चुनावी राजनीति में शानदार आगाज से विजय ने तमिलनाडु की सियासत में लंबे समय से दबदबा रखने वाले द्रमुक और अन्नाद्रमुक को बहुत पीछे छोड़ दिया है। अपने पहले ही चुनाव में उन्होंने राज्य के राजनीतिक समीकरण को हिलाकर रख दिया है। विजय की पार्टी टीवीके ने 100 सीटों का आंकड़ा तो पार कर लिया, मगर 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 118 सीटें हासिल करने से चूक गई। सरकार बनाने के लिए टीवीके को कम से कम 10 सीटों की दरकार होगी। ऐसे में सवाल है कि सरकार बनाने के लिए विजय के पास क्या विकल्प हैं।
राहुल गांधी ने आगे लिखा, ”तमिलनाडु और पुदुचेरी के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उनकी कड़ी मेहनत और समर्थन के लिए मेरा तहे दिल से धन्यवाद। मैं फिर दोहराता हूं कि कांग्रेस पार्टी तमिलनाडु और पुदुचेरी के लोगों की रक्षा और सेवा करना जारी रखेगी।”
विजय ने किसी दूसरे दल से गठबंधन किए बिना ही चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। विजय को जानने वाले उम्मीद जता रहे हैं कि वह अपने राजनीतिक सफर में अकेले ही आगे बढ़ेंगे। हालांकि, शानदार प्रदर्शन के बावजूद विजय अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें किसी न किसी दल से हाथ मिलाना ही होगा। सवाल उठता है कि क्या वह कांग्रेस से समर्थन मांग सकते हैं। क्या कांग्रेस समर्थन कर सकती है, जो गठबंधन की प्रतिबद्धताओं से बंधी हुई है।
करुर भगदड़ से घिरे, पर जनता साथ रही
पिछले वर्ष 27 सितंबर को करूर में हुई रैली में हुई भगदड़ में कम से कम 41 लोगों की जान चली गई थी। तब विरोधियों ने कहा कि विजय की सियासी पारी का खात्मा हो गया। पर, जनता ने विजय का साथ नहीं छोड़ा।
क्या अन्नाद्रमुक देगी समर्थन
चुनाव से पहले विजय की पार्टी और अन्नाद्रमुक के बीच गठबंधन को लेकर चर्चा तेजी से चली थी, लेकिन सीटों के बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाने से दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। अब जब अन्नाद्रमुक तीसरे स्थान पर पहुंच गई है, तो वह अपने चिरप्रतिद्वंद्वी द्रमुक को सत्ता से दूर रखने के लिए विजय को समर्थन दे सकती है। विजय को भी अन्नाद्रमुक से समर्थन लेने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए, क्योंकि दोनों के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन की संभावनाएं भी थीं। यह अन्नाद्रमुक के लिए भी अच्छा साबित हो सकता है, जो 2016 में अम्मा यानी जयललिता के निधन के बाद से अस्थिरता के दौर से गुजर रही है।