रांची: झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों के आंदोलन का रविवार को 16वां दिन है. इस बीच सरकार और छात्रों के बीच रविवार को छठे दौर की बातचीत भी हो रही है. सरकार के मंत्रियों ने आंदोलनकारी छात्रों से वीडियो कॉल पर भी बात की है. बताया जा रहा है कि सरकार छात्रों की कुछ मांगों को मान गई है. हालांकि, छात्रों का कहना है कि लिखित में आश्वासन मिलने तक उनका आंदोलन जारी रहेगा.
सीजीएल परीक्षा रद करने तथा सीबीआइ जांच पर तैयार नहीं हुई सरकार। मंत्री सुदिव्य के अनुसार, 98 प्रतिशत मांगों पर सहमति बनी है। दो प्रतिशत मांगों को नहीं मानने के पीछे छात्रों को कारण बताया गया है। चूंकि सीजीएल की परीक्षा झारखंड उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर हुई है, इसलिए सरकार इसे रद करने में सक्षम नहीं है।
मंत्रियों की कमेटी ने छात्रों के प्रतिनिधिमंडल को अपने नेताओं से बात कर जवाब देने के लिए दिया समय। छात्रों ने कहा कि सोमवार को विधानसभा का घेराव शांतिपूर्ण होगा। छात्रों ने साफ तौर पर कहा ऐसे में हड़ताल जारी रहेगी। 10 को विधानसभा का घेराव होगा।
झारखंड में चल रहा छात्र आंदोलन केवल किसी एक परीक्षा, एक आयोग या एक सरकार के खिलाफ नाराजगी के रूप में देखना आसान है, लेकिन वास्तविक तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। यह आंदोलन सरकारी भर्ती व्यवस्था में भरोसे के संकट का संकेत है। हाल के दिनों में JPSC और JSSC की परीक्षाओं को लेकर अभ्यर्थियों की शिकायतें, जांच एजेंसियों की कार्रवाई, परीक्षाओं का स्थगन और आयोग से जुड़े पदाधिकारियों के इस्तीफे—इन सबने इस सवाल को गंभीर बना दिया है कि आखिर सरकारी नौकरी पाने की पूरी प्रक्रिया को युवाओं के लिए कितना विश्वसनीय और निष्पक्ष बनाया जा सका है।
शासन की विश्वसनीयता की भी परीक्षा होती है
झारखंड में इन दिनों सड़कों पर दिखाई दे रहा छात्र आंदोलन किसी सामान्य विरोध-प्रदर्शन की तरह नहीं है। इसके पीछे वर्षों की तैयारी, बेरोजगारी की चिंता, सरकारी नौकरी की सीमित संभावनाएं और उससे भी बढ़कर व्यवस्था पर भरोसा टूटने का डर है।
JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। अभ्यर्थियों की मांगों में निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कार्रवाई, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और जहां आवश्यक हो वहां परीक्षा रद्द कर दोबारा कराने जैसी मांगें शामिल हैं। अगस्त 2026 में आंदोलन लगातार जारी है और कई छात्र भूख हड़ताल तक पहुंच चुके हैं।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए भावनाओं से थोड़ा आगे जाना होगा।
क्योंकि असली प्रश्न यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत?
असली प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई जिसमें हजारों युवाओं को परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता पर सड़क पर उतरकर सवाल पूछना पड़ रहा है?
