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रूस में अचानक पेट्रोल और डीजल की इतनी भारी किल्लत क्यों हो गई है?

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July 5, 2026
in अन्तर्राष्ट्रीय, कारोबार, खास खबर
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रूस में अचानक पेट्रोल और डीजल की इतनी भारी किल्लत क्यों हो गई है?

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एक ऐसा देश जो दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उत्पादकों में गिना जाता है, आज वह अपने ही पेट्रोल पंपों पर वाहनों की लंबी कतारें देख रहा है। यह हैरान करने वाली तस्वीर रूस की है, जहां यूक्रेन के लगातार ड्रोन हमलों ने देश के भीतर एक बड़ा और अभूतपूर्व ईंधन संकट खड़ा कर दिया है। लेकिन इस संकट के बीच जो सबसे चौंकाने वाली खबर सामने आई है, वह भारत से जुड़ी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत की दूसरी सबसे बड़ी निजी तेल रिफाइनरी, ‘नायरा एनर्जी’, अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों (ट्रेडर्स) के जरिए रूस को पेट्रोल की आपूर्ति कर रही है।

रॉयटर्स ने अपनी एक रिपोर्ट में औद्योगिक सूत्रों के हवाले से बताया है कि नायरा एनर्जी के गुजरात स्थित वाडिनार रिफाइनरी से उत्पादित पेट्रोल को दो विशाल तेल टैंकरों के माध्यम से रूस भेजा गया है। भारत के केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी पत्रकारों के सवालों का जवाब देने के दौरान कहा कि भारतीय कंपनियां सीधे तौर पर रूस को तेल नहीं बेच रही हैं, लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि रूस ने अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के जरिए भारतीय मूल का ईंधन खरीदा हो। यह घटनाक्रम वैश्विक भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

आइए इस पूरे संकट और इसके पीछे के आर्थिक समीकरणों को आसान भाषा में समझते हैं।

रूस में अचानक पेट्रोल और डीजल की इतनी भारी किल्लत क्यों हो गई है?

इस पूरे संकट की जड़ें युद्ध के मैदान से जुड़ी हैं। पिछले कुछ महीनों में, यूक्रेनी सैन्य बलों ने रूसी क्षेत्र के भीतर स्थित तेल के बुनियादी ढांचे को अपना प्रमुख निशाना बनाया है। एसोसिएटेड प्रेस (एपी) के एक आंकड़े के अनुसार, इस साल मार्च महीने से लेकर अब तक यूक्रेन ने रूसी तेल रिफाइनरियों, तेल डिपो, टर्मिनलों और अन्य ऊर्जा बुनियादी ढांचों पर 50 से अधिक हवाई हमले किए हैं। ये हमले केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इनमें से कुछ हमले रूसी नियंत्रण वाले क्रीमिया प्रायद्वीप में भी दर्ज किए गए हैं, जिसे रूस ने 2014 में अवैध रूप से अपने कब्जे में ले लिया था।

इन ड्रोन हमलों की मार इतनी सटीक और विनाशकारी रही है कि कुछ रिफाइनरियों को एक से अधिक बार निशाना बनाया गया है। उदाहरण के लिए, काला सागर (ब्लैक सी) के तट पर स्थित टुआप्स  शहर की तेल रिफाइनरी पर यूक्रेन ने चार अलग-अलग हमलों में भारी तबाही मचाई है। इन हमलों के कारण रूस के कई बड़े रिफाइनिंग प्लांट जलकर खाक हो गए, जिससे देश की घरेलू रिफाइनिंग क्षमता काफी घट गई है।

इसके असर से, रूस के विभिन्न राज्यों और यहां तक कि राजधानी मॉस्को में भी पेट्रोल पंपों के बाहर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। कई क्षेत्रों में तो ईंधन की राशनिंग (सीमित मात्रा में बिक्री) तक लागू करनी पड़ी है। रूस जैसे विशाल तेल निर्यातक देश के लिए घरेलू स्तर पर ईंधन की यह राशनिंग एक ऐतिहासिक और अप्रत्याशित संकट है।

