नीतीश कुमार 20 साल बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ रहे हैं। यह 10वीं बार सीएम पद की शपथ लेने के करीब 100 दिन बाद हो रहा है। क्या तेजस्वी के कमजोर होने से नीतीश कुमार को मजबूर होना पड़ा।
सियासी गलियारे में चर्चा है कि JDU के कुछ नेता उनको सीएम बनाए रखने के पक्ष में हैं, लेकिन भाजपा के दबाव के कारण नीतीश को पद छोड़ना पड़ रहा है।
4 पॉइंट में भाजपा नीतीश पर दबाव बनाने में क्यों कामयाब हुई
18वीं विधानसभा में भाजपा 101 सीटों पर चुनाव लड़कर 89 सीटें जीती है। वह विधानसभा में नंबर-1 पार्टी बन गई है। भाजपा बिना नीतीश कुमार के भी जोड़-तोड़कर सरकार बना सकती है।
- भाजपा के ट्रस्टी पार्टनर चिराग पासवान की पार्टी LJP(R) 19, जीतन राम मांझी की पार्टी HAM 5 और उपेंद्र कुशवाहा के RLM को 4 सीटों पर जीत मिली है।
- चारों पार्टियों भाजपा, चिराग, मांझी और कुशवाहा के विधायकों को जोड़ दें तो (89+19+5+4) आंकड़ा 117 तक पहुंचता है। बहुमत 122 से सिर्फ 5 कम।
- पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार बताते हैं, ‘भाजपा के लिए 5 विधायकों का जुगाड़ करना बहुत आसान है। कांग्रेस के 6 विधायक हैं, उसमें से टूटने के लिए 4 की जरूरत है। इसके अलावा BSP का एक और IIP का एक विधायक है। इनको तोड़ा जा सकता है।’
पॉइंट-2ः तेजस्वी के खराब प्रदर्शन ने नीतीश कुमार को किया कमजोर
85 सीट जीतने के बाद भी नीतीश कुमार उतने मजबूत नहीं हैं, जितने 2005, 2010, 2015 और 2020 में थे। दरअसल, नीतीश कुमार की मजबूती RJD और कांग्रेस के प्रदर्शन से तय होती है।
- अबकी बार नीतीश कुमार की पार्टी JDU 101 सीटों पर चुनाव लड़कर 85 सीटें जीती है। अगर वह भाजपा से नाता तोड़ेंगे तो उनको सरकार बनाने के लिए 37 विधायकों की जरूरत है। इसके लिए उनको तेजस्वी यादव की RJD, कांग्रेस, ओवैसी की AIMIM और लेफ्ट से हाथ मिलाना होगा।
- RJD के पास 25, कांग्रेस के पास 6, AIMIM के पास 5, लेफ्ट के पास 3 और BSP-IIP के पास 1-1 विधायक हैं। सबको जोड़ने पर 41 होता है। और इसमें JDU के 85 विधायकों को जोड़ने पर (85+41) 126 होगा। मतलब बहुमत से सिर्फ 4 अधिक।
- पॉलिटिकल एनालिस्ट प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘कांग्रेस और BSP-IIP के विधायकों को नीतीश कुमार की तुलना में भाजपा आसानी से तोड़ सकती है। ये विधायक अपने आगे के भविष्य को देखकर टूटेंगे। नीतीश कुमार की बढ़ती उम्र से उनके साथ जाने में इनको ज्यादा फायदा नहीं होगा।’
- प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, ‘उम्र के इस पड़ाव पर नीतीश कुमार भाजपा को नाराज करने की स्थिति में नहीं होंगे। अब अगर वह टूटे तो भाजपा तोड़ने का पूरा प्रयास करेगी। तेजस्वी के खराब प्रदर्शन ने नीतीश कुमार को 85 सीट लाने के बावजूद कमजोर कर दिया है। अगर तेजस्वी 35+ सीटें तक रहते तो आज हालात दूसरे होते।’

पॉइंट-3ः अगर नीतीश साथ छोड़ते हैं तो मोदी सरकार पर फर्क नहीं
केंद्र की मोदी सरकार के पास 292 सीटें हैं, जिसमें जदयू के पास 12 सीटें हैं। अगर जदयू, इंडी के साथ जाती है, तो NDA के पास 280 सीटें रहेंगी। यानी बहुमत से 8 सीटें ज्यादा। NDA की सरकार बन जाएगी।
292-12= 280 (NDA बहुमत से 8 ज्यादा)
पॉइंट-4ः नीतीश कुमार की बढ़ती उम्र का फायदा उठाएगी भाजपा
नीतीश कुमार 75 साल के हैं। अगला विधानसभा चुनाव 2030 में होगा। उस वक्त उनकी उम्र 79-80 हो जाएगी। अभी ही नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर तरह-तरह के दावे किए जाते हैं। ऐसी स्थिति में अब भाजपा अपना लीडर बिहार में तैयार करेगी।
- पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘नीतीश कुमार की बढ़ती उम्र और बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण भाजपा को उनके सक्रिय रहते ही उनका विकल्प तैयार कर लेना होगा। पार्टी अब एक ऐसा चेहरा लाना चाहेगी, जिसके भरोसे अगले 15-20 साल तक चुनाव लड़ा जा सके।’
- अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘अब अगर भाजपा अपना चेहरा नहीं तय करेगी तो फिर 5 साल बाद नेतृत्व विहीनता की स्थिति में रहेगी। नीतीश कुमार के काम को आगे बढ़ाने के लिए नए चेहरे की आवश्यकता।’
नीतीश कुमार ने गुरुवार को X पर पोस्ट कर राज्यसभा जाने का ऐलान किया है। उन्होंने बिहार में नई सरकार को अपना पूरा सहयोग करने की भी बात कही है। अब यह भी तय हो गया कि बिहार में अब नीतीश युग का अंत हो गया। साथ ही अब इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि नीतीश कुमार के बाद बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा…?
क्या पहली बार बिहार में बीजेपी का CM बनेगा? क्या नीतीश के किसी करीबी को CM बनाया जाएगा। क्या 4 दशक बाद बिहार को सवर्ण CM मिल सकता है..?
बिहार में CM की रेस में सबसे आगे सम्राट चौधरी का नाम चल रहा है। विजय चौधरी भी चर्चा में हैं। इधर, BJP EBC या OBC चेहरा लाकर चौंका सकती है।







