उच्चतम न्यायालय द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ पर रोक के साथ देश भर में इसके विरुद्ध चल रहा विरोध थम गया। न्यायालय के निर्देश के अनुसार, केंद्र सरकार को ऐसी समिति बनानी है, जिसमें समाज को ठीक से समझने वाले लोग शामिल होंगे और वे इसमें बदलाव का सुझाव देंगे। उन सुझावों के आधार पर बनाए गए नियमन पर उच्चतम न्यायालय अंतिम मुहर लगाएगा। विवाद से समाज में एकता और सद्भाव के लिए काम करने वाले संगठनों और व्यक्तियों के अंदर चिंता पैदा हो रही थी। मोदी सरकार या अधिकतर भाजपा राज्य सरकारों में जाति या मजहब के नाम पर सरकारी स्तर से पक्षपात या भेदभाव नहीं देखा गया है।
यूजीसी नियमन के विरोध में आवाज उठी कि इसका सामान्य जातियों के विरुद्ध दुरुपयोग होगा, क्योंकि इसमें केवल अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्र ही जाति-आधारित भेदभाव का दावा कर सकते हैं। इसमें भेदभाव की झूठी शिकायत से सुरक्षा के प्रावधान भी नहीं हैं। समता समिति में भी केवल अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़ों की ही सदस्यता अनिवार्य की गई। इसे उच्चतम न्यायालय ने भी रेखांकित किया। न्यायालय ने नियमों को अस्पष्ट बताया, जिनमें किसे भेदभाव माना जाए और किसे नहीं, इसका फैसला कठिन होगा। न्यायालय ने कहा कि अगर हम इस पर रोक नहीं लगाते, तो स्थिति खतरनाक हो जाती। न्यायालय के मत में पूरे नियमन की भाषा ऐसी नहीं, जो कानून और नियम की कसौटी पर खरा उतरे। भेदभाव समाप्त करने के नाम पर बना कानून और नियमन ही भेदभाव मूलक हो, तो उसे क्या कहेंगे? इसे कोई नकार नहीं सकता कि दलित और जनजाति समुदाय के साथ समाज में अतिवाद की सीमा तक भेदभाव हुए। पर आज काफी हद तक स्थितियां बदल गई हैं। स्थानीय निकाय से राज्यों तक के नेतृत्व में दलित, जनजाति और ओबीसी के लोग शीर्ष पर आए हैं।
यूपीए शासनकाल में सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय सलाहकार परिषद की अनुशंसा पर 2012 में पहली बार विश्वविद्यालय के लिए नियमन बने थे। वह भी केवल अनुसूचित जाति/ जनजाति के संदर्भ में था और उसमें दुरुपयोग को हतोत्साहित करने तथा सामान्य समिति में सभी वर्गों के लोगों को शामिल करने का प्रावधान था। याचिका में 2012 नियमों के सख्त क्रियान्वयन की मांग की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने 2019 में नोटिस जारी किए, लेकिन मामला जनवरी, 2025 तक लंबित रहा। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर यूजीसी द्वारा तैयार पहला मसौदा थोड़ा संतुलित था, लेकिन उसके विरुद्ध न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया और फिर दोबारा आदेश आया। इसकी परिणति हमारे सामने है। यूपीए काल में कांग्रेस का उद्देश्य खोए हुए मुसलमान, दलित व जनजातियों का वोट वापस लाना था और उसके लिए समाज को विभाजित करने वाले अनेक ढांचे खड़े कर दिए। लक्षित हिंसा विधेयक और यूजीसी नियमन उन्हीं में शामिल था। विरोध के बाद लक्षित हिंसा विधेयक वापस हो गया, लेकिन नियमन लागू हुआ। विचार इस पर होना चाहिए था कि यूपीए सरकार वाले नियमन की आवश्यकता है या नहीं।
आंकड़े बताते हैं कि सारे उच्च शिक्षण संस्थानों में 2019-20 में 173 शिकायतें आईं, तो 2023-24 में 378। वर्ष 2019-20 में कुल छात्रों की संख्या 3 करोड़ 85 लाख के आसपास थी और इसके अनुसार प्रति करोड़ 50 शिकायतें थीं। 2023-24 में लगभग 4 करोड़ 40 लाख छात्र यानी एक करोड़ पर लगभग 84 शिकायतें की गईं। कह सकते हैं कि सभी शिकायतें नहीं हुईं, किंतु संख्या अत्यंत कम है और यह सामाजिक बदलाव की ओर इशारा करता है। उच्च शिक्षा संस्थानों में जातीय आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव अपवाद हो सकता है, सामान्य स्थिति नहीं। आवश्यकता इसे और सुदृढ़ करने की तथा विश्वविद्यालय में ही निपटारा हो रहा है, तो उसे सशक्त करने की होनी चाहिए। 20 मार्च, 2018 से लेकर 19 जनवरी, 2026 तक उच्चतम न्यायालय के अनुसूचित जाति/ जनजाति अत्याचार या भेदभाव से संबंधित तीन महत्वपूर्ण फैसले हैं। उच्चतम न्यायालय ने साफ किया है कि केवल अपशब्दों का प्रयोग अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं है, जब तक कि ऐसा किसी को जाति के आधार पर अपमानित करने के स्पष्ट इरादे से न किया गया हो।
इसके अनुसार, अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला तभी बनता है, जब अपमान या गाली-गलौज विशेष रूप से जातिगत आधार पर और सार्वजनिक रूप से किया गया हो, न कि केवल व्यक्तिगत विवाद में। कोई भी नियमन उच्चतम न्यायालय के इस आदेश के अनुरूप ही होना चाहिए। ऐसे विवादित विधान समाज में दूरियां बढ़ाते हैं, जिसकी कोशिश भारत विरोधी या निहित स्वार्थी तत्व लगातार करते हैं।






