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अफगानिस्तान पर चीन की नजर

UB India News by UB India News
September 25, 2023
in Lokshbha2024, ब्लॉग
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अफगानिस्तान पर चीन की नजर
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साम्राज्यों की कब्रगाह’ यानी अफगानिस्तान पर पड़ोसी देश चीन नजर गढ़ाए बैठा है. हाल ही में चीन ने अफगानिस्तान में अपना राजदूत नियुक्त किया है जो तालिबानी शासन में किसी देश द्वारा उठाया गया पहला कदम है. ऐसे में पूरी दुनिया चीन के इस कदम के पीछे की मंशा जानने की कोशिश कर रही है.

अफगानिस्तान में ऐसा क्या है कि पूरी दुनिया में उसे ‘साम्राज्यों की कब्रगाह’ के रूप में जाना जाता है, जिसे जीतने में अमेरिकी, सोवियत संघ और ब्रिटेन जैसी बड़ी-बड़ी महाशक्तियां भी नाकाम रही हैं.  जिसने भी इसे जीतने की कोशिश की उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा है. आज हम जानते हैं कि अफगानिस्तान क्यों कहा जाता है ‘साम्राज्यों की कब्रगाह’ और चीन क्या देख रहा है उसमें फायदा.

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अफगानिस्तान क्यों कहलाया ‘साम्राज्यों की कब्रगाह’
19वीं सदी में दुनिया के सबसे ताकवर ब्रितानी साम्राज्य ने पूरी ताकत साथ अफगानिस्तान को जीतने की कोशिश की थी, लेकिन वो इसमें कामयाब नहीं हो सका और उसे 1919 में ही उसे अफगानिस्तान को छोड़कर जाना पड़ा और इस देश को स्वतंत्रता देनी पड़ी.

वहीं इसके बाद सोवियत संघ ने 1979 में अफगानिस्तान पर हमला बोला. उनका उद्देश्य 1978 तक तख्तापलट करके कम्युनिस्ट सरकार को गिरने से बचाना था. हालांकि, सोवियत संघ को ये समझने में 10 साल का समय लग गया कि वो ये युद्ध जीत नहीं पाएगा.

 

उस वक्त ब्रितानी साम्राज्य और सोवियत संघ, दोनों के बीच एक चीज आम मानी गई, वो ये थी कि जब दोनों ही साम्राज्यों ने अफगानिस्तान पर आक्रामण किया तो उस वक्त वो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत थीं, लेकिन इस आक्रामण के बाद दोनों ही साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की ओर जाने लगे.

इसके बाद साल 2001 में अमेरिका के नेतृत्व में फिर अफगानिस्तान पर हमला हुआ. जिसमें लाखों लोगों ने अपनी जान गंवा दी. हालांकि 20 सालों तक चले युद्ध में अमेरिका भी अपने वादे पूरे नहीं कर सका और उसे अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी.

ये अमेरिका का सबसे विवादास्पद फैसला माना गया. जिसकी पूरी दुनिया में आलोचना हुई. इस फैसले के बाद अमेरिका की राजधानी काबुल में तेजी से तालिबान ने अपना शासन जमा लिया.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपने इस फैसले के बचाव में कहा था, “एक ऐसे युद्ध में नहीं मरना चाहिए जिसे खुद अफगानी लोग न लड़ना चाह रहे हों”.

अफगानिस्तान को दुनिया की कई बड़ी ताकतों ने जीतने की कोशिश की, लेकिन वो नाकामयाब रहीं.  उन ताकतों को पतन का सामना भी करना पड़ा. पूरी दुनिया में अफगानिस्तान को इन्ही कारणों की वजह से ‘साम्राज्यों की कब्रगाह’ नाम से जाना गया.

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ‘साम्राज्यों की कब्रगाह’ के रूप में ख्याति को याद करते हुए कहा था, “चाहें जितनी भी सैन्य शक्ति लगा लें, एक स्थिर, एकजुट और सुरक्षित अफगानिस्तान हासिल करना संभव नहीं है.”

