द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना वास्तव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मास्टर स्ट्रोक है। राष्ट्रपति पद के लिए हुए मतदान के समय जिस तरह विपक्षी दलों में फूट पड़ी और क्रॉस वोटिंग हुई उससे साबित हो गया कि पीएम मोदी का आदिवासी और महिला कार्ड चल गया। द्रौपदी मुर्मू का देश का अगला राष्ट्रपति निर्वाचित होना निश्चित है। वो आगामी २५ जुलाई को देश के नये राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगी। भारत का सौभाग्य ही रहा कि उसे गोरी सरकार से मुक्ति मिलने के बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और उनके बाद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे ज्ञानी‚ प्रकांड विद्वान और धीर गंभीर राष्ट्रपति मिले। ड़ॉ. जाकिर हुसैन का कार्यकाल भी प्रभावी रहा।
अगर बात डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की करें तो उन्होंने १९५१ में सोमनाथ मंदिर के पुननिर्माण के बाद इसका उद्घाटन किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को यह पसंद नहीं आया और वो उनके सोमनाथ मंदिर में जाने को लेकर सवाल खड़े करते रहे। राजेन्द्र बाबू की पहल पर राष्ट्रपति भवन परिसर के भीतर मंदिर और मस्जिद दोनों का ही निर्माण हुआ। राष्ट्रपति भवन से सटे हैं चर्च और गुरु द्वारा। इसलिए इनके निर्माण की जरूरत महसूस नहीं की गई होगी। राजेन्द्र बाबू और उनकी पत्नी राजवंशी देवी प्रति वर्ष दिवाली‚ ईद‚ क्रिसमस‚ बाबा नानक जन्म दिन आदि त्यौहार पूरे राष्ट्रपति भवन के सैकड़ों कर्मचारियों के साथ मनाते थे।
अगर बात प्रणब कुमार मुखर्जी की करें तो वे भी देश के आदर्श राष्ट्रपति रहे। उन्होंने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भारत के शत्रुओं की कमर तोड़ने में निर्णायक भूमिका निभाई। प्रणब दा की हरी झंडी मिलने के बाद ही अफजल गुरु‚ अजमल कसाब और याकूब मेमन जैसे देश के दुश्मनों को फांसी संभव हुई। राष्ट्रपति के रूप में उनके कार्यकाल की अहम बात थी कि उन्होंने दया याचिकाओं पर पूरी सख्ती अपनाई। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ज्ञान के सागर थे। सियासत में न आते तो संवैधानिक मामलों के ख्यात विशेषज्ञ‚ इतिहासकार या प्रखर लेखक भी हो सकते थे। उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। उन्हें पचास–साठ साल पुरानी घटनाएं तिथियों के साथ याद रहा करती थीं। वे राजनीति में लंबी पारी खेलने के बाद भी बेदाग रहे। उन पर किसी ने हल्का आरोप लगाने की भी हिमाकत नहीं की। बाद में चलकर उन्हें देश ने अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न भी दिया। लेकिन‚ सारा देश तो उन्हें पहले से ही देशरत्न कहता था
आम तौर पर राष्ट्रपति के रूप में नीलम संजीव रेड्डी के कार्यकाल की खास चर्चा नहीं होती। जब उनका राष्ट्रपति बनना तय हो गया तो उन्होंने इच्छा जताई थी कि वे राष्ट्रपति भवन से इतर किसी छोटे आवास में रहना चाहेंगे। ऐसी इच्छा जताने वाले तब तक के वे एकमात्र राष्ट्रपति रहे। उनसे पहले या बाद के किसी भी राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति भवन के स्थान पर किसी अन्य जगह पर रहने के बारे में नहीं सोचा। नीलम संजीव रेड्डी को समझाया गया कि सुरक्षा और अन्य कारणों के चलते यह संभव नहीं होगा। तब उन्होंने ३४० कमरों वाले भव्य राष्ट्रपति भवन में ही रहने का फैसला किया। पर वे और उनका परिवार राष्ट्रपति भवन के कुछ कमरों को ही इस्तेमाल करते थे। १९७७ के आम चुनाव में जब इंदिरा गांधी की पराजय हुई‚ उस समय नवगठित जनता पार्टी ने नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति का प्रत्याशी बनाया। राष्ट्रपति पद से रिटायर होने के बाद वे अपने गृह राज्य आंध्र प्रदेश वापस चले गए थे।
निश्चित रूप से प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का राष्ट्रपति बनना देश के लिए गौरव के क्षण थे। वे राष्ट्रपति बनने से पहले ही अग्नि और पृथ्वी मिसाइलों को विकसित करके देश के नायक बन चुके थे। वे देश के पहले अविवाहित राष्ट्रपति थे। अब्दुल कलाम व्यक्तिगत जिंदगी में बेहद अनुशासन प्रिय थे। अपनी जीवनी ‘विंग्स ऑफ फायर’ उन्होंने भारतीय युवाओं को मार्गदर्शन प्रदान करने वाले अंदाज में लिखी। राष्ट्रपति भवन में रहते हुए और उसके बाद भी युवाओं के बीच रहना पसंद करते थे। उनके साथ अपने जीवन के अनुभव साझा करते थे। विदेशी राष्ट्राध्यक्ष और प्रधानमंत्री भी उनसे मिलकर अपने को समृद्ध महसूस करते थे। देश उन्हें मिसाइल मैन के रूप में याद करता है।
माफ करें कि राष्ट्रपति पद की गरिमा को बट्टा लगना चालू हुआ राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के समय से। उन्होंने २५ और २६ जून‚ १९७५ की रात को आपातकाल के आदेश पर दस्तखत करके देश में आपातकाल लागू कर दिया था। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना‚ ‘भाइयों और बहनों‚ राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है’.लेकिन‚ सच तो इंदिरा की घोषणा से ठीक उलटा था। देश भर में गिरफ्तारियों के साथ आतंक का दौर पिछली रात से ही शुरू हो गया था। उसके बाद कांग्रेस ने वीवी गिरि‚ ज्ञानी जैल सिंह‚ आर. वेंकटरामण और प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को राष्ट्रपति भवन भेजा। ये सभी अच्छे इंसान थे‚ लेकिन राष्ट्रपति पद की गरिमा के अनुकूल थे या नहीं‚ इस पर तो बहस चलती ही रहेगी ।
प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त हुआ था। वे २००७ से २०१२ तक इस पद पर रहीं। प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति भवन छोड़ने के बाद पुणे शिफ्ट कर गई थीं। वहां पर सरकार ने उन्हें एक सरकारी बंगला आवंटित कर दिया था। उनके लिए पुणे में जो बंगला आवंटित किया गया था उससे वह खुश नहीं थीं। उन्होंने सरकार से कहा कि उनके लिए जो बंगला तैयार किया किया गया है वह बंगला छोटा रहेगा। उन्होंने कहा था कि उनके परिवार के सदस्यों की संख्या ज्यादा है। इसलिए उन्हें बड़ा बंगला मिले। सरकार ने उनकी मांग मान ली थी। ओडि़शा के आदिवासी समाज से संबंध रखने वाली द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने पर सारा देश खासकर महिलाएं और पूरा आदिवासी और दलित वंचित समाज प्रसन्न होगा। वो देश की १३५ करोड़ जनता को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से और भी गौरवान्वित कर सकती हैं‚ उनसे ऐसी अपेक्षा देश करता है।







