कलश स्थापना के साथ आज से शारदीय नवरात्र की शुरुआत हो गई है। श्रद्धालु नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा अर्चना करेंगे। पंडित कमल कांत झा ने पंचांगों के हवाले से बताया कि कलश स्थापना के दिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का संयोग बन रहा है। इस योग को ध्यान में रखते हुए मध्याहन काल में अभिजीत मुहूर्त है, जो 11:36 से लेकर 12:24 के बीच अति उत्तम है। कलश स्थापना इसी अवधि में करना श्रेष्ठ रहेगा। राहु काल 3:55 से 05:22 के बीच लग रहा है और इस काल में पूजा निषेध है।
हर नवरात्रि में देवी की सवारी अलग-अलग होती है। इस बार देवी हाथी पर सवार होकर आएंगीं, जो कि सुख-समृद्धि का संकेत है। वहीं, 23 अक्टूबर को नवरात्रि का आखिरी दिन रहेगा। देवी की विदाई मुर्गे पर होगी जो की तबाही की स्थिति ला सकती है। विजयदशमी छत्रभंग कारक योग में पड़ रहा है।

कलश में ब्रह्मांड का होता है आह्वान
कलश स्थापना का अर्थ है नवरात्रि के वक्त ब्रह्मांड में मौजूद शक्ति तत्व का घट यानी कलश में आह्वान करना। कलश में ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, नवग्रहों, सभी नदियों, सरोवरों, सात द्वीपों समेत 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है। कलश की पूजा करने से सर्वदेव पूजन का पुण्यफल मिलता है। नवरात्र के दौरान वेद मंत्रों का उच्चारण, धार्मिक ग्रंथों का पाठ, हवन से सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
कलश स्थापना की विधि
जिस जगह कलश स्थापना करना है, उस भूमि को सबसे पहले प्रणाम करें। नीचे मिट्टी बिछाएं फिर जौ का रोपण करें। फिर कलश रखकर लाल कपड़ा बांधे। कलश के अंदर फूल, अक्षत, चंदन, सुपारी, द्रव्य, पान रखकर पूजा करें। इसके बाद पंच पल्लव डालें, जिसमें आम, वट, पीपल, अशोक, गूलर के पत्ते होते हैं।
पंच पल्लव डालने का बाद उस पर पूर्ण पात्र-डाल दें, जो की कलश का ढक्कन होता है। फिर चावल रखकर स्वस्तिक बनाएं और नारियल में लाल कपड़ा लपेटकर पूर्ण-पात्र पर स्थापित कर दें। फिर माता रानी का ध्यान करें।
शारदीय नवरात्र 2023 तिथियां
- 15 अक्टूबर- मां शैलपुत्री (पहला दिन) प्रतिपदा तिथि
- 16 अक्टूबर- मां ब्रह्मचारिणी (दूसरा दिन) द्वितीया तिथि
- 17 अक्टूबर- मां चंद्रघंटा (तीसरा दिन) तृतीया तिथि
- 18 अक्टूबर- मां कुष्मांडा (चौथा दिन) चतुर्थी तिथि
- 19 अक्टूबर- मां स्कंदमाता (पांचवा दिन) पंचमी तिथि
- 20 अक्टूबर- मां कात्यायनी (छठा दिन) षष्ठी तिथि
- 21 अक्टूबर- मां कालरात्रि (सातवां दिन) सप्तमी तिथि
- 22 अक्टूबर- मां महागौरी (आठवां दिन) दुर्गा अष्टमी
- 23 अक्टूबर- मां सिद्धिदात्री (नौवां दिन) महानवमी
- 24 अक्टूबर- मां दुर्गा प्रतिमा विसर्जन (दसवां दिन) विजयदशमी

मां के नौ रूप को लगने वाले भोग
- शैलपुत्री- इस दिन मां को गाय के घी का भोग लगाना चाहिए। इससे आरोग्य लाभ की प्राप्ति होती है।
- ब्रह्मचारिणी- इस दिन जगत जननी को शक्कर का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से चिरायु का वरदान मिलता है।
- चंद्रघंटा- इस दिन माता को दूध का भोग चढ़ाना चाहिए और उसे जरूर मां को दान कर देना चाहिए। ऐसा करने से ऐश्वर्य की वृद्धि होती है।
- कुष्मांडा- इस दिन माता को मालपुआ का नैवेध अर्पण करना चाहिए। ऐसा करने से मनोबल बढ़ता है।
- स्कंदमाता- इस दिन माता को केले का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से बुद्धि का विकास होता है।
- कात्यायनी- इस दिन मां भवानी को शहद का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से सौंदर्य की प्राप्ति होती है।
- कालरात्रि- इस दिन माता को गुड़ से निर्मित भोग अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से शोक से मुक्ति मिलती है।
- महागौरी- इस दिन मां को नारियल का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की सभी इच्छाएं पूरी होती है।
- सिद्धिदात्री- इस दिन माता को घर में बने हुए हलवा, पूरी और खीर का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य के जीवन में सुख-शांति मिलती है।
नवरात्र में राशियों पर पड़ने वाले प्रभाव
- मेष- सुख की प्राप्ति होगी।
- वृष- धन का स्रोत बढ़ेगा।
- मिथुन- अर्थ की प्राप्ति होगी।
- कर्क- धन की प्राप्ति होगी।
- सिंह- शत्रु से परेशानी होगी।
- कन्या- लाभ की प्राप्ति होगी।
- तुला- धन के विभिन्न स्रोतों का आगमन होगा।
- वृश्चिक- धर्म का आचरण करेंगे।
- धनु- सुख और लाभ की प्राप्ति होगी।
- मकर- थोड़े कष्ट की अनुभूति होगी।
- कुंभ- भयकारी वातावरण मिल सकता है।
- मीन- शत्रु उपद्रव की संभावनाएं बन सकती है।
कलश में ब्रह्मांड का होता है आह्वान
कलश स्थापना का अर्थ है नवरात्रि के वक्त ब्रह्मांड में मौजूद शक्ति तत्व का घट यानी कलश में आह्वान करना। कलश में ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, नवग्रहों, सभी नदियों, सरोवरों, सात द्वीपों समेत 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है। कलश की पूजा करने से सर्वदेव पूजन का पुण्यफल मिलता है। नवरात्र के दौरान वेद मंत्रों का उच्चारण, धार्मिक ग्रंथों का पाठ, हवन से सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है।







