रूस के तेल में बड़ी आग लगी है। इसने दुनिया के बड़े लोकतंत्रों, यानी अमेरिका और भारत को भिड़ा दिया और अब यह यूरोप की एकजुटता में पलीता लगा रहा है। ट्रंप ने कहा कि यूरोप के मुल्क रूस से तेल एवं गैस लेना बंद करें। यूरोप रूसी तेल से काफी हद तक दूरी बना चुका है, जरूरत का केवल दो फीसदी आयात होता है, मगर गैस नहीं छूटती। कुल जरूरत का 14 फीसदी अब भी आयात होता है, बल्कि निर्भरता बढ़ती जाती है। हर महीने यूरोप के मुल्क रूस को तेल-गैस खरीदकर एक अरब यूरो का भुगतान करते हैं।
नाटो चाहता है कि अमेरिका पुतिन को रोके, हथियार देकर यूक्रेन को बचाए, जबकि ट्रंप चाहते हैं रूस की गैस रुके, तो अमेरिकी कंटेनर मोड़ दिए जाएं यूरोप की तरफ। रूस की गैस पर यूरोप में मार मची है। हंगरी और स्लोवाकिया छूट मांग रहे हैं। जर्मनी 2028 तक इंतजार करना चाहता है। फ्रांस चुपके से मास्को के साथ डील कर रहा है। टाइम मशीन गुर्रा रही है। उड़ान भरने को तैयार है। इसका रोबो पायलट आपका स्वागत इतिहास की महत्वपूर्ण उक्ति के साथ करेगा कि तेल दुनिया को बांटता है, जोड़ता नहीं। आइए, विराजिए टाइम मशीन पर और अपनी बेल्ट बांधिए! टाइम मशीन के फ्लाइट पाथ पर बीसवीं सदी की चार तारीखें सेट हो रही हैं-1941, 1953, 1956 एवं 1973। पहला कोऑर्डिनेट है-1941, शहर-टोक्यो। सामने जापान का सैन्य मुख्यालय है। जापानी नौसेना के अधिकारी गुस्से में हैं। अमेरिका ने जापान को तेल निर्यात पर रोक लगा दी है। जापान की 80 फीसदी तेल जरूरतें अमेरिका पूरी करता है। यह एक रणनीतिक चाल है-अमेरिका जापान को चीन से पीछे हटने के लिए मजबूर करना चाहता है। लेकिन कमरे में कुछ और चर्चा है: जापान कुछ सनसनीखेज करने जा रहा है और अमेरिका को पता भी नहीं है। एक जनरल कहता है, ‘अमेरिका ने तेल को हथियार बनाया। हम जवाब देंगे।’ तेल की कमी ने जापान को युद्ध की ओर धकेल दिया है। सात दिसंबर, 1941 को जापान ने अमेरिका के पर्ल हार्बर पर हमला कर दिया। हम अगली मंजिल की तरफ चलें, इससे पहले याद रखिएगा कि अमेरिका को िद्वतीय विश्वयुद्ध में लाने में तेल की भूमिका भी थी, एक ऐसी जंग छिड़ी, जो जापान पर न्यूक्लियर अटैक से खत्म हुई। अगला कोऑर्डिनेट है-1953, तेहरान। अगस्त का महीना है। तेहरान के राजनीतिक गलियारों में तनाव है। ईरान के प्रधानमंत्री मोसाद्देक ने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया है, जिससे ब्रिटेन की एंग्लो-इंडियन ऑयल कंपनी को भारी नुकसान हुआ। ब्रिटेन ने ईरान के तेल पर प्रतिबंध लगाया था, निर्यात रोका था, मगर यह उल्टा पड़ गया। ईरान ने नए खरीदार ढूंढ लिए-उसने जापान और इटली जैसे देशों को तेल बेचना शुरू किया। तेहरान में रुकिए। अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान में तख्तापलट कर दिया है। पश्चिम को ईरानी तेल वापस मिल गया है, मगर अरब मुल्कों को सबक मिला है। यही घटनाक्रम 1960 में दुनिया के सबसे ताकतवर तेल कार्टेल यानी ओपेक के गठन की वजह बनेगा। तेल ने फिर दुनिया को बांट दिया है। इस बार उत्पादक और उपभोक्ता आमने-सामने हैं। टाइम मशीन अब 1956 की तरफ बढ़ रही है। हम स्वेज नहर के किनारे उतरेंगे।
