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सांसद-विधायक बागी, 440 करोड़ की रकम भी फंसी… क्या होगा ममता बनर्जी का भविष्य

UB India News by UB India News
July 9, 2026
in पश्चिम बंगाल
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ममता की पार्टी में क्‍यों मची भगदड़?
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ज़ुल्फे बंगाल और हुज्जते बंगाल यह बंगालियों के लिए कहा जाता है. वे कभी किसी से टकराव ले सकते हैं. छोटी-छोटी बात पर ऐंठ जाना उनकी आदत है. फिर भले ही उनको इसका ख़ामियाजा क्यों न भुगतना पड़े. यही हाल अब पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का हो गया है. उनके लिए अब हर तरफ के रास्ते बंद हो चुके हैं. केंद्र से उन्होंने अपने रिश्ते खराब कर लिए हैं और कांग्रेस से उनकी खुन्नस पुरानी है. वाम दलों से भिड़ कर ही वे सरकार में आई थीं और फिर 15साल लगातार सरकार चला ली. किंतु 2026के विधानसभा चुनाव में उन्हें करारी हार ही नहीं मिली बल्कि पार्टी भी टूट गई. उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) का खाता भी सीज हो गया. अब उनके पास न पैसा है न पार्टी न लोग और न कोई खेवनहार. अपनी जिद में उन्होंने अपनी वह दुर्गति करवा ली है कि उनको लेकर कोई सहानुभूति भी नहीं बची है.

उन्होंने सारी खिड़कियां खुद ही लॉक कर लीं

एक अंग्रेजी कहावत है कि कमरे की जब सारी खिड़कियां-दरवाजे बंद हो जाते हैं तब कोई एक खिड़की खुल जाती है. लेकिन ममता बनर्जी ने खुद ही अपने को लॉक कर लिया है. अब कोई खिड़की दरवाजा खुले भी तो कैसे! ममता बनर्जी को बंगाल की शेरनी कहा जाता रहा है और वे शेरनी थीं भी. उन्होंने अपने दम पर पश्चिम बंगाल की 34वर्ष पुरानी लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंका था. उन्होंने लेफ्ट फ्रंट से लड़ाई भी उन्हीं के अंदाज में लड़ी. लेफ्ट फ्रंट ने पश्चिम बंगाल में ऐसे युवाओं की फौज खड़ी की थी, जो दिन भर अड्डेबाजी करते और माकपा के इशारे पर वसूली करते. मगर फिर भी माकपा अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में एक ईमानदार पार्टी थी. उसके राज में किसी को नाहक नहीं फंसाया जाता. कोशिश की जाती कि पैसे वालों के मुनाफे का कुछ हिस्सा आम लोगों को भी मिले.

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अराजक हो चला था ममता का कॉडर

माकपा ने इसके लिए एक अच्छी रणनीति बनाई थी. उद्योग धंधे भले बंद हो गये हों लेकिन यदि आपने किसी भी कर्मचारी को हायर किया हो तो उसके लिए साल में 13महीनों का वेतन अनिवार्य था. एक महीना उसका बोनस माना जाता. यहां तक कि घरेलू नौकरों को भी पूजा पर बोनस के तौर पर एक महीने की अतिरिक्त सेलरी देनी पड़ती. ऐसे ही मस्तानों की टोली TMC ने भी तैयार की. जो उसी तरह लोगों से वसूली करते और ममता बनर्जी के लिए लड़ने और मरने को तैयार रहते. लेकिन ममता की ये फौज अपने पीछे कोई सिद्धांत नहीं रखती थी. लेफ्ट फ्रंट सरकार को हटाना है, तो इसके पीछे कोई तर्क होना चाहिए. राजनीति बिना सिद्धांतों और तर्कों के नहीं चलती. ऐसा होगा तो वह अराजक लोगों की फौज हो जाएगी. या तो आप वाम पंथी हो अथवा दक्षिण पंथी. कुछ नहीं तो मध्य मार्गी तो होना ही चाहिए.

एक अति महत्त्वाकांक्षी नेता की शिकस्त लेकिन ममता की राजनीति का मकसद था सिर्फ लेफ्ट फ्रंट को हटाना. इसके लिए कितने भी धतकरम करने पड़ें, ममता सबके लिए तैयार थीं. उन्हें धीरज भी नहीं था न किसी पर भरोसा. कांग्रेस की छात्र शाखा से अपना राजनैतिक कैरियर शुरू करने वाली ममता तब पॉपुलर हुईं जब उन्होंने जय प्रकाश नारायण के विरोध में उनकी कार के आगे हुड़दंग किया था. 1976 से 1980 तक वे पश्चिम बंगाल महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं. चार साल बाद 1984के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें जादवपुर सीट से टिकट दिया और वे माकपा के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हरा कर संसद पहुंचीं. इसी वर्ष वे अखिल भारतीय यूथ कांग्रेस की महासचिव भी बनीं. लेकिन 1989के लोकसभा चुनाव में माकपा की मालिनी भट्टाचार्य ने उन्हें जादवपुर सीट से हरा दिया.

