शाश्वत सत्य है कि संसार में जो जन्म लेता है उसको एक न एक दिन मृत्यु की गोद में समाहित होना ही पडता है और तत्पचात् उसके कर्म एवं प्रारब्ध के आधार पर संसार में उसके पुनर्जन्म लेने की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। जन्म एवं जीवन–यात्राः किसी भी प्राणी का जन्म प्रकृति के अपने गुणों के आधार पर होता है तथा उसी त्रिगुणी (सतोगुण‚ रजोगुण एवं तमोगुण) प्रकृति से जीवन का संचालन भी होता है। इस बात को श्रीमद् भगवद् गीता के १४वें अध्याय में परम ज्ञानी भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि मेरी यह आठ तत्वों वाली जड प्रकृति (जल‚ अग्नि‚ वायु‚ पृथ्वी एवं आकाश‚ मन‚ बुद्धि एवं अहंकार) ही समस्त वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली योनि (माता) है तथा मैं ही इसमें ब्रह्म (आत्मा) रूप में चेतन रूपी बीज को स्थापित करता हूं‚ इस जड एवं चेतन के संयोग से ही संसार के समस्त चर–अचर प्राणियों का जन्म सम्भव होता है। समस्त योनियों से जो शरीर धारण करने वाले प्राणी उत्पन्न होते हैं उन सभी को धारण करने वाली जड प्रकृति ही माता है और मैं ही ब्रह्म (आत्मा) रूपी बीज को स्थापित करने वाला पिता हूं।
श्रीमद् भगवद् गीता के अध्याय १४ में ही भगवान श्री कृष्ण ने बताया है कि भौतिक प्रकृति से ही सात्विक गुण‚ राजसिक गुण एवं तामसिक गुण की उत्पत्ति होती है। प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों के कारण ही अविनाशी जीवात्मा नश्वर शरीर में बंध जाती है।
तीनों गुणों में सतोगुण अर्थात् अच्छाई का गुण अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक शुद्ध होने के कारण पाप कर्मों से जीव को मुक्त करके आत्मा को प्रकाशित करने वाला होता है जिससे जीव सुख और ज्ञान के बन्धन में बंध जाता है।
रजोगुण की प्रकृति मोह है‚ इसकी उत्पत्ति कामनाओं एवं लोभ के कारण होती है जिसके कारण शरीरधारी जीव फल की आसक्ति में बंध जाता है।
तमोगुण के विषय में कहा है कि तमोगुण की उत्पत्ति अज्ञानता में शरीर के प्रति मोह के कारण होती है जिसके कारण जीव प्रमाद (पागलपन में व्यर्थ के कार्य करने की प्रवृत्ति)‚ आलस्य (आज के कार्य को कल पर टालने की प्रवृत्ति) एवं निद्रा (अचेत अवस्था में न करने योग्य कार्य करने की प्रवृत्ति) द्वारा बंध जाता है। कुल मिलाकर इन त्रिगुणों को सरल भाषा में ऐसे समझा जा सकता है कि सतोगुण मनुष्य को सुख में और रजोगुण सकाम कर्म में बांधता है जबकि तमोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढक कर प्रमाद में बांधता है। ये तीनों गुण प्रत्येक मनुष्य में होते हैं। इन तीनों गुणों में से किसी भी दो गुणों के घटने से मनुष्य में स्वाभाविक रूप से तीसरे गुण की वृद्धि हो जाती है। जब मनुष्य में रजोगुण की विशेष वृद्धि हो जाती है‚ तो उसके मन में लोभ उत्पन्न हो जाने के कारण फल की इच्छा से कार्यों को करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होने लगती है‚ और उसके मन में चंचलता उत्पन्न होने के कारण विषय भोगों को भोगने की इच्छा अनियंत्रित होने लगती है। जब मनुष्य में तमोगुण की विशेष वृद्धि हो जाती है‚ तो अज्ञान रूपी अंधकार के कारण कर्त्तव्य कर्मों को न करने की प्रवृत्ति बढने लगती है‚ साथ ही उसके मन में न करने योग्य कार्यों को करने की प्रवृत्ति ठीक उसी प्रकार बढने लगती है जैसे पागलपन की अवस्था में अथवा अत्यधिक मोह के कारण किसी व्यक्ति के मन में न करने योग्य कार्यों को करने की प्रबल इच्छा होती है। ईश्वरीय व्यवस्था में इन तीन गुणों का ही योगदान है‚ यहां तक कि त्रिदेव में पूज्य ब्रह्मा जी सतव‚ भगवान विष्णु जी रजस तथा भगवान शिव तमस गुण की प्रधानता के देवता हैं‚ इसी प्रकार से रात्रि १२ बजे से प्रातः ८ बजे तक का समय शांतिपूर्ण योग‚ ध्यान