जब नौकरी की परीक्षा जीवन की सबसे बड़ी उम्मीद बन जाए
भारत के छोटे और मध्यम शहरों तथा ग्रामीण इलाकों में सरकारी नौकरी आज भी केवल एक नौकरी नहीं है।
यह परिवार की आर्थिक सुरक्षा है।
यह सामाजिक प्रतिष्ठा है।
यह माता-पिता के वर्षों के त्याग का परिणाम है।
यह एक युवा के लिए आत्मनिर्भर बनने का रास्ता है।
एक छात्र कई वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है। कोचिंग, किताबें, किराया, यात्रा, इंटरनेट और परीक्षा शुल्क पर पैसा खर्च करता है। कई बार वह निजी नौकरी के अवसर छोड़ देता है। परिवार उसकी तैयारी को निवेश की तरह देखता है। फिर परीक्षा होती है।और यदि परीक्षा के बाद प्रश्नपत्र लीक होने, उत्तरों में गड़बड़ी, परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था, अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ, परीक्षा एजेंसी की भूमिका या चयन प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता के आरोप सामने आते हैं, तो नुकसान केवल एक परीक्षा का नहीं होता। एक युवा के जीवन के कई महीने या कई वर्ष प्रभावित होते हैं।
यही इस आंदोलन की सबसे गंभीर पृष्ठभूमि है।
JPSC विवाद ने सवालों को और गंभीर बनाया
वर्तमान आंदोलन की पृष्ठभूमि में 14वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा भी महत्वपूर्ण है। अप्रैल 2026 में हुई इस परीक्षा को लेकर शिकायतों और आरोपों के बाद मामला जांच के दायरे में आया।
जुलाई में झारखंड CID ने JPSC कार्यालय तथा संबंधित स्थानों पर कार्रवाई की। जांच के दौरान कई लोगों की गिरफ्तारी हुई। 24 जुलाई तक गिरफ्तारियों की संख्या आठ बताई गई थी और जांच के लिए SIT भी गठित की गई थी।
JPSC ने इस विवाद के बीच जुलाई के अंत में होने वाली सिविल सेवा मुख्य परीक्षा को भी स्थगित कर दिया था। रिपोर्टों के अनुसार, परीक्षा से जुड़े एक पूर्व उप परीक्षा नियंत्रक समेत कई लोगों की गिरफ्तारी के बाद यह कदम उठाया गया।
इस पूरे घटनाक्रम में JPSC के तत्कालीन अध्यक्ष एल. खियांग्ते का इस्तीफा भी सामने आया। CID ने उनसे पूछताछ की और जांच का दायरा परीक्षा संचालन, एजेंसी के चयन और शिकायतों के निपटारे जैसे पहलुओं तक गया।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—
जांच में किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी या किसी अधिकारी का इस्तीफा अपने आप में अपराध सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है।
अपराध का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा।
लेकिन इतना जरूर है कि जब जांच एजेंसी कार्रवाई करे, परीक्षा स्थगित हो, आयोग के शीर्ष स्तर पर बदलाव हों और छात्र लगातार सवाल उठाते रहें, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी होती है।
JSSC का पुराना विवाद भी छात्रों की स्मृति में है
आज का आक्रोश केवल 2026 की घटनाओं से पैदा हुआ हो, ऐसा कहना पूरी तस्वीर नहीं होगी।
JSSC CGL परीक्षा को लेकर भी पहले गंभीर विवाद सामने आ चुके हैं। 2024 की परीक्षा को प्रश्नपत्र लीक और अनियमितताओं के आरोपों के कारण रद्द/स्थगित किए जाने के बाद अभ्यर्थियों ने विरोध किया था। सितंबर 2024 की परीक्षा के बाद भी प्रश्नपत्र लीक और दोहराए गए प्रश्नों को लेकर अभ्यर्थियों ने परीक्षा रद्द करने की मांग की थी।
झारखंड हाई कोर्ट में दायर एक मामले में भी 2024 JSSC CGL परीक्षा से जुड़े कथित प्रश्नपत्र लीक और नकल के आरोपों का उल्लेख हुआ। अदालत के रिकॉर्ड में ऐसे आरोपों का विवरण मौजूद है; हालांकि आरोप और न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य में अंतर रखना जरूरी है।
यही वजह है कि आज जब JPSC को लेकर नया विवाद सामने आया, तो पुराने अनुभव भी छात्रों के आक्रोश को बढ़ाने लगे।
उनके मन में एक स्वाभाविक सवाल पैदा हुआ—
“क्या फिर वही होने जा रहा है?”
सबसे खतरनाक चीज प्रश्नपत्र लीक नहीं, भरोसा टूटना है
प्रश्नपत्र लीक एक गंभीर अपराध है।
लेकिन उससे भी बड़ा नुकसान तब होता है जब छात्रों को लगने लगे कि मेहनत से ज्यादा महत्वपूर्ण किसी और का संपर्क, पैसा या पहुंच हो सकती है।
यह धारणा यदि समाज में फैल जाए तो प्रतियोगी परीक्षा की पूरी नैतिकता समाप्त होने लगती है।
एक ईमानदार छात्र सोचने लगता है—
“अगर चयन पहले से तय हो सकता है तो मैं क्यों पढ़ूं?”
