तो एक सीढ़ी मात्र है‚ केसीआर की योजना तो पूरे भारत में तेलंगाना जैसी प्रगति करके दिखाने की है। चुनाव में कौन जीतता है‚ कौन प्रधानमंत्री बनता है‚ यह तो मतदाता के मत और उस व्यक्ति के भाग्य पर निर्भर करेगा पर एक बार शेष भारत के हर पत्रकार को इस प्रगति को देखने के लिए तेलंगाना जाना तो जरूर बनता है। क्योंकि कहावत है कि ‘प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता’ नहीं होती। प्रांतीय सरकारों को ही नहीं भाजपा की केंद्र सरकार को भी केसीआर से दुश्मनी करने की बजाय उनके काम का निष्पक्ष मूल्यांकन करके उनसे कुछ सीखना चाहिए।







