प्रकाश पर्व दीपावली से एक दिन पहले बुधवार को बिहार के कई घरों के चिराग बुझ गए। दो दिन के अंदर कुल २८ लोगों की संदिग्ध हालात में मौत हो गई। ऐसा कहा जा रहा है कि इन लोगों की मौत जहरीली शराब के सेवन से हुई है। प्रशासन ने अभी तक मौत की वजह की पुष्टि नहीं की है। वाकई यह बिहार के लिए बड़़ी शर्म की बात है। ज्ञातव्य है कि बिहार में शराबबंदी लागू है और नीतीश सरकार शराबबंदी को लेकर विपक्ष के निशाने पर रहती है। गौरतलब तथ्य यह भी है कि शराबबंदी के बाद से बिहार में अब तक जहरीली शराब से हुई करीब १२८ मौतों में सर्वाधिक ९३ साल २०२१ में ही हुई है। इसके पहले शराबबंदी के बाद साल २०१६ से २०२० तक जहरीली शराब के कारण ३५ लोगों की मौत हुई थी। पहली घटना बुधवार को गोपालगंज जिले में हुई जहां‚ जहरीली शराब पीने से आठ लोगों की मौत हुई थी। इसके एक दिन बाद ही गुरु वार से शुक्रवार तक पश्चिम चंपारण के नौतन में १५ की मौत हो गई। यानी उत्तरी बिहार में ऐसा शराब सिंडि़केट है‚ जो चोरी–छुपे जहरीली शराब का न केवल निर्माण करता है बल्कि उसकी बिक्री भी प्रशासन की नाक के नीचे करता है। क्या ऐसा संभव है कि पुलिस–प्रशासन की निगहबानी से शराब माफिया की करतूत छुप सकेॽ शराब की बिक्री और वितरण के मामले में देखा गया है कि यह ‘गंदा धंधा’ पुलिस की सरपरस्ती में ही फलता–फूलता है। लाजिमी है कि सरकार को अब ज्यादा सख्त कानून अमल में लाना होगा। पुलिस बल की संख्या बढ़ानी होगी और उन्हें सभी संसाधनों से सुसज्जित करना होगा। इसके अलावा स्थानीय खुफिया ईकाई को साधन–संपन्न बनाना होगा। साथ ही पूरे राज्य में शराबबंदी की खामियों को लेकर जागरूकता अभियान चलाना होगा। गोपालगंज और पश्चिम चंपारण में घटित वारदात की प्रकृति से यही पता चलता है कि यहां बिना किसी ड़र के नकली शराब बनाई और बेची जा रही थी। आमतौर पर जिस किसी राज्य में शराबबंदी कानून लागू है‚ वहां से यदा–कदा इस तरह की घटनाएं प्रकाश में आती हैं। मगर बिहार के मामले में देखा गया कि यह धंधा बदस्तूर जारी है। खास बात यह है कि शराबबंदी की वजह से सरकार को राजस्व का तगड़़ा नुकसान भी उठाना पड़़ता है। अच्छी बात यह है कि शराबबंदी का समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़़ा है‚ किंतु सरकार को एक मर्तबा जरूर इस कानून के गुण–दोष का समग्रता में अध्ययन करना चाहिए।
बांकीपुर को लेकर BJP कांफिडेंस में है या निरुत्साही में है ! …
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