प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सभी तीन नए कृषि कानून वापस लेने के फैसले पर बिहार के राजनीतिक दलों ने मिली-जुली प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सरकार के सहयोगी दल इसे किसानों के हित में लिया गया फैसला बता रहे हैं तो विपक्षी दल इस फैसले में देरी के लिए सरकार की आलोचना कर रहे हैं। भाजपा की ओर से प्रदेश के कृषि मंत्री अमरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि सरकार नहीं चाहती कि एक भी किसान पर यह कानून जबर्दस्ती लागू किया जाए। इसलिए फिलहाल सरकार ने इसे वापस लेने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि तीनों कानून किसानों के हित में ही थे। वहीं राजद के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने फैसले का स्वागत किया। जदयू के डा. अजय आलोक ने इस पर अफसोस जताया है।
जदयू के डा. अजय आलोक ने कहा कि छोटे किसानों की बेबसी खत्म करने का मकसद पूरा नहीं हो सका। उन्हें फिर से बिचौलियों पर निर्भर रहना होगा। उन्होंने कहा कि ये संवेदना से परिपूर्ण एक प्रधानमंत्री का फैसला है, जो अत्यंत छोटे तबके को भी नजरअंदाज करने से इनका करता है और अपने एक सही निर्णय को वापस लेता है। उन्होंने कहा कि इस देश में कुछ लोगों को सुधारों से परहेज है।
राजद सुप्रीमो लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने कहा है कि अन्नदाता की जीत हुई है और पूंजीपतियों की हितैषी सरकार हार गई है। जन अधिकार पार्टी के अध्यक्ष पप्पू यादव ने कहा कि परजीवी सरकार आंदोलनजीवी से हार गई। उन्होंने कहा कि काले कृषि कानूनों की वापसी जनसंघर्ष की जीत है। उन्होंने कहा कि किसानों को दंगाई, आतंकवादी और देशद्रोही कह कर अपमानित करने वालों को अब माफी मांगनी चाहिए।
राजद के सांसद मनोज झा ने इस मौके पर सरकार पर तंज कसा है। उन्होंने कहा कि हठधर्मिता और अहंकार को जन आंदोलन ने रास्ते पर ला दिया। उन्होंने कहा कि सरकार को लोकतांत्रिक संवाद के रास्ते खुले रखने चाहिए। यह फैसला काफी नहीं है, सरकार को इससे एक सबक लेना चाहिए।
तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन नौ अगस्त 2020 से शुरू हुआ था। किसानों के आंदोलन का बिहार में कुछ खास असर नहीं दिखा, हालांकि विपक्षी दलों ने आंदोलन के समर्थन में कई बार सड़क पर उतरकर विरोध जताया। बिहार के ज्यादातर किसान नए कृषि कानूनों के समर्थन में ही दिख रहे थे।