पश्चिम एशिया के देश परिवर्तन की लहर से गुजर रहे हैं। अपने तेल उद्योग पर पश्चिम की कंपनियों के कब्जे उनके गुस्से की सबसे बड़ी वजह हैं। जनता के नारों और समर्थन के बीच मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया है। अमेरिका यूरोप का आधा तेल तो इसी रास्ते से जाता है। ब्रिटेन और फ्रांस तमतमा गए हैं; स्वेज को चलाने वाली कंपनी में उनकी हिस्सेदारी जो थी। वे इस्राइल के साथ मिलकर सैन्य कार्रवाई की योजना बना रहे हैं। लेकिन यह क्या? अमेरिका के राष्ट्रपति आइजनहावर इसका विरोध कर रहे हैं। उन्हें डर है कि अमेरिका को तेल नहीं पहुंचा, तो आफत हो जाएगी। व्हाइट हाउस से खबर आ रही है कि राष्ट्रपति आइजनहावर ने ब्रिटिश वित्त मंत्री हेरोल्ड मैकमिलन को चेतावनी दी है कि ‘नहर के लिए जंग मत करो, वरना पाउंड डूब जाएगा।’
वेस्टमिंस्टर के गलियारों से खबर आ रही है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दबाव में ब्रिटेन पीछे हट गया है। प्रधानमंत्री एंथनी ईडन को इस्तीफा देना पड़ा है। तेल ने फिर सहयोगियों को लड़ा दिया है। अमेरिका ने नाटो के सदस्य देशों को अपना रुख बदलने पर मजबूर किया है। अब 1973 की तरफ बढ़ते हैं। हम लंदन की ठंडी सुबह में हैं। अक्तूबर का महीना है। अरब और इस्राइल के बीच याम किपुर जंग छिड़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इस्राइल की मदद की है। अरब के तेल मंत्रियों ने एक बड़ा सनसनीखेज फैसला किया है। उन्होंने इस्राइल का समर्थन करने वाले देशों-अमेरिका, नीदरलैंड, ब्रिटेन को तेल निर्यात रोक दिया है। यह हथियार के तौर पर तेल का पहला इस्तेमाल है। तेल की कीमत तीन डॉलर से 12 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। मगर फ्रांस और जर्मनी को इस इंबार्गो से कुछ छूट मिली है। फ्रांस सऊदी के साथ डील कर रहा है, और ब्रिटेन अलग से सऊदी के साथ समझौते की कोशिश में है। अमेरिका और नीदरलैंड अकेले पड़ गए हैं।
तेल ने यूरोप को फिर बांट दिया है। अब हम वापस 2025 में आ गए हैं। टाइम मशीन ब्रुसेल्स में उतर रही है। यूरोपीय देश बिखर रहे हैं। हंगरी और स्लोवाकिया को हर दिन रूस से लगभग 2.5 लाख बैरल तेल चाहिए। फ्रांस, बेल्जियम और कई यूरोपीय देशों की कंपनियां पिछले छह महीनों में रूस से गैस के 4.4 अरब यूरो के सौदे कर चुकी हैं। यूरोप का प्लान था कि 2028 तक रूसी तेल-गैस की सारी खरीद बंद की जाएगी, 2026 के बाद नए छोटे सौदे भी नहीं होंगे। मगर ट्रंप कह रहे हैं कि पुतिन को रोकना है, तो रूस से तेल-गैस लेना तुरंत बंद करो। दूर मास्को में इतिहास की किताब खोलते हुए रूस के राष्ट्रपति पुतिन मुस्करा रहे हैं। तेल सिर्फ ईंधन नहीं, सियासत की सबसे पुरानी शतरंज है। सबको पता है, कौन कितना मजबूर है।







