केंद्र और राज्य सरकार में जिस तरह विभाग होता है और विभागीय मंत्री होते हैं। इसी तर्ज पर त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में भी स्थायी समिति का प्रावधान किया गया है। परंतु स्थायी समिति कोरा कागज बन कर रह गयी है जिस कारण बिहार में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ का सपना सकार नहीं हो रहा है। जिला परिषद अध्यक्ष‚ प्रखंड़ प्रमुख और ग्राम पंचायत के मुखिया अपनी सुविधा के अनुसार ही कार्यों का निष्पादन करते हैं। विभिन्न समितियों की बैठक बुलाना जरूरी नहीं समझते हैं। बैठकें होती हैं तो सिर्फ कागजों पर।
पिछले दिनों पंचायती राज विभाग की समीक्षा बैठक में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के कहत गठित स्थायी समितियों के कार्यों की समीक्षा की गयी। समीक्षा में पाया गया है कि स्थायी समितियों के द्वारा अपने निर्धारित दायित्वों का निर्वहन नहीं किया जा रहा है। मद्ेनजर पंचायती राज विभाग के प्रधान सचिव ने सभी जिला पंचायती राज पदाधिकारियों को स्थायी समिति के गठन की समीक्षा करने की हिदायत दी और उनके प्रभावी रूप से कार्यरत होने से संबंधित आवश्यक दिशा निर्देश देने का आदेश दिया।
गौरतलब है कि जिला परिषद अपने कार्यों के प्रभावी निर्वहन के लिए निर्वाचन के द्वारा विभिन्न समितियां गठित करती है। सामान्य स्थायी समिति‚ वित्त‚ अंकेक्षण तथा योजना समिति‚ उत्पादन समिति‚ सामाजिक न्याय समिति‚ शिक्षा समिति‚ लोक स्वास्थ्य‚ परिवार कल्याण एवं ग्रामीण स्वच्छता समिति‚ लोक कार्य समिति आदि समितियां गठित की जाती हैं। प्रत्येक समिति में निर्वाचित सदस्यों में से अध्यक्ष सहित कम–से–कम तीन और अधिक–से–अधिक पांच सदस्य होते हैं। प्रत्येक समिति अपने दायित्वों के प्रभावकारी निर्वहन के लिए विशेषज्ञों या लोक हितबद्ध व्यक्तियों में से अधिक से अधिक दो सदस्यों को सहयोजित कर सकती है। जिला परिषद के अध्यक्ष‚ सामान्य स्थायी समिति तथा वित्त‚ अंकेक्षण एवं योजना समिति का पदेन सदस्य और अध्यक्ष होते हैं तथा प्रत्येक अन्य समिति के लिए एक अध्यक्ष नामित किया जाता है। अध्यक्ष उपर्युक्त दो समितियों सहित तीन से अधिक समितियों के अध्यक्ष का प्रभार नहीं रख सकता है। परन्तु प्रत्येक समिति में कम–से–कम एक महिला सदस्य होगी तथा सामाजिक न्याय समिति में एक सदस्य अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति का होगा। जिला परिषद् का कोई निर्वाचित सदस्य तीन से अधिक समितियों का सदस्य नहीं हो सकता है। मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी‚ सामान्य स्थायी समिति एवं वित्त अंकेक्षण तथा योजना समिति का पदेन सचिव होता है। प्रत्येक अन्य स्थायी समिति के सचिव के रूप में जिला दण्डाधिकारी एक राजपत्रित पदाधिकारी का नाम निर्दिष्ट करेगा जो साधारणतया जिला स्तरीय सम्बद्ध विभाग का प्रभारी होते हैं।
सामान्य स्थायी समिति संबंधित सामान्य कार्यों का निष्पादन करती है। वित्त अंकेक्षण तथा योजना समिति वित्त‚ अंकेक्षण‚ बजट एवं योजना से संबंधित कार्यों का निष्पादन करती है। उत्पादन समिति कृषि‚ भूमि विकास‚ लघु सिंचाई एवं जल प्रबंधन‚ पशुपालन‚ दुग्धशाला‚ कुक्कुट एवं मत्स्य पालन‚ वानिकी से संबंधित क्षेत्र‚ खादी‚ ग्रामीण एवं कुटीर उद्योगों और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों से संबंधित कार्यों का निष्पादन करती है। सामाजिक न्याय समिति अनुसूचित जातियों‚ अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य कमजोर वर्गों की शैक्षिक‚ आर्थिक‚ सामाजिक‚ सांस्कृतिक तथा अन्य हितों का प्रोत्साहन‚ ऐसी जातियों एवं वर्गों को सामाजिक अन्याय तथा अन्य सभी प्रकार के शोषणों से सुरक्षा प्रदान करना है।
प्रत्येक पंचायत समिति में भी सामान्य स्थायी समिति‚ वित्त‚ अंकेक्षण तथा योजना समिति‚ उत्पादन समिति‚ सामाजिक न्याय समिति‚ शिक्षा समिति‚ लोक स्वास्थ्य‚ परिवार कल्याण एवं ग्रामीण स्वच्छता समिति और लोक निर्माण समिति होती है। इसी तरह ग्राम पंचायत स्तर पर भी सामान्य स्थायी समिति‚ वित्त‚ अंकेक्षण तथा योजना समिति‚ उत्पादन समिति‚ सामाजिक न्याय समिति‚ शिक्षा समिति‚ लोक स्वास्थ्य‚ परिवार कल्याण एवं ग्रामीण स्वच्छता समिति और लोक निर्माण समिति गठित की जाती है। लेकिन बिहार में यह समितियां प्रभावी तरीके से कार्य नहीं कर रही हैं। समितियों की बैंठकें सिर्फ कागजों पर होती हैं जिस पर राज्य सरकार ने गंभीर चिंता जतायी है। मालूम हो कि बिहार में ग्राम पंचायत ८०७२‚ प्रखंड़ पंचायती समिति ५३३ और जिला परिषद ३८ हैं।