जहां एक तरफ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सरकारी मंत्रियों और अधिकारियों के साथ एक बैठक में यह स्वीकार किया है कि यूक्रेनी हमलों के कारण कुछ क्षेत्रों में ईंधन की कमी हुई है, लेकिन उन्होंने इसे गैर-महत्वपूर्ण और अस्थायी करार दिया। वहीं दूसरी ओर, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने अपने टेलीग्राम चैनल पर कटाक्ष करते हुए कहा कि पुतिन टीवी पर भले ही दावा करते रहें कि सब कुछ नियंत्रण में है, लेकिन रूसी नागरिक खुद देख रहे हैं कि युद्ध अब उस स्तर पर पहुंच गया है जहां खुद को गैस स्टेशन कहने वाला एक तेल उत्पादक देश आज खुद गैस (पेट्रोल) की भारी किल्लत का सामना कर रहा है।

भारतीय रिफाइनरी ‘नायरा एनर्जी’ का रूस से क्या और कितना पुराना कनेक्शन है?

नायरा एनर्जी कोई साधारण भारतीय कंपनी नहीं है, बल्कि इसके पीछे रूस का बहुत बड़ा स्वामित्व और नियंत्रण तंत्र काम करता है। यह कंपनी भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात के वाडिनार में देश की दूसरी सबसे बड़ी निजी तेल रिफाइनरी का संचालन करती है। इस रिफाइनरी की क्षमता हर दिन लगभग चार लाख (400,000) बैरल कच्चे तेल को रिफाइन करने की है।

इस रिफाइनरी का इतिहास काफी दिलचस्प है। साल 2015 में जब भारत की कंपनी ‘एस्सार’ भारी वित्तीय संकट और कर्ज के दबाव से जूझ रही थी, तब इस रिफाइनरी को खरीदने की बात शुरू हुई। यह कोई सामान्य व्यावसायिक सौदा नहीं था, बल्कि यह एक जटिल अर्ध-सरकारी और अर्ध-निजी समझौता था, जिसे खुद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मंजूरी और सहमति से अंतिम रूप दिया गया था।

उस समय, राष्ट्रपति पुतिन रूस की विशाल सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी ‘रोजनेफ्ट’ में रूसी सरकार की हिस्सेदारी को बेचना चाह रहे थे। इस प्रक्रिया के तहत, भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने रोजनेफ्ट में हिस्सेदारी खरीदी। इसके बदले में, रूसी कंपनी रोजनेफ्ट ने एस्सार की रिफाइनरी (जो अब नायरा एनर्जी है) में 49 प्रतिशत की हिस्सेदारी खरीद ली। नायरा एनर्जी की बची हुई हिस्सेदारी में से एक और बड़ा हिस्सा यानी 49 प्रतिशत शेयर रूस की ही एक अन्य एसेट मैनेजमेंट कंपनी ‘यूनाइटेड कैपिटल पार्टनर्स’ के पास है।

इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि कागजों पर भारतीय होने और इन इंडिया एंड फॉर इंडिया (भारत में और भारत के लिए) का नारा देने के बावजूद, नायरा एनर्जी का व्यावहारिक और मालिकाना नियंत्रण पूरी तरह से रूसी संस्थाओं के हाथों में है। यही कारण है कि यह रिफाइनरी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ गहरे व्यापारिक संबंधों को बनाए हुए है।

क्या भारत वास्तव में रूस को पेट्रोल निर्यात कर रहा है?

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत से कम से कम 60,000 मीट्रिक टन पेट्रोल रूस भेजा जा चुका है। इस बड़े तेल सौदे को अंजाम देने के लिए दो विशेष तेल टैंकरों का उपयोग किया गया, जिनमें से प्रत्येक टैंकर की क्षमता 30,000 से 40,000 टन पेट्रोल ले जाने की थी।

रॉयटर्स के अनुसार सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि इस पेट्रोल का उत्पादन नायरा एनर्जी की गुजरात स्थित रिफाइनरी में किया गया था और इसे सीधे रूस को बेचने के बजाय अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों (मिडलमैन या ट्रेडर्स) के माध्यम से घुमाकर रूस तक पहुंचाया गया। इस घुमावदार रास्ते का इस्तेमाल इसलिए किया गया ताकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचा जा सके और इस सौदे पर कोई कानूनी आंच न आए।

हालांकि नायरा एनर्जी ने आधिकारिक तौर पर इस सौदे की पुष्टि नहीं की है। उधर पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने गुरुवार को कहा कि भले ही भारतीय रिफाइनरियां सीधे रूस को ईंधन नहीं बेच रही हैं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों ने भारतीय रिफाइनरियों से पेट्रोल खरीदकर उसे रूस की ओर डायवर्ट कर दिया हो।

समुद्री जहाजों के जीपीएस और ट्रैकिंग डेटा से क्या पता चलता है?

रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने वाले शिप-ट्रैकिंग डेटा इस कथित निर्यात की पूरी कहानी बताते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लंदन स्टॉक एक्सचेंज ग्रुप (एलएसईजी) और केपलर के ट्रैकिंग डेटा से पता चला है कि जून के महीने में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात अब तक के सबसे उच्चतम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। इस भारी आयात के पीछे एक बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूसी तेल पर से अमेरिकी प्रतिबंधों में दी गई ढील भी थी। दरअसल, ईरान के साथ युद्ध के कारण जब होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो गया और दुनिया भर में ईंधन की भारी कमी का खतरा मंडराने लगा, तो ट्रंप ने जहाजों पर पहले से लदे रूसी तेल को कुछ समय के लिए प्रतिबंधों से छूट दे दी थी।

लेकिन असली कहानी रिफाइंड पेट्रोल के निर्यात की है। रॉयटर्स द्वारा देखे गए एक शिपमेंट चालान के अनुसार, 20 जून को कैमरून का झंडा लगा एक समुद्री जहाज ‘अग्नि’ गुजरात के वाडिनार बंदरगाह से पेट्रोल लादकर संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह बंदरगाह के लिए रवाना हुआ था।

लेकिन जब एलएसईजी के वास्तविक समय के टैंकर ट्रैकिंग डेटा की जांच की गई, तो पता चला कि यह जहाज फुजैराह रुका ही नहीं। ‘अग्नि’ नामक यह जहाज फुजैराह को पीछे छोड़ते हुए स्वेज नहर (को पार कर चुका था और उत्तर दिशा की ओर बढ़ रहा था। उत्तर दिशा का यह समुद्री मार्ग सीधे तौर पर यूरोप और रूस के ब्लैक सी या बाल्टिक सी बंदरगाहों की ओर जाता है। शिप-ट्रैकिंग का यह डेटा साफ साबित करता है कि कागजों पर फुजैराह जाने वाला भारतीय पेट्रोल वास्तव में स्वेज नहर के रास्ते यूरोप या रूस की ओर भेजा जा रहा था।

यूरोपीय संघ (ईयू) के प्रतिबंधों का नायरा एनर्जी के कारोबार पर क्या असर पड़ा है?

नायरा एनर्जी को रूस से अपने करीबी संबंधों के कारण भारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। पिछले साल जुलाई में, यूरोपीय संघ ने नायरा एनर्जी पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। इन प्रतिबंधों के तहत यूरोपीय संघ ने रूसी कच्चे तेल से प्रसंस्कृत किए गए पेट्रोलियम उत्पादों के अपने देशों में आयात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। इसके साथ ही, नायरा एनर्जी की यूरोपीय संघ के जहाजरानी बीमा, वित्तीय सेवाओं और अन्य बैंकिंग सुविधाओं तक पहुंच को भी पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया था।

यह प्रतिबंध यूरोपीय संघ के उस बड़े प्रतिबंध पैकेज का हिस्सा थे जो रूस द्वारा 2022 में यूक्रेन पर किए गए आक्रमण के बाद रूसी तेल राजस्व को चोट पहुंचाने के लिए तैयार किए गए थे। यूरोपीय संघ ने अपने 18वें प्रतिबंध पैकेज के तहत रूसी कच्चे तेल से बने किसी भी पेट्रोलियम उत्पाद के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था।

