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ऐसे ही नहीं सरकारें खेलती हैं ओबीसी से एससी बनाने का खेल…..

UB India News by UB India News
September 2, 2022
in खास खबर, प्रदेश, ब्लॉग
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ऐसे ही नहीं सरकारें खेलती हैं ओबीसी से एससी बनाने का खेल…..
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ओबीसी श्रेणी की 18 जातियों को अनुसूचित जाति के दायरे में लाने की कवायद एक बार फिर फेल हो गई है। योगी आदित्यनाथ सरकाी की ओर से वर्ष 2019 में अखिलेश यादव सरकार की ओर से ओबीसी की 17 जातियों को एसटी में शामिल करने की अधिसूचना जारी की गई थी। वर्ष 2005 में उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने भी इसी प्रकार की एक कोशिश की थी। हाई कोर्ट ने जब रोक लगाई तो आदेश वापस लिया और तत्कलीन मनमोहन सरकार को इन जातियों को ओबीसी से हटाकर एससी श्रेणी में रखे जाने की सिफारिशी पत्र भेज दिया। मुलायम के बाद आई मायावती सरकार ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने 17 जातियों को ओबीसी से एससी में रखे जाने के एवज में दलितों के आरक्षण का कोटा 21 से बढ़ाकर 25 फीसदी करने का प्रस्ताव दे दिया। इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। फिर, 2019 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने अखिलेश यादव के 2016 के फैसले को आधार बनाते हुए नोटिफिकेशन जारी कर दिया। इलाहाबाद ने इन सभी नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया है। मतलब, एक बार फिर यूपी की 18 जातियां ओबीसी श्रेणी में रहेंगी, जिन्हें अधिसूचना के आधार पर एससी में बदल दिया गया था।

अखिलेश सरकार में किया गया था अधिनियम में संशोधन
अखिलेश यादव की सरकार ने 31 दिसंबर 2016 को उत्तर प्रदेश लोकसेवा अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्गों के आरक्षण अधिनियम- 1994 की धारा 13 में संशोधन किया था। इस धारा में अनुसूचियों को सशोधित करने की शक्ति दी गई है। यूपी आरक्षण अधिनियम की धारा 13 में प्रावधान किया है कि राज्य सरकार की ओर से अनुसूचियों को संशोधित किया जा सकता है। गजट में इस प्रकार की अधिसूचना का प्रकाशन कर अनुसूचियों को संशोधित समझा जाएगा। अखिलेश सरकार ने भी दो गजट नोटिफिकेशन के जरिए 17 जातियों को ओबीसी सूची में संशोधित करते हुए एससी अनुसूची में डालने का आदेश जारी कर दिया। दूसरा नोटिफिकेशन सभी डीएम को जारी किया गया कि इन जातियों के लोगों को एससी श्रेणी का जाति प्रमाण पत्र जारी किया जाए। योगी सरकार ने वर्ष 2019 में एक और नोटिफिकेशन जारी किया। 18 ओबीसी जातियों को एससी में शामिल किए जाने का आदेश था।

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अधिकारियों ने नियम जानते हुए भी जारी किए आदेश
सरकार के अधिकारियों को नियम की जानकारी थी। उन्हें पता था कि राज्य सरकार के स्तर पर या फिर केंद्र सरकार के स्तर पर ही अधिसूचना के जरिए एससी श्रेणी की सूची में संशोधन नहीं किया जा सकता है। इसके बाद भी वर्ष 2005, फिर 2016 और तीसरी बार 2019 में सरकार की ओर से अधिसूचना जारी की गई। मझवार, कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिंद, भर, राजभर, धीमान, बाथम, तुरहा, गोडिया, मांझी और मछुआ जाति के लोगों को पिछले 17 सालों में ओबीसी और एससी के बीच झुलाया जा रहा है। इस पूरी कवायद के पीछे सबसे बड़ा कारण वोट बैंक की राजनीति है। इस वोट के फेर को अपना बनाने के फेर चुनावों से पहले इस प्रकार की राजनीति गरमाती रही है। यूपी सरकार के महाधिवक्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में दिए गए सरकार के हलफनामे में माना है कि सरकार के पास 18 जातियों को ओबीसी से एससी सूची में डालने संबंधी अधिसूचना को बरकरार रखने का संवैधानिक अधिकार नहीं है।