यही वह बिंदु है जहां परीक्षा का संकट सामाजिक संकट बन जाता है।
क्योंकि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में आने वाले डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और कर्मचारी केवल कर्मचारी नहीं होते। वे आने वाले वर्षों के शासन का चेहरा होते हैं।
यदि उनकी नियुक्ति प्रक्रिया पर ही संदेह पैदा हो जाए तो शासन की वैधता और संस्थाओं की प्रतिष्ठा दोनों प्रभावित होती हैं।
छात्रों का आंदोलन लोकतंत्र के लिए जरूरी है, लेकिन उसका रास्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण है
छात्रों का विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है।
सरकार से सवाल पूछना अपराध नहीं है।
निष्पक्ष जांच की मांग करना अपराध नहीं है।
परीक्षा रद्द करने की मांग करना भी अपने आप में अपराध नहीं है।
लेकिन आंदोलन की शक्ति उसकी नैतिकता और शांतिपूर्ण अनुशासन में होती है।
आज झारखंड में कई छात्र शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे हैं। रचनात्मक पोस्टर, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सार्वजनिक संवाद के माध्यम से भी अपनी बात रखी जा रही है।
यही आंदोलन की सबसे मजबूत तस्वीर है।
इसके विपरीत यदि किसी आंदोलन में हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी या राजनीतिक दलों द्वारा मुद्दे के अपहरण की स्थिति पैदा होती है, तो मूल प्रश्न पीछे छूट जाता है।
फिर चर्चा यह नहीं होती कि परीक्षा में क्या गड़बड़ी हुई।
चर्चा होने लगती है—
किसने सड़क जाम की? किसने पत्थर फेंका? किसने पुलिस से टकराव किया?
और यही किसी भी छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी होती है।
सरकार के सामने भी केवल बचाव का नहीं, सुधार का अवसर है
सरकार के लिए यह संकट केवल राजनीतिक चुनौती नहीं है।
यह एक अवसर भी है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने छात्रों के मामले में संवाद और पारदर्शिता पर जोर देने की बात कही है।
9 अगस्त 2026 को राज्य सरकार की सिफारिश के बाद राज्यपाल ने JPSC के तीन सदस्यों—अजीता भट्टाचार्य, अनीमा हांसदा और जमाल अहमद—के इस्तीफे स्वीकार किए। इसी दिन सरकार ने JPSC से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं की ED जांच की सिफारिश और मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट की दिशा में कदम उठाने की बात भी सामने आई।
सरकार ने कुछ JPSC परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय भी लिया, जबकि JSSC CGL को रद्द करने की मांग स्वीकार नहीं की गई। सरकार की ओर से CGL को अलग आधार पर देखने की बात सामने आई है।
अब सबसे जरूरी बात यह है कि इन घोषणाओं का परिणाम विश्वसनीय और समयबद्ध जांच के रूप में दिखाई दे।
क्योंकि केवल जांच बैठा देना पर्याप्त नहीं है।
लोग जानना चाहते हैं—
- गलती कहां हुई?
- किस स्तर पर हुई?
- किसकी जिम्मेदारी थी?
- किसे अनुचित लाभ मिला?
- परीक्षा एजेंसी का चयन कैसे हुआ?
- निगरानी व्यवस्था क्यों विफल हुई?
- दोषी कौन हैं?
- निर्दोष अभ्यर्थियों का नुकसान कैसे पूरा होगा?
- और सबसे महत्वपूर्ण—भविष्य में यह दोबारा नहीं होगा, इसकी गारंटी क्या है?
भर्ती परीक्षा की पूरी व्यवस्था को बदलने की जरूरत
इस संकट का समाधान केवल दोषियों को गिरफ्तार करने से नहीं होगा।
व्यवस्था में ऐसे बदलाव करने होंगे कि किसी एक व्यक्ति के भ्रष्ट होने से पूरी परीक्षा भ्रष्ट न हो सके।
पहला सुधार—पेपर की सुरक्षा
प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचने तक प्रत्येक चरण का डिजिटल और भौतिक ऑडिट होना चाहिए।
किसने प्रश्नपत्र देखा?
किस समय देखा?
किस सिस्टम से देखा?
कहां प्रिंट हुआ?
किसने पैक किया?
किसने ट्रांसपोर्ट किया?