एवं साधना के लिए तय है। प्रातः ८ बजे से सायं ४ बजे तक कर्म की प्रधानता वातावरण में प्रभावी रहती है तथा सायं ४ बजे से रात्रि १२ बजे तक निद्रा‚ आलस्य एवं भोग–विलास की प्रधानता रहती है‚ यह एक स्वतः प्रक्रिया है। समाज में भी इन्हीं तीन प्रकार के लोग विद्यमान हैं‚ जब तक मनुष्य इनमें सन्तुलन बनाए रखता है‚ तब तक उसका जीवन सार्थक एवं लाभप्रद रहता है परन्तु इनमें असन्तुलन अर्थात् किसी एक गुण की अत्यन्त वृद्धि होने की दशा में वह स्थिति उस व्यक्ति एवं समाज के लिए हानिकारक एवं घातक हो जाती है। सतोगुण के सन्तुलन से समाज में धैर्य‚ साहस‚ सन्तुष्टि एवं दया भाव की उत्पत्ति होती है‚ जिससे सामाजिक वातावरण सन्तुलित होता है परन्तु जब समाज में इसकी प्रधानता हो जाती है तो प्रगति में बाधा पहुंचती है क्योंकि सन्तुष्टि का भाव प्रकृति के विकास की ओर कर्म करने में बाधा उत्पन्न करता है। रजोगुण चूंकि कर्म एवं इच्छा की प्रधानता वाला गुण है इसलिये यह संसार के सृजन एवं प्रगति में सहायक होता है तथा इसकी प्रधानता होने से समाज प्रत्येक कर्म के पीछे पहले अपना स्वार्थ खोजने लगता है‚ जिससे सामाजिक वातावरण में स्वार्थ की प्रधानता हो जाती है। तमोगुण एक प्रकार की ऐसी ऊर्जा है जो समाज की आन्तरिक एवं बाहरी सीमाओं की रक्षा हेतु अत्यन्त आवश्यक होता है। देश में पुलिस व्यवस्था एवं सीमा पर खडे सैनिक इसकी मिसाल हैं परन्तु इसकी वृद्धि होने पर समाज में क्रोध‚ आलस्य एवं नकारात्मक भाव स्वरूप वैर–द्वेष की उत्पत्ति होती है जो कि समाज एवं प्रकृति के विनाा को तय करता है।
इस प्रकार जब शरीर के सभी द्वार इशस ज्ञान से आलोकित हो जाते हैं तब इसे सत्वगुण की अभिव्यक्ति मानो‚ जब रजोगुण प्रबल होता है तो लोभ‚ सांसारिक सुखों के लिए परिश्रम‚ बेचैनी‚ उत्कंठा के लक्षण विकसित होते हैं‚ जडता‚ असावधानी तथा भ्रम ये तीनों ही तमोगुण के प्रमुख लक्षण होते हैं। पुनर्जन्मः जब कोई मनुष्य सतोगुण की वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होता है‚ तो उत्तम कर्म करने वाले को स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। जब कोई मनुष्य रजोगुण की वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होता है‚ तो वह सकाम कर्म करने वाले मनुष्य योनि में जन्म लेता है‚ और इसी प्रकार तमोगुण की वृद्धि होने पर जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है तो वह कीट–पतंगों एवं पशु–पक्षियों आदि निम्न योनियों में जन्म लेता है। जो मनुष्य ईश्वरीय ज्ञान रूपी प्रकाश (सतोगुण) तथा कर्म करने की आसक्ति (रजोगुण) तथा मोह रूपी अज्ञान (तमोगुण) के बढने पर कभी भी उनसे घृणा नहीं करता तथा समान भाव में स्थित होकर न तो उनमें प्रवृत्त ही होता है और न ही उनसे निवृत्त होने की इच्छा ही करता है‚ जो सुख–दुख में समान भाव से स्थित रहता है‚ जो अपने आत्म भाव में स्थित रहता है‚ जो मिट्टी और स्वर्ण को समान समझता है‚ जो प्रिय एवं अप्रिय का वर्गीकरण नहीं करता और जो निन्दा और स्तुति में धीरज नहीं खोता है‚ जो मान एवं अपमान को समान समझता है‚ जो मित्र एवं शत्रुओं के प्रति एक भाव रखता है‚ जो कर्ता होते हुए भी स्वयं को कर्ता भाव में नहीं मानता और जो हर परिस्थिति में बिना विचलित हुए अनन्य भाव से मेरी भक्ति में स्थित रहता है‚ ऐसी कर्म भक्ति करने वाला मनुष्य प्रकृति के तीनों गुणों को अति शीघ्र पार करके ब्रह्म पद पर स्थित हो जाता है अर्थात् जो मनुष्य आध्यात्मिक ज्ञान में इन गुणों का विश्लेषण कर अपने कर्मों में तीनों गुणों के असंतुलित प्रभाव से परे रहकर अपने जीवन उद्देश्य के तहत कर्मों को अंजाम देता है‚ वही मनुष्य पुनर्जन्म से मुक्ति पाकर उस परम शक्ति में विलीन हो जाता है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति करता है।