एससी कोटि में ओबीसी की 18 जातियों को रखे जाने के खिलाफ भीमराव अम्बेदकर ग्रंथालय और जनकल्याण समिति की ओर से इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील राकेश गुप्ता जोर देकर कहते हैं कि एससी जातियों की अनूसची में बदलाव का अधिकार केवल और केवल भारतीय संसद को है। सरकारें अधिसूचना के आधार पर इस स्ट्रक्चर को नहीं बदल सकती हैं। सरकार के पक्ष और याचिकाकर्ताओं की दलील से साफ हुआ है कि सारा खेल चुनावी गणित को सेट करने के लिए ही दलों की ओर से खेला गया। अधिकारी नियम जानने के बाद भी आदेश जारी करते रहे।

वोट बैंक पर नजर
यूपी में अगर आप ओबीसी वोट बैंक पर नजर डालेंगे तो यह कुल आबादी का 52 फीसदी हिस्सा हैं। जिन 18 जातियों को ओबीसी से एससी में शिफ्ट करने की कोशिश हो रही है, वे भी बड़े स्तर पर अपना प्रभाव रखते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण जलवंशी निषाद समुदाय है। यह यूपी की आबादी का करीब 18 फीसदी हैं। बड़ी राजनीतिक ताकत रखते हैं। ऐसे में कोई भी दल इस वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहता है। जलवंशी निषाद जाति में मल्लाह, केवट, धीवर, बिंद, कश्यप, गोहरी आदि जाति आती है। यूपी चुनाव के पहले जलवंशी मोर्चा बनाने की कोशिश की गई थी। हालांकि, यह पूरी तरह से जमीन पर उतर नहीं पाया। ज्ञानेंद्र निषाद दावा करते हैं कि इस समाज की आबादी करीब 18 फीसदी है। इसी हिसाब से हमें आरक्षण का लाभ भी मिलना चाहिए।

यूपी की 220 सीटों तक जलवंशी समाज का प्रभाव
पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड तक जलवंशी समाज के वोट बैंक काफी प्रभावी माने जाते हैं। प्रदेश की 220 विधानसभा सीटों पर इस जाति के वोट बैंक का प्रभाव दिखता है। पिछले चुनावों में यह वोट बैंक मुख्य रूप से भाजपा के करीब दिखा है। यूपी में अभी लोकसभा चुनाव 2024 की तैयारियां शुरू हो गई हैं। कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे को छोड़ना नहीं चाहेगा। ऐसे में एक बार फिर यह समाज अपने आरक्षण के मांग को तेज करने की तैयारी में जुट सकता है।

100 से अधिक सीटों पर राजभर का प्रभाव
राजभर जाति का प्रभाव 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर प्रदेश में दिखता है। पूर्वांचल के दो दर्जन से अधिक जिलों की सीटों पर समाज का वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, देवरिया, बलिया, मऊ आदि जिलों की सीटों पर राजभर वोट बैंक 18 से 20 फीसदी तक है। यही कारण रहा कि यूपी चुनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ के इस क्षेत्र से आने के बाद भी भाजपा का प्रदर्शन उस स्तर का नहीं रहा। ओम प्रकाश राजभर तब सपा के साथ थे और इसका फायदा अखिलेश को मिल गया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय से पहले योगी सरकार इन 18 जातियों को एससी कोटि में डालने को लेकर फाइनल तैयारियों में जुटी थी। निषाद-केवट समाज की ओर से लगातार उठ रही मांग को लेकर सरकार अपनी तैयारियां कर रही थी। अब कोर्ट के आदेश के बाद सरकार के अगले कदम की हर कोई प्रतीक्षा कर रहा है। जिन जातियों को एससी श्रेणी में डालने की मांग हो रही है, वे यूपी के सामाजिक ताने-बाने में गरीब माने जाते हैं। ऐसे में सरकार के निर्णय पर सबकी नजर होगी।

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