हर गतिविधि का रिकॉर्ड सुरक्षित होना चाहिए।
दूसरा सुधार—एजेंसी चयन में पारदर्शिता
आउटसोर्सिंग एजेंसी को परीक्षा की जिम्मेदारी देना गलत नहीं है, लेकिन एजेंसी का चयन पारदर्शी होना चाहिए।
उसकी पिछली कार्यप्रणाली, तकनीकी क्षमता, सुरक्षा व्यवस्था और अधिकारियों की जवाबदेही की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
तीसरा सुधार—हितों का टकराव समाप्त हो
प्रश्नपत्र बनाने वाला व्यक्ति यदि स्वयं उसी परीक्षा का अभ्यर्थी है या उसके निकट संबंधी परीक्षा में शामिल हो रहे हैं, तो यह स्पष्ट conflict of interest है।
ऐसी स्थिति को पहले से पहचानने और रोकने की व्यवस्था होनी चाहिए।
चौथा सुधार—शिकायत निवारण की स्वतंत्र व्यवस्था
परीक्षा के बाद छात्रों को केवल आयोग के सामने शिकायत करने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए।
एक स्वतंत्र शिकायत प्रकोष्ठ हो, जहां अभ्यर्थी अपनी शिकायत प्रमाण सहित दर्ज कर सके।
पांचवां सुधार—परीक्षा परिणाम पर पारदर्शिता
उत्तर कुंजी, आपत्ति प्रक्रिया, संशोधित उत्तर कुंजी, कटऑफ और परिणाम प्रक्रिया को यथासंभव पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।
जिस परीक्षा में लाखों युवाओं का भविष्य जुड़ा हो, उसमें “हमने सही किया है” कहना पर्याप्त नहीं है।
व्यवस्था को यह भी दिखाना चाहिए कि उसने सही कैसे किया।
सबसे जरूरी सुधार—समय पर परीक्षा और समय पर नियुक्ति
सरकारी नौकरी की परीक्षा केवल परीक्षा के दिन नहीं होती।
एक भर्ती प्रक्रिया विज्ञापन से शुरू होती है और नियुक्ति पत्र पर समाप्त होती है।
यदि विज्ञापन निकलने में सालों लग जाएं, परीक्षा देर से हो, परिणाम महीनों या वर्षों तक रुका रहे, फिर दस्तावेज सत्यापन में देरी हो और नियुक्ति लंबित रहे, तो युवा की उम्र निकलती जाती है।
इसलिए भर्ती कैलेंडर को कानूनी और प्रशासनिक महत्व दिया जाना चाहिए।
विज्ञापन → परीक्षा → परिणाम → दस्तावेज सत्यापन → नियुक्ति
हर चरण की अधिकतम समयसीमा तय होनी चाहिए।
एक छात्र का खोया हुआ वर्ष वापस नहीं आता
सरकार के लिए परीक्षा स्थगित करना एक प्रशासनिक निर्णय हो सकता है।
आयोग के लिए परीक्षा दोबारा कराना एक प्रक्रिया हो सकती है।
लेकिन छात्र के लिए यह पूरी जिंदगी का सवाल हो सकता है।
उम्र की सीमा निकल सकती है।
परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकती है।
शादी या पारिवारिक जिम्मेदारियां आ सकती हैं।
कोई छात्र नौकरी की तैयारी छोड़कर दूसरा रास्ता चुन सकता है।
इसलिए यदि किसी परीक्षा को दोबारा कराना पड़े तो प्रभावित अभ्यर्थियों के नुकसान का भी आकलन होना चाहिए।
यह सिर्फ प्रश्नपत्र की कीमत नहीं है।
यह समय की कीमत है।
और समय किसी भी युवा की सबसे महंगी पूंजी है।
राजनीति को छात्रों से सीखना चाहिए, छात्रों को राजनीति से सावधान रहना चाहिए
छात्र आंदोलन स्वाभाविक रूप से राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह अलग नहीं रह सकता। रोजगार, शिक्षा और भर्ती व्यवस्था सीधे सरकार से जुड़ी हुई है।
विपक्ष का सरकार से सवाल करना लोकतंत्र का हिस्सा है।
लेकिन छात्रों के दर्द को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना खतरनाक है।
किसी भी राजनीतिक दल को छात्रों की आवाज को अपनी पार्टी का मंच नहीं बना देना चाहिए।
और छात्रों को भी यह समझना होगा कि उनका आंदोलन किसी एक दल की सत्ता-विरोधी मुहिम नहीं है।
आज सरकार कोई और है, कल कोई और होगी।
लेकिन भर्ती व्यवस्था स्थायी होनी चाहिए।
इसलिए छात्र का सवाल सरकार बदलने का नहीं, व्यवस्था सुधारने का होना चाहिए।
भविष्य के लिए झारखंड से क्या सीख मिल सकती है?
