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क्या है वक्फ बोर्ड कानून, क्यों पड़ी संशोधन की जरूरत? विपक्ष के विरोध करने की क्या है वजह

UB India News by UB India News
August 9, 2024
in संपादकीय, समाज
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संसद के मानसून सत्र का 11वां दिन , संसद में वक्फ एक्ट संशोधन बिल पेश कर सकती है मोदी सरकार !
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केंद्र की मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में एक और बड़ा कदम उठाने की तैयारी में जुटी है. ये कदम है वक्फ बोर्ड के अधिकारिों में बदलाव का. जी हां संसद के मानसून सत्र में केंद्र सरकार की ओर से ये अहम फैसला लिया जा सकता है. इसको लेकर केंद्र सरकार की ओर से सत्र में एक विधेयक यानी बिल पेश किया गया है. गुरुवार 8 अगस्त 2024 को लोकसभा में यह बिल पेश किया गया है.  बता दें कि वक्फ बोर्ड के अधिकारों को लेकर बीते लंबे वक्त से विवाद की स्थिति बनी हुई है.

वक्फ बोर्ड को मिले असीमित अधिकारों को कम करके इसकी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए केंद्र सरकार वक्फ बोर्ड कानून में संसोधन करने जा रही है। इसमें मुस्लिम महिलाओं समेत मुस्लिम समाज के अन्य पिछड़े वर्ग, शिया, सुन्नी, बोहरा और आगाखानी जैसे वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए केंद्र सरकार दो महत्वपूर्ण विधेयक लोकसभा में पेश करने जा रही है। आइए जानते हैं वक्फ बोर्ड कानून क्या है और इसमें संसोधन की जरुरत क्यों पड़ी। विपक्ष इसका विरोध क्यों कर रहा है।

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बिल में कितने संसोधन होंगे

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पहले बिल के जरिए वक्फ कानून 1955 में महत्वपूर्ण संशोधन लाए जाएंगे, वहीं दूसरे बिल के जरिए मुसलमान वक्फ कानून 1923 को समाप्त किया जाएगा। इसके बेहतर कामकाज और संचालन के लिए 44 संशोधन पेश करके 1995 के वक्फ अधिनियम की संरचना में बदलाव किया जाएगा। प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य बोर्डों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना भी है।

क्यों पड़ी संशोधन की जरुरत

सरकार का कहना है कि वक्फ बोर्ड कानून में संशोधन करके केंद्रीय पोर्टल और डेटाबेस के माध्यम से वक्फ के पंजीकरण के तरीके को सुव्यवस्थित करना है। इसमें कहा गया है कि किसी भी संपत्ति को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज करने से पहले सभी संबंधितों को उचित नोटिस के साथ राजस्व कानूनों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार का कहना है कि संशोधन विधेयक के पीछे का मकशद वक्फ बोर्डों के कामकाज में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाना है। इन निकायों में महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित करना है। सरकार की तरफ से कहा गया है कि यह संसोधन मुस्लिम समुदाय की मांग पर किया जा रहा है।

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि  अखिल भारतीय सूफी सज्जादानशीं परिषद (एआईएसएससी) प्रतिनिधिमंडल ने जिसमें देश के कई दरगाजों के प्रमुख शामिल हैं ने इस कानून का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने पीएम मोदी के कामकाज की भी तारीफ की।

 वक्फ बोर्ड कानून क्या है? इसका क्या रोल है

वक्फ बोर्ड कानून 2013 संसोधन में वक्फ बोर्डों को व्यापक शक्तियां प्रदान की गई थी। तब से यह विवादास्पद हैं। वक्फ अधिनियम, 1995 (2013 में संशोधित) की धारा 3 के तहत परिभाषित किया गया है, वक्फ या वक्फ का अर्थ है मुस्लिम कानून द्वारा पवित्र, धार्मिक या धर्मार्थ के रूप में मान्यता प्राप्त किसी भी उद्देश्य के लिए किसी भी चल या अचल संपत्ति का किसी भी व्यक्ति द्वारा दान देना। वक्फ अधिनियम, 1995, एक ‘वकीफ’ (वह व्यक्ति जो मुस्लिम कानून द्वारा धार्मिक या धर्मार्थ के रूप में मान्यता प्राप्त किसी भी उद्देश्य के लिए संपत्ति समर्पित करता है) द्वारा ‘औकाफ’ (दान की गई और वक्फ के रूप में अधिसूचित संपत्ति) को रेगुलेट करने के लिए लाया गया था।

