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कांग्रेस ’गुलामी‘ से कब होगी आजाद

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय राजनीति के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने आखिरकार कांग्रेस को अलविदा कह ही दिया।

UB India News by UB India News
August 28, 2022
in खास खबर, जम्मू कश्मीर, ब्लॉग
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गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस छोड़ी, जी-23 के अहम नेताओं में से थे एक गुलाम नबी आजाद
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पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे पांच पेज के लंबे त्यागपत्र में उन्होंने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता सहित सभी पदों से इस्तीफा देने का जिक्र किया। पार्टी से नाता तो एक लाइन लिखकर भी तोड़ा जा सकता था, लेकिन इतना लंबा त्यागपत्र शायद इसलिए क्योंकि पांच दशक से भी ज्यादा समय तक वे जिस पार्टी के साथ रहे, उससे हाथ छुड़ाने के लिए गिले-शिकवे की फेहरिस्त भी काफी लंबी होनी चाहिए थी। सो इस्तीफे में उनके मन की बहुत सारी बातें हैं, लेकिन मुख्य रूप से निशाने पर राहुल गांधी हैं, जिन पर गुलाम नबी आजाद ने ‘पार्टी के पूरे सलाहकार ढांचे और चर्चा की परंपरा को ध्वस्त करने और अपने अनुभवहीन चाटुकारों के दम पर पार्टी चलाने’ का आरोप लगाया है।

इस्तीफा देकर गुलाम नबी आजाद अब कांग्रेस नेताओं की उस लंबी कतार में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने राहुल गांधी को दोषी ठहराते हुए अपने लिए राजनीति की नई राह चुनने का फैसला किया है। यह भी विडंबना है कि हाल के दौर में कांग्रेस छोड़ने वाले ज्यादातर नेता या तो गुलाम नबी आजाद की तरह गांधी परिवार के पुराने ‘वफादार’ थे या फिर राहुल गांधी के करीबी और लगभग सभी राहुल में नेतृत्व की कमी और उनकी जवाबदेही को लेकर एकमत दिखे हैं। सात साल पहले जब हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस छोड़ी थी तो उनके इस्तीफे के बजाय राहुल के पालतू श्वान को बिस्कुट खिलाने वाले किस्से की ज्यादा चर्चा हुई थी।

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ये बताता है कि कांग्रेस ही नहीं, भारतीय राजनीति ने भी सरमा के इस्तीफे को अपवाद मानकर कोई खास तवज्जो नहीं दी थी। ‘एक समय आएगा जब कांग्रेस में केवल ‘गांधी’ ही रह जाएंगे और बाकी सभी चले जाएंगे’ वाली उनकी भविष्यवाणी को भी एक नाराज युवा नेता का बड़बोलापन समझ कर खारिज कर दिया गया था, लेकिन उस वाकये को हल्के में लेना कांग्रेस को भारी पड़ा है। पिछले 8 साल में 400 से ज्यादा नेता कांग्रेस छोड़ चुके हैं। इनमें 33 बड़े नेता शामिल हैं। मौजूदा साल के 8 महीनों में ही 12 बड़े नेता कांग्रेस के किनारा कर चुके हैं। और अब जब गुलाम नबी आजाद पार्टी से दूर हुए हैं तो इस्तीफे की उनकी भाषा भले अलग हो, लेकिन मंतव्य वही है जो सरमा का था। आजाद ने अपने इस्तीफे में कहा है कि कांग्रेस अब उस स्थिति में पहुंच गई है जहां से उसकी वापसी संभव नहीं है।

इतने बड़े मामले पर भी कांग्रेस की ओर से हैरान करने वाली प्रतिक्रिया आई है। कांग्रेस ने एक बार फिर वही ‘पुरानी हवेली के जमींदार’ वाला रूप दिखाया है। प्रधानमंत्री से उनकी करीबियों का हवाला देकर पार्टी के पांच दशक के ‘सेवादार’ को ‘जीएनए (गुलाम नबी आजाद) के डीएनए का ‘मोदीफाइड’ होने’ जैसे तानों से विदाई दी जा रही है। वरिष्ठ से लेकर युवा कांग्रेसी खुद को राहुल के पैरोकार बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं, लेकिन पार्टी के अंदर ‘विद्रोह नहीं, बल्कि सुधार का बीड़ा उठाने’ की बात कह कर आजाद के इस्तीफे पर सवाल तो ग्रुप-23 में शामिल असंतुष्ट नेता पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने भी उठाए हैं।

आखिर ऐसी क्या बात हुई कि आजाद को बगावत का झंडा उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसकी दो वजहें दिखाई देती हैं। पहली वजह व्यक्तिगत है। कांग्रेस ने जब उन्हें जम्मू-कश्मीर में प्रदेश स्तर की कमेटी का सर्वेसर्वा बनाया तो आजाद को यह जिम्मेदारी अपने कद के अनुरूप नहीं लगी। इशारा स्पष्ट था कि पार्टी अब उनके बारे में ज्यादा दूर तक नहीं सोच रही है। दूसरी वजह पार्टी के भविष्य से जुड़ी दिखती है। दो साल से कांग्रेस अपना अध्यक्ष नहीं ढूंढ पाई है। बार-बार चुनाव टलने के बाद इस बार 20 अगस्त से 21 सितम्बर के बीच चुनावी प्रक्रिया पूरी होनी थी, लेकिन इसे लेकर कोई तैयारी नहीं दिख रही है। फिर चुनाव टलने के अंदेशे और यथास्थिति बरकरार रहने की निराशा ने भी आजाद को कांग्रेस से ‘आजाद’ होने के लिए प्रेरित किया होगा।