इस प्रतिबंध ने भारतीय तेल निर्यातकों को बहुत बड़ा झटका दिया, क्योंकि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से यूरोप भारतीय रिफाइंड तेल के लिए सबसे बड़ा और सबसे आकर्षक बाजार बन गया था। नायरा की मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब प्रतिबंधों के डर से अन्य वैश्विक कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं ने नायरा की वाडिनार रिफाइनरी को तेल देना बंद कर दिया। इसके बाद, नायरा के पास केवल रूस से कच्चे तेल का आयात करने का ही विकल्प बचा। अब चूंकि नायरा केवल रूसी कच्चे तेल को ही रिफाइन कर रही है, इसलिए वह अपने रिफाइंड तेल को सीधे यूरोपीय बाजारों में नहीं बेच सकती। यही वजह है कि कंपनी को अब कच्चे तेल के आयात और रिफाइंड ईंधन के निर्यात दोनों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मध्यस्थ व्यापारियों के नेटवर्क पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ रहा है।

संकट के समय भारत ने कैसे यूरोपीय देशों की भी की थी मदद?

जब यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों ने वैश्विक तेल आपूर्ति शृंखला को पूरी तरह से बदल दिया था तब भारत ने उन्हीं पश्चिमी देशों की भी मदद की थी। भारत, जो युद्ध से पहले अपनी कुल खपत का 1% से भी कम रूसी तेल आयात करता था, ने भारी छूट का लाभ उठाते हुए इसका आयात रिकॉर्ड 2.5 मिलियन बैरल प्रति दिन से भी अधिक कर दिया। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस (जामनगर) और नायरा एनर्जी (वाडिनार) जैसी अत्याधुनिक भारतीय रिफाइनरियों ने इस सस्ते रूसी कच्चे तेल को संसाधित कर डीजल और जेट ईंधन जैसे तैयार उत्पादों में परिवर्तित किया।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों में मौजूद कानूनी छूट के कारण9 जिसके तहत तीसरे देश में परिष्कृत होने पर कच्चे तेल का मूल देश बदल जाता है। भारत ने इन पेट्रोलियम ईंधनों को वापस उन्हीं यूरोपीय देशों ने भारी मात्रा में खरीदा, जिन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे। इस कथित ‘लॉन्ड्रोमैट’ प्रक्रिया ने एक तरफ जहां यूरोपीय विमानन क्षेत्र और वहां की अर्थव्यवस्था को ऊर्जा अभाव से बचाया था, वहीं इसने भारत को यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा परिष्कृत ईंधन निर्यातक बना दिया था।

इस पूरे ईंधन संकट और कूटनीति का क्या निष्कर्ष निकलता है?

यह पूरा घटनाक्रम वैश्विक तेल राजनीति के उस दोहरे मापदंड और जटिलताओं को उजागर करता है, जहां युद्ध और प्रतिबंधों के बीच भी व्यापार के रास्ते खोज लिए जाते हैं। रूस, जो खुद दुनिया का एक बड़ा तेल और प्राकृतिक गैस का महाशक्तिशाली केंद्र है, आज यूक्रेन के ड्रोन हमलों के सामने अपने घरेलू बुनियादी ढांचे को बचाने में संघर्ष कर रहा है। घरेलू स्तर पर राशनिंग लागू होने और पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लगने से राष्ट्रपति पुतिन की उस छवि को झटका लगा है जिसमें वह दावा करते हैं कि सब कुछ उनके नियंत्रण में है।

वहीं दूसरी ओर, नायरा एनर्जी का मामला दिखाता है कि कैसे वैश्विक तेल व्यापार की कड़ियां आपस में जुड़ी हुई हैं। एक ऐसी कंपनी जिस पर रूसी कंपनियों का नियंत्रण है, जो भारत की धरती पर काम करती है, रूस से ही सस्ता कच्चा तेल खरीदती है, और फिर उसे रिफाइन करके वापस रूस की घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पेट्रोल के रूप में अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के जरिए भेज देती है। यह सौदा भारत के लिए भी एक कूटनीतिक संतुलन बनाने की परीक्षा है, क्योंकि भारत सरकार हमेशा से यह कहती आई है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए जहां से भी संभव होगा, वहां से तेल खरीदेगी। लेकिन जब एक भारतीय रिफाइनरी से सीधे रूस को पेट्रोल निर्यात करने की खबरें आती है तो यह कूटनीतिक रूप से वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है।

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