एक बार फिर जहरीली शराब का कहर बरपा है। घटना शराबबंदी वाले राज्य गुजरात के बोटाद जिले में घटी है‚ जहां संदिग्ध रूप से जहरीली शराब का सेवन करने से कुल १९ लोगों की मौत हो गई है। वारदात में ४० से ज्यादा लोग बीमार बताए गए हैं। ज्ञातव्य है कि गुजरात में शराबबंदी वष १९६० में लागू की गई थी। शराबबंदी के बावजूद पीने और बनाने की घटना बदस्तूर जारी रहने के कारण २०१७ में शराबंदी कानून को और ज्यादा सख्त किया गया था‚ मगर पीने वालों और शराब तस्करों पर इस सख्त कानून का कोई प्रभाव नहीं पड़़ा। केंद्र सरकार के अनुसार‚ २०१६ से २०२० के दौरान बिहार में ३१ वहीं गुजरात में ५१ लोगों की मौत शराब पीने के कारण हुई। हालांकि यह आधिकारिक आंकड़़ा है। असल में मौत का आंकड़़ा इससे दोगुना–तिगुना होने का अनुमान है। गुजरात जैसे हालात बिहार के भी हैं। यहां शराबबंदी कानून २०१६ में लागू किया गया‚ मगर यहां भी अब तक सैकड़़ों लोग इसका सेवन कर काल–कवलित हो चुके हैं। बड़़ा सवाल यही है कि शराबबंदी के सख्त प्रावधानों के बावजूद इन राज्यों में शराबबंदी सफल क्यों नहीं हो पा रही हैॽ क्या इसके लिए सरकार दोषी है या कुछ और वजहें हैं। बिहार में जब शराबबंदी का ऐलान किया गया तो इस निर्णय को नीतीश का व्यक्तिगत फैसला बताया था और यह आरोप भी लगाया गया कि इसे बेहद जल्दबाजी में लाया गया है। खैर‚ विपक्ष के आरोपों को आंशिक रूप से सही भी मान लें तो भी शराबबंदी कानून के रहते शराब का चोरी–छिपे निर्माण और सेवन यही बताता है कि जनता में इसका ड़र नहीं है। सरकार को इस बात की पडताल करनी चाहिए कि आखिर इतना बड़़ा जोखिम लोग क्यों ले रहे हैंॽ क्या पूर्व में शराब के धंधे में लगे लोगों को रोजगार नहीं मिल सका या शराबबंदी कानून पर नजर रखने वाला आबकारी महकमा लाचार और दीन–हीन हो गया हैॽ क्या पुलिस विभाग में शराबबंदी कानून को सख्ती के साथ लागू कराने लायक बल नहीं हैॽ बिहार के संदर्भ में यह तथ्य सामने आए हैं कि पर्याप्त पुलिस बल के नहीं रहने के कारण शराब का कारोबार करने वालों पर नजर नहीं रखी जा रही है। खैर जो भी हो‚ यह वाकई बेहद गंभीर मसला है और इसका समाधान जल्द तलाशने की जरूरत है। सरकार को दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करनी होगी।







