यह क्रिकेट का धनतेरस है। भले ही तेरस या त्रयोदश 13 को कहा जाता है और आज से शुरू हो रहा आईपीएल का नया सीजन 65 दिन का होगा, लेकिन इसका हर दिन धनतेरस जैसा ही माना जाएगा। धन बरसने की शुरुआत हो भी चुकी है। पिछले दिनों राजस्थान रॉयल्स और आरसीबी की टीमें जितनी बड़ी रकम में बिकी हैं, कहां कोई सोच सकता था? 2008 में राजस्थान रॉयल्स को 67 मिलियन डॉलर, यानी उस समय के हिसाब से करीब 268 करोड़ रुपये में खरीदा गया था। अब यही टीम 1.63 बिलियन डॉलर, यानी 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा में बिकी है। रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु तो 16,000 करोड़ से भी ज्यादा में बिकी है। दिल्ली कैपिटल्स टीम के सह-मालिक पार्थ जिंदल तो यह भी मानते हैं कि अगले दशक में आईपीएल की सभी टीमों की कीमत चार से पांच अरब डॉलर हो सकती है।
निस्संदेह, क्रिकेट हमेशा से देश की भावनाओं का हिस्सा रहा है, लेकिन आईपीएल ने इसे एक अलग ही स्तर तक पहुंचा दिया है। ललित मोदी ने एक बार राजधानी के एक पांच सितारा होटल में अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि 90 के दशक में उनके दिमाग में दो खेलों की लीग के विचार थे- एक, क्रिकेट और दूसरा, कबड्डी। क्रिकेट लीग पर बात चलती रही। बाद में इसे आनन-फानन में लाया तब गया, जब विद्रोही लीग शुरू हुई, जिसका नाम था आईसीएल। आज की तारीख में ललित मोदी तमाम आरोपों से घिरे देश से बाहर बैठे हैं, पर यह लीग इतना बड़ा रूप ले लेगी, इसका एहसास उन दिनों शायद उनको भी नहीं था।
क्रिकेट ने साल-दर-साल इस देश में अपना राज स्थापित किया है। चंद रोज पहले ही रिपोर्ट आई है कि भारतीय खेल की अर्थव्यवस्था 2025 में दो अरब डॉलर, यानी 16,700 करोड़ रुपये को पार कर गई है। इसमें क्रिकेट का हिस्सा 89 फीसदी है, जो एक साल पहले, यानी 2024 में 85 फीसदी था। हालांकि, इन आंकड़ों से कहीं अलग असर आईपीएल का है। फ्रेंचाइजी, ब्रॉडकास्टर, कंपनियां, टिकट बिक्री से आए पैसे… ये सब एक तरफ हैं, लेकिन एक वर्ग और है, जो खेलों को कामयाब बनाने में अहम होता है। ऐसे खिलाड़ी सहायक भूमिका में टीम में आकर स्टार हो जाते हैं। आईपीएल ने हर साल ऐसे खिलाड़ियों का जश्न मनाया है- चाहे वह टी नटराजन हों, मोहम्मद सिराज हों, रिंकू सिंह हों, यशस्वी जायसवाल हों। यह सूची अंतहीन है। क्रिकेट में छोटे शहरों से खिलाड़ियों का आना तो बहुत पहले शुरू हो चुका था, लेकिन आईपीएल ने उन्हें जिस तरह की जमीन दी है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। कमजोर घर से आकर इतनी जल्दी स्टार बनना डराता भी है। जल्दी धन-दौलत मिलना कई बार जमीन से पांव हटा देता है। हालांकि, ऐसे मामले चंद ही हैं।
जीवन-स्तर सुधारने की बात उन लोगों तक भी है, जो बेनाम हैं। इनको सिर्फ ग्राउंड स्टाफ के नाम से जाना जाता है। गर्मियों में वे स्थानीय लीग के लिए काम करते थे, लेकिन उसमें पैसा न के बराबर था। अब 65 दिन के टूर्नामेंट का मतलब है, कम-से-कम चार महीने का काम। इसमें स्कोरर, क्यूरेटर, ग्राउंड स्टाफ, कैटरिंग, ड्राइवर, टीवी क्रू… और न जाने कितने सारे लोग हैं, जो फटाफट क्रिकेट की अर्थव्यवस्था से जुड़कर अपना घर चला रहे हैं। हालांकि, कुछ गड़बड़ियां भी हैं। जैसे- भ्रष्टाचार के मामले और कई आरोप, लेकिन यह हमें समझना पड़ेगा कि जहां इतना धन होगा, वहां कुछ मामले तो आएंगे ही। बड़ी तस्वीर यही है कि आईपीएल ने हमारे देश में खेल की, खिलाड़ियों के जीवन-स्तर की तस्वीर बदली है। इसने क्रिकेट को सिर्फ बदला नहीं, बल्कि उसे एक नए युग में पहुंचा दिया है।
यह कहा जाता रहा है कि आईपीएल ने टेस्ट क्रिकेट के स्तर को गिरा दिया। यह सही है कि तकनीकी तौर पर दक्षता कुछ कम हुई है। जरा सी खराब पिच पर बल्लेबाज ढेर हो जाते हैं, पर टेस्ट क्रिकेट में नतीजे बढ़े हैं। नतीजे बढ़ने से खेल ज्यादा रोमांचक होता है। यानी, टेस्ट क्रिकेट को कम-से-कम आईपीएल से खतरा नहीं है। कुल मिलाकर, यह लीग अब एक उद्योग, एक उत्सव और एक ग्लोबल ब्रांड बन चुकी है। अब हर दिन धनतेरस है और प्रशंसकों के लिए दीपावली।