झारखंड का वर्तमान संकट पूरे देश के लिए कई सबक छोड़ रहा है।
पहली सीख—भर्ती प्रक्रिया में भरोसा सबसे बड़ी पूंजी है।
एक बार भरोसा टूटने के बाद उसे विज्ञापन या प्रेस विज्ञप्ति से वापस नहीं पाया जा सकता।
दूसरी सीख—हर आरोप को सत्य मानना भी गलत है।
सोशल मीडिया के दौर में अफवाह और तथ्य के बीच अंतर करना जरूरी है।
किसी पर आरोप लगना और अदालत में अपराध सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं।
इसलिए जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने तक कानूनी प्रक्रिया का सम्मान होना चाहिए।
तीसरी सीख—छात्रों की आवाज को समय रहते सुनना चाहिए।
जब शिकायत पहली बार आती है, उसी समय यदि स्वतंत्र और पारदर्शी जांच हो जाए तो आंदोलन शायद इतना बड़ा न हो।
चौथी सीख—प्रशासनिक गलती भी जवाबदेही मांगती है।
हर अनियमितता भ्रष्टाचार नहीं होती।
कई बार गलती लापरवाही, कमजोर प्रबंधन या खराब तकनीकी व्यवस्था के कारण भी हो सकती है।
लेकिन कारण चाहे जो हो, जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
पांचवीं सीख—परीक्षा प्रणाली को तकनीक से ज्यादा संस्थागत ईमानदारी की जरूरत है।
CCTV, बायोमेट्रिक, डिजिटल लॉक, एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र और AI जैसी तकनीकें मदद कर सकती हैं।
लेकिन यदि व्यवस्था के भीतर ही मिलीभगत हो तो तकनीक भी असफल हो सकती है।
इसलिए तकनीक के साथ मानवीय जवाबदेही और स्वतंत्र ऑडिट जरूरी है।
अंततः यह लड़ाई नौकरी से कहीं बड़ी है
झारखंड के छात्रों की लड़ाई को केवल “सरकारी नौकरी मांगने वाले युवाओं का आंदोलन” कहकर छोटा करना ठीक नहीं होगा।
यह सवाल है कि लोकतंत्र में योग्यता का मूल्य क्या है?
क्या एक गरीब परिवार का छात्र भी उतना ही विश्वास रख सकता है कि मेहनत करके वह अधिकारी बन सकता है?
क्या गांव का युवा यह मान सकता है कि बिना किसी पहुंच के भी वह परीक्षा पास कर सकता है?
क्या माता-पिता अपने बच्चों को यह भरोसा दे सकते हैं कि पढ़ाई उनकी जिंदगी बदल सकती है?
इन सवालों का उत्तर केवल सरकार को नहीं देना है।
आयोगों को देना है।
प्रशासन को देना है।
राजनीतिक दलों को देना है।
न्याय व्यवस्था को देना है।
और समाज को भी देना है।
क्योंकि जब एक छात्र किताब लेकर परीक्षा की तैयारी करता है, तब वह केवल अपनी नौकरी के लिए नहीं पढ़ रहा होता। वह व्यवस्था पर अपना विश्वास निवेश कर रहा होता है। उस विश्वास को टूटने से बचाना सरकार की जिम्मेदारी है। और यदि कहीं वह विश्वास टूट गया है तो उसे बहाल करना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।
झारखंड का छात्र आंदोलन इसलिए केवल आज का आंदोलन नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सवाल और एक चेतावनी है—सरकारी नौकरी की परीक्षा में प्रश्नपत्र कठिन हो सकता है, लेकिन व्यवस्था की ईमानदारी पर सवाल नहीं होना चाहिए।
क्योंकि जिस दिन युवा यह मान लेगा कि मेहनत से ज्यादा महत्वपूर्ण व्यवस्था में पहुंच है, उस दिन नुकसान केवल कुछ अभ्यर्थियों का नहीं होगा। नुकसान पूरे समाज का होगा।