ममता मीडिया में छायीं

1991के चुनाव में वे कोलकाता दक्षिण सीट से जीत कर लोकसभा में पहुंचीं. इसके बाद उन्होंने कोलकाता दक्षिण सीट को अपना गढ़ बना लिया और पांच बार लगातार वे इसी सीट से सांसद चुनी जाती रहीं. जबकि, इसी बीच 1997में पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सोमेन मित्र से उनकी भिड़ंत हो गई और उन्होंने कांग्रेस छोड़ कर अपनी नई पार्टी अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) बना ली. उनके शुरुआती साथी मुकुल रॉय थे. ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल सरकार से एक विकलांग लड़की को ले कर इस तरह भिड़ गईं कि उन्हें राष्ट्रीय मीडिया में खूब कवरेज मिली. इसी तरह 11 दिसंबर 1998को उन्होंने लोकसभा के भीतर समाजवादी पार्टी के सांसद दरोगा प्रसाद राय का कॉलर पकड़ कर वेल से घसीट कर बाहर कर दिया. दरोगा प्रसाद महिला आरक्षण के विरोध में शोर कर रहे थे.

2011की अभूतपूर्व सफलता

ममता की ये दबंग छवि उन्हें लगातार मजबूत करती गई. वे अपनी सुविधा से कभी बीजेपी की अगुआई वाली NDA या कांग्रेस की अगुआई वाली UPA से समझौते करती रहीं. फौरी तौर पर उन्हें इन समझौतों का लाभ मिला. वे केंद्र में खुद मंत्री रहीं और अपने समर्थकों को भी बनवाती रहीं. लेकिन धीरे-धीरे वे इन दोनों राष्ट्रीय दलों का भरोसा भी खोती रहीं. उनकी सबसे बड़ी सफलता थी 2011में लेफ्ट फ्रंट की बुद्धदेब भट्टाचार्य की सरकार को पराजित कर देना. वे भारी बहुमत से विधानसभा चुनाव जीतीं और मुख्यमंत्री बनीं. ये उनकी सफलता भी थी और नाकामी भी. सत्ता में आते ही उनके समर्थकों ने राज्य में लूट-पाट शुरू कर दी. क्योंकि उनके साथ उस वर्ग की संख्या ज्यादा थी जिसको बिना कुछ कम किए खाने की आदत पड़ गई थी. वाम मोर्चा फिर भी एक अनुशासन रखे थी लेकिन ममता अपने कॉडर पर अंकुश नहीं लगा सकीं.

हार के बाद बिखर गई पार्टी

भ्रष्टाचार, अराजकता, स्त्री सुरक्षा, यौन दुराचार के इतने किस्से आए कि ममता बनर्जी धड़ाम से नीचे आ गईं. 2026के चुनाव में उन्हें सिर्फ 80 सीटें मिलीं. जबकि बीजेपी ने 208 सीटें जीत कर सरकार बना ली. पर ममता बनर्जी के नखरे ऐसे कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र तक नहीं दिया. अंत में राज्यपाल ने शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. तब उन्हें गद्दी से हटना पड़ा. इसके बाद उनकी पार्टी में भगदड़ शुरू हुई. बताया जाता है कि उनकी पार्टी के लगभग 60विधायक TMC छोड़ चुके हैं. ममता के पास आज की तारीख में मात्र 15 विधायक हैं. पांच अभी चुप साधे हैं. इसी तरह से संसद में 22TMC सांसदों की संख्या भी तेजी से कम हो रही है. करीब 20सांसद आज ममता के साथ नहीं हैं.

न खाता बचा न बही!

आठ जुलाई को ममता ने कोलकाता में शक्ति परीक्षण किया. पर यहां भी वे अपना आपा खो बैठीं और अपने एक समर्थक पर थप्पड़ जड़ दिया. उसका वीडियो खूब वायरल हो रहा है. उधर ED ने ममता बनर्जी की TMC के खाते फ्रीज कर दिये हैं. इस तरह कोई 440करोड़ की रक़म फंस गई है. उधर चुनाव आयोग के पास ममता बनर्जी की पार्टी का चुनाव चिन्ह और मान्यता भी खतरे में है. हालांकि ममता बनर्जी गुट ने अपनी सफाई का पत्र दाखिल कर दिया है. लेकिन जो हालात बनते जा रहे हैं उनमें ममता बनर्जी कमजोर नजर आ रही हैं और इसकी बड़ी वजह है ममता की हुज्जत, अपने गुस्से पर काबू न पाते हुए उन्होंने हर पार्टी को नाराज तो कर ही लिया है. उनकी अपनी ही पार्टी के बड़े नेता उनके व्यवहार से दुखी हैं. ऐसे में ममता का भविष्य क्या होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता.

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