 वक्फ बोर्ड के कानूनी अधिकार

1995 अधिनियम 1995 की धारा 32 कहती है कि किसी राज्य में सभी वक्फ संपत्तियों का सामान्य पर्यवेक्षण राज्य/केंद्र शासित प्रदेश वक्फ बोर्डों (एसडब्ल्यूबी) के पास निहित है और वक्फ बोर्ड को इन वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन करने का अधिकार है। 1954 का अधिनियम जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान वक्फ के कामकाज के लिए एक प्रशासनिक संरचना प्रदान करने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था। तब वक्फ बोर्डों के पास शक्तियां थीं, जिनमें ट्रस्टियों और मुतवल्लियों (प्रबंधकों) की भूमिकाएं भी शामिल थीं।

इससे पहले भी कई बार कानून में हो चुका है संसोधन

1954 अधिनियम को 1964, 1969 और 1984 में संशोधित किया गया था। आखिरी बार 2013 में वक्फ संपत्तियों के अवैध हस्तांतरण को रोकने और अतिक्रमण हटाने के लिए प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए कड़े उपाय शामिल किए गए थे।

विपक्ष क्यों कर रहा संसोधन का विरोध

वक्फ बोर्ड कानून के संशोधन का समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी की तरफ से संसद में विरोध किया जा सकता है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ट्वीट कर कह कहा कि वक़्फ़ बोर्ड’ का ये सब संशोधन भी बस एक बहाना है। रक्षा, रेल, नज़ूल लैंड की तरह ज़मीन बेचना निशाना है। वक़्फ़ बोर्ड की ज़मीनें, डिफ़ेंस लैंड, रेल लैंड, नज़ूल लैंड के बाद ‘भाजपाइयों के लाभार्थ योजना’ की शृंखला की एक और कड़ी मात्र हैं। अखिलेश ने कहा कि इस बात की लिखकर गारंटी दी जाए कि वक़्फ़ बोर्ड की ज़मीनें बेची नहीं जाएंगी।

ओवैसी ने अभी हाल में कहा था कि इससे पता चलता है कि मोदी सरकार बोर्ड की स्वायत्तता छीनना चाहती है और उसके कामकाज में दखल देना चाहती है। यह स्वयं धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है। हैदराबाद के सांसद ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा शुरू से ही इन बोर्डों और वक्फ संपत्तियों के खिलाफ रही है और वे ‘हिंदुत्व एजेंडे’ पर काम कर रहे हैं।  अब यदि आप वक्फ बोर्ड की स्थापना और संरचना में संशोधन करते हैं, तो प्रशासनिक अराजकता होगी, वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता खत्म हो जायेगी और यदि वक्फ बोर्ड पर सरकार का नियंत्रण बढ़ जायेगा, तो वक्फ की स्वतंत्रता खत्म हो जायेगी।

कहां से आया वक्फ बोर्ड शब्द

वक्फ की बात करें तो यह अरबी भाषा से लिया गया शब्द है. इसका मतलब होता है भगवान यानी खुदा के नाम पर किसी वस्तु या परोपरकार के लिए दान किया गया धन. खास बात यह है कि इस वक्फ के दायरे में न सिर्फ चल बल्कि अचल दोनों ही तरह की संपत्तियों को शामिल किया जाता है. यही नहीं इसमें कोई मुस्लिम समुदाय का शख्स धन, मकान, जमीन या फिर कोई भी कीमती वस्तु वक्फ को दान कर सकता है.

कौन करता है रख-रखाव

वक्फ को दान में मिलने वाली जमीन, धन, मकान या फिर अन्य चीजों की देख रेख के लिए उनका खास प्रबंधन है. यह प्रबंधन राष्ट्र से लेकर स्थानीय दोनों स्तर पर होता है. वक्फ निकाय इन सभी दान चीजों का ध्यान रखता है.

कैसे शुरू हुए वक्फ बोर्ड के अधिकार

बात 1954 की है जब तात्कालिन केंद्र सरकार ने वक्फ बिल पारित किया था. इसके बाद 1964 में केंद्रीय वक्फ काउंसिल बनी. दरअसल 1954 में जवाहरलाल नेहरू की सरकार थी. उन्होंने एक्ट को पास कराने में अहम भूमिका निभाई.

क्या था वक्फ एक्ट का मकसद

नेहरू सरकार ने जब 1954 में इस एक्ट को सदन में पारित किया तो उस समय इसका मकसद था वक्फ से जुड़े कामकाज को सरल बनाना. इसके साथ ही जरूरी प्रावधान भी करना. इस एक्ट के तहत वक्फ की संपत्ति पर दावे से लेकर उसके रख-रखाव तक को लेकर प्रावधान किए गए.

