विधायकों द्वारा हलफनामे में अपनी संपत्ति और आपराधिक मुकदमों की जानकारी छुपाने के आरोप में दायर याचिका पर पटना हाईकोर्ट के नोटिस का मामला आज बिहार विधानसभा में जोर-शोर से उठा. सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने इस मुद्दे पर अपनी-अपनी बात रखी, लेकिन एक बात पर सबकी सहमति दिखी कि यह पूरी तरह न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का मामला है.
दिलचस्प बात यह रही कि इस मामले में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों का सुर लगभग एक जैसा दिखा. दोनों ही पक्षों के नेताओं ने कहा कि यह पूरी तरह न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का मामला है और इस पर कोई राजनीतिक टिप्पणी करना ठीक नहीं होगा. उनका कहना था कि जिन विधायकों को नोटिस मिला है, उन्हें अदालत में अपना जवाब देना चाहिए और जो भी फैसला आएगा, वह सबको मान्य होगा.
लोजपा रामविलास का बयान
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के विधायक राजू तिवारी ने साफ कहा कि यह अदालत का मामला है. उन्होंने कहा, “जिस विधायक को नोटिस मिला है, वह खुद अदालत में जवाब देंगे. इस पर सदन में ज्यादा कुछ कहना ठीक नहीं है.” उन्होंने दोहराया कि न्यायालय जो भी निर्णय लेगा, वही अंतिम होगा.
आरजेडी ने उठाया चुनावी धांधली का मुद्दा
वहीं राष्ट्रीय जनता दल के विधायक रणविजय साहूने कहा कि मामला अदालत तक पहुंच चुका है और सभी विधायकों को अपना जवाब देना चाहिए. हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि विपक्ष पहले से ही “वोट चोरी” और चुनाव में गड़बड़ी का मुद्दा उठाता रहा है. उनके मुताबिक, इस नोटिस से कहीं न कहीं यह संकेत मिलता है कि चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई हो सकती है.
जिसे मिला नोटिस वो दें कोर्ट को जवाब- भाकपा माले
वहीं भाकपा माले विधायक अजय सिंह ने कहा कि किसे नोटिस मिला है, इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है. उनके अनुसार अभी तक किसी को नोटिस नहीं मिली है. उन्होंने कहा कि एसआईआर का जो मुद्दा था, जिसमें वोट चोरी का आरोप लगा था, उस मामले में जो लोग प्रभावित थे, वे अदालत गए थे. लेकिन यदि किसी विधायक को नोटिस जाती है तो उसे न्यायालय को अपना जवाब देना चाहिए.
उन्होंने 10 हजार रुपये बांटे जाने के मुद्दे पर भी सवाल उठाया. सरकार की ओर से दलील दी गई कि यह योजना आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले शुरू की गई थी. हालांकि उनका मानना है कि चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद सरकार किसी भी योजना का शिलान्यास या उद्घाटन नहीं कर सकती. ऐसे में बाद में जो राशि वितरित की गई, वह नहीं बांटी जानी चाहिए थी. उनके अनुसार यह पूरी तरह गलत हुआ है.
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में अंतिम निर्णय न्यायालय को ही लेना है. इसमें वे कुछ नहीं कर सकते. उनका कहना है कि जिन विधायकों को भी नोटिस मिले, उन्हें अदालत में जवाब देना चाहिए.
अब सबकी नजर अदालत की सुनवाई पर टिकी है. संबंधित विधायकों को अपने-अपने हलफनामों के बारे में स्पष्ट जवाब देना होगा. राजनीतिक बयानबाजी के बीच यह मामला कानूनी मोड़ ले चुका है और आने वाले दिनों में अदालत का रुख ही तय करेगा कि आगे क्या कार्रवाई होगी. फिलहाल, विधानसभा में इस मुद्दे ने सियासी हलचल जरूर बढ़ा दी है.