इतने लंबे समय से कांग्रेस का चुनाव टलने के पीछे भी कई लोग राहुल गांधी को जिम्मेदार मानते हैं। छिटपुट आंतरिक विरोध और तमाम चुनाव असफलताओं के बावजूद अभी भी ज्यादातर कांग्रेसियों की नजर में राहुल ही कांग्रेस का बेड़ा पार लगा सकते हैं, लेकिन राहुल बगैर जिम्मेदारी वाली राजनीति करना चाहते हैं और अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद से ही इस पद पर गैर-गांधी को लाने की जिद पकड़े हैं। अंतिम गैर-गांधी अध्यक्ष 1996 और 1998 के बीच सीताराम केसरी थे। फिर साल 2001 में जब दिवंगत कांग्रेस नेता जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था तो उन्हें केवल 94 वोट मिले थे। अध्यक्ष पद को लेकर ऊहापोह केवल कांग्रेस ही नहीं, जी-23 में भी है। आजाद की ही तरह नाराज चल रहे आनंद शर्मा ऑन रिकॉर्ड कह चुके हैं कि 2019 में जब राहुल गांधी ने चुनावी हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया तो किसी ने उन्हें ऐसा करने के लिए नहीं कहा था। कांग्रेस के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि नेहरू-गांधी परिवार पार्टी की अभिन्न बना रहे।

आजाद को लगा कि चुनावी प्रक्रिया से चुन कर आया अध्यक्ष भी कठपुतली से ज्यादा नहीं होगा। फिर आजाद ने एक ऐसे वक्त में पार्टी छोड़ी है, जब कांग्रेस भारत जोड़ो यात्रा की प्लानिंग कर रही है। उनके जैसे नेता का कांग्रेस से निकलना परसेप्शन के मामले में भी पार्टी को कमजोर करता है। पार्टी के नेताओं से मुलाकात में ऐसा प्रतीत होता है मानो नेतृत्व तो दूर, शीर्ष नेता किसी तरह के बौद्धिक या वैचारिक मार्गदर्शन की क्षमता खो चुके हैं। हाल के दिनों में, पार्टी केवल तभी सड़कों पर उतरी है, जब सोनिया और राहुल से नेशनल हेराल्ड मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने पूछताछ की। ऐसा लगता है कि कांग्रेस अभी भी सत्तर के दशक से कुख्यात रही कोटरी में उलझी है, जबकि देश आगे बढ़ चुका है। अब जबकि देश 2024 में अपनी अगली बड़ी चुनावी लड़ाई की तैयारी कर रहा है, तो राहुल गांधी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि उनका दुश्मन नंबर एक कौन है बीजेपी या उनकी दादी और माता-पिता के जमाने के पुराने कांग्रेसी? वहीं कांग्रेस के अंदरखाने इस बात पर चिंता है कि अगर पार्टी अपने आंतरिक चुनाव नहीं करा सकती है, तो वह देश को जीतने का बड़ा काम कैसे करेगी?

बड़ी चुनौती इस बात की है लोक सभा की लड़ाई में खंडित, बिखरे हुए विपक्ष का नेतृत्व कौन करेगा? अपने राष्ट्रीय स्वरूप के कारण आमतौर पर कांग्रेस को वह काम करना चाहिए था, लेकिन अब नीतीश, केजरीवाल, ममता बनर्जी और तेलंगाना के केसीआर जैसे अन्य दावेदार भी हैं। समस्या यह भी है कि शरद पवार और ममता सहित कई वरिष्ठ विपक्षी नेता न तो राहुल का सम्मान करते हैं और न ही उनके साथ सहज महसूस करते हैं। ऐसे में राहुल विपक्ष के एकजुट होने की राह का रोड़ा बनते भी दिख रहे हैं और उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्त्वाकांक्षा को सत्ताधारी दल बीजेपी ही नहीं, बल्कि पूरा विपक्ष एक मजाक मानने लगा है।

बीजेपी तो मानती है कि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ प्रधानमंत्री पद के विपक्षी चेहरे के रूप में राहुल की दावेदारी उसके लिए वरदान से कम नहीं है। हालांकि ये गांधी परिवार को मैदान से हटाने की रणनीति भी हो सकती है, लेकिन समस्याएं तो हैं। विडंबना यह है कि कई नाकामियों और चुनौतियों के बावजूद कांग्रेस के पास अभी भी एक प्रतिभाशाली और अनुभवी संगठनात्मक आधार वाला ऐसा संगठन है जो मतदाताओं को किसी बदलाव के लिए प्रेरित कर सकता है, लेकिन इसके लिए आवश्यकता है एक ऐसे नये नेतृत्व की जो नये-पुराने नेताओं के गिले-शिकवे मिटाकर पार्टी में नई जान फूंक सके, लीक से हटकर नया सोच सके और कांग्रेस को ज्यादा व्यावहारिक बना सके। सवाल है कि कांग्रेस खुद इसके लिए कहां तक तैयार है?

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