10 साल बाद हुए संशोधन

वक्फ एक्ट पारित होने के 10 साल बाद इसमें संशोधन किया गया. 1964 में एक अल्पसंख्यक मंत्रालय के तहत सेंट्रल वक्फ परिषद का गठन किया गया. इसमें बोर्डों के कामकाज के मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देने के काम करती है.  इसके 30 वर्ष बाद 1995 में एक बार फिर एक्ट में बदलाव किए गए. इसके तहत हर प्रदेश और केंद्र शासित प्रदेशों में भी वक्फ बोर्ड बनाने की मंजूरी दे दी गई. यानी 1995 में नरसिम्हाराव की सरकार ने वक्फ बोर्ड के अधिकारों में बड़ा इजाफा किया.

इसके बाद 2013 में फिर हुआ संशोधन

इसके बाद एक बार फिर यूपीए सरकार में वक्फ बोर्ड एक्ट में संशोधन किया गया. तात्कालिन मनमोहन सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में ये संशोधन किया और कहा कि देश पर पहला हक वक्फ बोर्ड का है.

2023 में निरस्त करने के लिए पेश हुआ बिल

वक्फ बोर्ड की लगातार बढ़ती ताकत को लेकर विवाद भी गहराता गया. इसको निरस्त करने के लिए वर्ष 2023 में 8 दिसंबर को वक्फ बोर्ड एक्ट 1995 को निरस्त करने या फिर निजी सदस्य विधेयक राज्यसभा में पेश किया गया. इस बिल को उत्तर प्रदेश से बीजेपी सांसद हरनाथ सिंह यादव ने पेश किया.

बिल पर बढ़ा विवाद

यादव के बिल पेश करने के साथ ही इसको लेकर विवाद शुरू हो गया. बिल को लेकर मतदान भी कराया गया. इस दौरान बिल पेश करने के समर्थन में राज्यसभा में कुल 53 वोट पड़े जबकि इसके विरोध में सिर्फ 32 ही वोट हुए. इस मौके पर बीजेपी के सांसद ने कहा भी था कि वक्फ बोर्ड अधिनियम 1995 समाज में द्वेष और नफरत बढ़ाने का काम कर रहा है.

वक्फ बोर्ड के पास कुल कितनी संपत्ति

बता दें कि देश में भारतीय रेलवे और कैथोलिक चर्च चके बाद अगर किसी के पास सबसे ज्यादा जमीन है तो वह है वक्फ बोर्ड. आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो वक्फ बोर्ड के पास एक दो नहीं बल्कि 8 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन वर्तमान समय में है. खास बात यह है कि 2009 में यह जमीन सिर्फ 4 लाख एकड़ थी. लेकिन 14 साल के अंदर जमीन दोगुना से ज्यादा हो गई है. इन जमीनों में ज्यादातर हिस्सा मस्जिद, मदरसा या फिर कब्रगाह के नाम पर है. बता दें कि वर्ष 2022 में जब वक्फ बोर्ड की जमीन का आंकलन किया गया था तो यह 865644 एकड़ थी. यह सभी अचल संपत्तियां हैं.

अंग्रेजों ने भी किया था विरोध

खास बात यह है कि वक्फ बोर्ड या एक्ट को लेकर अंग्रेजों ने भी विरोध किया था. बल्कि अंग्रेजों ने वक्फ बोर्ड को ही अवैध बताया था. अंग्रेजों के शासनकाल में वक्फ की संपत्ति पर कब्जे को लेकर लंबा विवाद चला था. लंदन के प्रिवी काउंसिल तक इस मुद्दे की आंच पहुंची थी. इस विवाद को लेकर ब्रिटेन में चार जजों की एक बेंच भी बैठी और इसको लेकर अपना अहम फैसला सुनाया था. इस दरौन जजों की बेंच ने वक्फ बोर्ड को अवैध बताया था. हालांकि आजादी के बाद ब्रिटिश सरकार की सलाह को भारत सरकार ने नहीं माना.

एक्ट में क्या बदलाव कर सकती है सरकार

वक्फ एक्ट में बदलाव की तैयारी केंद्र सरकार कर रही है. इसी मानसून सत्र में इसको लेकर अहम फैसला लिया जा सकता है. केंद्र सरकार की ओर से इसमें जो बदलाव किया जा सकता उसके तहत केंद्र वक्फ बोर्ड की ओर से किए गए संपत्ति के दावों की वेरिफिकेशन जरूरी कर सकती है. यही नहीं इसके साथ ही बोर्ड की विवादित संपत्तियों को लेकर भी वेरिफिकेशन को अनिवार्य किया जा सकता है.

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