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आप को धमकी की भाषा शोभा नहीं देती………….

UB India News by UB India News
July 21, 2024
in खास खबर, मीडिया, हास्य - व्यंग
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आप को धमकी की भाषा शोभा नहीं देती………….
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एक बहस में एक प्रवक्ता एंकर से शिकायत करता है कि वह उसे बोलने से रोक रहा है क्योंकि वह (एंकर) भाजपावादी है.जबकि विपक्षी प्रवक्ता से एंकर ने सिर्फ इतना कहा था कि आप विषय पर बात करें‚ इधर उधर की बात न करें।

एंकर भी क्या करेॽ वह बहस के शुरू में टॉपिक को ‘इंट्रोड्यूस’ करता है। फिर पक्ष विपक्ष के प्रवक्ताओं आदि को आमंत्रित करता है कि वे टॉपिक पर बात करें.लेकिन जब प्रवक्ता विषय से हटकर इधर उधर की बातें करने लगते हैं तो एंकर टोकने लगता है कि आप मुद्दे की बात करें.ऐसा सुनते ही कई प्रवक्ता एकदम फैल जाते हैं औैर एंकर पर आरोप लगाने लगते हैं कि तुम बिके हुए हो.ऐसी ही एक बहस में एक प्रवक्ता ने तो एंकर को यहां तक धमका दिया कि अब तो होश में आ जाओ कल को हम सत्ता में होंगे तो क्या करोगेॽ

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कई एंकर ऐसे नाजुक मौकों पर बडी शालीनता से जवाब देते हैं कि हमारा चैनल किसी का पक्षपाती नहीं‚ न हम किसी के दलाल हैं‚ हम जनता के पक्षधर हैं‚ सभी तरह के विचारों को दिखाते हैं‚ जब आप इधर उधर करते हैं तो हमें टोकना पडता है और ऐसा हम सबके साथ करते हैं.अरसे से बहसों को देखता आ रहा यह टिप्पणीकार इस बात का गवाह है कि जब से ‘विभाजनकारी राजनीति’ बढी है तब से कई प्रवक्ताओं का रोष एंकरों और चैनलों पर निकलता है.ऐसे में बताइए एंकर क्या करेॽ वह अपना शो’ चलाए या ऐसे धमकीवादी प्रवक्ताओं की धौंसपट्टी को मानेॽ

ऐसे हर मौके पर कई एंकर बिना उत्तेजित हुए जवाब देते हैं कि आप एक बडे दल के प्रवक्ता हैं। आप को धमकी की भाषा शोभा नहीं देती। जरूरत होने पर हम सबको टोकते हैं। अगर आप मुद्दे पर तर्क– वितर्क नहीं कर सकते तो बताइए। हम कैसे न टोकें.आखिर‚और भी कई लोग हैं जिनको अपनी बात कहनी है.। आप ही इस तरह से अगर सारा टाइम खराब करेंगे तो मुझे आपके माइक को साइलेंट करना पडेगा। स्पष्ट है कि यह सब मीडिया को अपने दबाव में लाने‚ उसे धमकाने‚ उस पर हावी होने की राजनीति है जो पिछले दिनों काफी बढी है। चैनलों का काम है कि हर दिन या उसके आसपास के विवादित मुद्दों पर चरचा कराएं ताकि जनता अधिक जागरूक बने। यही उनका काम है जिसे वे मेहनत से करते हैं. दरअसल‚ जब से हमारी राजनीति अधिकाधिक ‘नफरतभरी’ और ‘कलहभरी’ होती गई है तब से चैनल भी ऐसी बाइटों‚ ऐसे टॉपिकों पर बहस कराते हैं जो लोगों की जुबान पर होते हैं। लेकिन कई प्रवक्ता पूरी तैयारी से नहीं आते जबकि एंकर की अपेक्षा होती है कि वो बोलें तो मुद्दे पर ‘तर्कों’ और ‘तथ्यों’ के साथ बोलें। ऐसा करने से उनके दल का तो मान बढेगा ही‚ आम दर्शकों के दिलों में उनका भी सम्मान बढेगा।

फिर भी‚ ऐसे कई प्रवक्ता ऐसा करने की जगह अपने ‘मुद्दों’ को ही बहस का मुद्दा बनाने पर तुल जाते हैं और वही बोलते चले जाते हैं जो ‘रट’ के आए होते हैं। कई प्रवक्ता ऐसे भी हैं जो मुद्दा कोई हो अपनी शिकायत का पिटारा खोलकर बैठ जाते हैं कि आप उन्हीं मुददों को उठाते हैं जो सत्ता के पक्ष में होते हैं‚ आप जनहित के मुद्दों पर बहस नहीं कराते। और कई तो ऐसे भी होते हैं जो टाइम खत्म हो जाने पर भी बोलते–बडबडाते रहते हैं ताकि दूसरे को जबाव देने का टाइम ही न मिले। यह तरकीब कई दलों की नई रणनीति का हिस्सा हैःचाहे मुद्दा बाढ का हो या रेल दुर्घटना का‚ वे अपने ही एजेंडे को बार–बार रिपीट करते रहते हैं। और जब से २०२४ के लोक सभा चुनाव हुए हैं तब से विपक्ष एक नये आकामक तेवर के साथ पेश होता है जबकि सत्ता पक्ष अपने ही बडबोलेपन का शिकार होकर ‘हतप्रभ’ नजर आता है।

इसी तरह‚ कुछ विपक्षी प्रवक्ता अधिक हावी नजर आते हैं जबकि सत्ता–प्रवक्ता चुनावी पिटाई से अभी तक नहीं उबरे हैं। समझना होगा कि मीडिया किसी का ‘पूरा चमचा’ नहीं होता। जनतंत्र का ऐसा ‘चौथा पाया’ होता है जो कभी–कभी सत्ता को आईना दिखा सकता है क्योंकि उसे जनता के प्रति भी वफादार होना होता है। इसलिए वह कभी–कभी ऐसे सुर भी लगा देता है जो जन हित के होते हैं। यों चोम्स्की मानते हैं कि मीडिया ‘सहमति (कंसेट) को बनाने वाला होता है लेकिन हमारा अनुभव है कि ‘सहमति’ बनाने के साथ–साथ वह ‘असहमति’ भी बनाता है क्योंकि मीडिया की भाषा ‘एकार्थ’ की जगह जनता के बीच ‘अनेकार्थ’ बनाने की गुंजाइश छोडती है। इसलिए मीडिया सिर्फ सत्ता का भोंपू हमेशा नहीं होता‚ बल्कि कभी–कभी जनता का भी ‘भौंपू’ बन जाता है।

फिर भी‚ ऐसे कई प्रवक्ता ऐसा करने की जगह अपने ‘मुद्दों’ को ही बहस का मुद्दा बनाने पर तुल जाते हैं और वही बोलते चले जाते हैं जो ‘रट’ के आए होते हैं। कई प्रवक्ता ऐसे भी हैं जो मुद्दा कोई हो अपनी शिकायत का पिटारा खोलकर बैठ जाते हैं कि आप उन्हीं मुददों को उठाते हैं जो सत्ता के पक्ष में होते हैं…..

 

 

 

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