ऐसे समय में, जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में युद्धों, क्षेत्रीय संघर्षों और ट्रंप के टैरिफ की आशंकाओं के चलते शक्तियों के बीच टकराव पहले ही नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है, तब अमेरिकी सीनेटरों और नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) की भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों के रूस के साथ व्यापारिक संबंध जारी रखने पर भारी टैरिफ लगाए जाने की चेतावनी देने से सवाल उठता है कि कहीं दुनिया आर्थिक युद्ध की तरफ तो नहीं बढ़ रही।
ध्यान रहे कि यह चेतावनी ऐसे समय में आई है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भी रूस के राष्ट्रपति पुतिन को पचास दिन के भीतर यूक्रेन से युद्ध खत्म न करने पर सौ फीसदी द्वितीयक टैरिफ की धमकी दे चुके हैं। उल्लेखनीय है कि द्वितीयक टैरिफ उन देशों या कंपनियों पर लगता है, जिन पर सीधे कोई प्रतिबंध नहीं होता, लेकिन उनके साथ व्यापार करने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं। चूंकि भारत और चीन रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े आयातक हैं, यह स्थिति दोनों के लिए चिंताएं बढ़ाने वाली है।
भारत अपनी तकरीबन 88 फीसदी कच्चे तेल की जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है, और पिछले करीब तीन वर्षों से रूस भारत के तेल आयात का आधार रहा है। अगर इन टैरिफ के चलते रूस से तेल की आपूर्ति रुकती है, तो भारत को सऊदी अरब और इराक जैसे वैकल्पिक स्रोतों को देखना होगा, जिससे स्वाभाविक ही तेल की कीमतें बढ़ेंगी और इसका असर आम जनता पर भी पड़ेगा। यही वजह है कि भारत ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी अपनी चिंताओं को लेकर अमेरिकी सांसदों और ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत कर रहा है।
दरअसल, इस सवाल का जवाब कि-क्या टैरिफ की धमकियां इन देशों को अपनी व्यापारिक नीतियों में बदलाव लाने पर मजबूर करेंगी-इतना आसान नहीं है। इसकी पहली वजह तो यह कि तीनों ही मजबूत अर्थव्यवस्थाएं हैं और दूसरी यह कि इन देशों के साथ पश्चिमी देशों के भी गहरे हित जुड़े हुए हैं।
नाटो में शामिल पश्चिमी देशों का तर्क है कि रूस के साथ व्यापार करने वाले देश अप्रत्यक्ष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा दे रहे हैं। हालांकि, भारत ने हमेशा से ही इस मामले में तटस्थ रुख अपनाते हुए बार-बार कहा है कि वह संवाद और कूटनीति के माध्यम से शांति की वकालत करता है, और उसका रूस के साथ व्यापार राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही किया जाता है।
बहरहाल, भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों को टैरिफ की चेतावनी ने कूटनीति के मोर्चे पर नया तनाव तो पैदा किया ही है। अब यह तनाव वैश्विक व्यवस्था को किस दिशा में ले जाता है, यह तो समय ही बताएगा।