China Afghanistan Relations

क्यों अफगानिस्तान में जीतना सेना के लिए हो जाता है मुश्किल
अफगानिस्तान में दुर्गम भौगोलिक स्थिति और लगातार दुश्मनों का खतरा रहता है. अफगानिस्तान का अधिकतर हिस्सा पहाड़ी है. 800 किलोमीटर लंबी हिंदू कुर्श पर्वत श्रृंखला अफगानिस्तान को दो हिस्सों में बांटती है. वहीं इस देश का 75 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी है. इन इलाकों की घाटियों में ज्यादा लोग बसे हुए हैं.

ऐसे में अफगानिस्तान का मौसम भी सेनाओं के लिए मुसीबत साबित होता है. यहां के निचले इलाकों में गर्मियों में तापमान 50 सेल्सियस तक  बढ़ जाता है. वहीं ठंड में यहां का तापमान -20 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है.

किसने जीता था अफगानिस्तान?
ऐसा कहा जाता है अफगानिस्तान को जीतना बड़ी शक्तियों के लिए भी काफी मुश्किल है. लेकिन ये नाममुमकिन नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ईरानियों, मंगोलों और सिकंदर ने अफगानिस्तान पर जीत हासिल की है. हालांकि, जिसने भी इसे जीता उसे इसकी एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है.

चीन की अफगानिस्तान पर पैनी नजर
कई सम्राज्यों का पतन कर ‘साम्राज्यों की कब्रगाह’ माने जाने वाले अफगानिस्तान पर चीन दुनिया के बाकी देशों की तरह कब्जा करने और तालिबान को यहां से हटाने की कोशिश नहीं है. उसे मालूम है ये कोशिश दुनिया की कई बड़ी ताकतें कर चुकी हैं और उसे इसमें नाकामयाबी ही मिली है. ऐसे में वो पूरी कोशिश करेगा कि तालिबान सरकार से अपने मंसूबे कामयाब करवा सके. जिसकी पहली झलक उसने तालिबान शासन में अफगानिस्तान में अपने राजदूत को नियुक्त कर दिखा दी है. दरअसल, चीन ने अफगानिस्तान के साथ राजनयिक रिश्ते नहीं रखने की वैश्विक राय ठुकरा कर वहां अपना पूर्णकालिक राजदूत नियुक्त किया है. चीन के इस कदम की पूरी दुनिया में काफी आलोचना हुई. हालांकि, चीन इसमें अपना फायदा देख रहा है.

China India Relations

तालिबान से दोस्ती में चीन के क्या हैं फायदे

 

1. तालिबान की खनिज संपदा का दोहन

चीन अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के साथ दोस्ती करने की पूरी कोशिशें कर रहा है, जिसका उद्देश्य अफगानिस्तान के विशाल खनिज संपदा का दोहन करने के लिए नए शासन को अपने कर्ज के जाल में फंसाना है. चीन की गोचिन कंपनी ने अप्रैल में अफगानिस्तान क लिथियम भंडार में 10 अरब डॉलर का निवेश करने की इच्छा जताई थी. जिसकी पुष्टि तालिबान के खान और पेट्रोलियम मंत्रालय ने ही की थी.

चीनी कंपनी ने तालिबान शासन को आश्वासन दिया है कि वह इस देश में परोक्ष रूप से 10 लाख और प्रत्यक्ष रूप से 1,20,000 नौकरियां पैदा करेगी. इसके साथ ही झिंजियांग सेंट्रल एशिया पेट्रोलियम एंड गैस कंपनी (सीएपीईआईसी) ने विगत जनवरी में उत्तरी अफगानिस्तान के अमु दरिया बेसिन से तेल निकालने के लिए 54 करोड़ डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो अफगानिस्तान की लगभग दस खरब डॉलर मूल्य की विशाल खनिज संपदा का दोहन करने की उसकी भावी कूटनीति का हिस्सा है.

पेंटागन, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सेवा और यूनाइटेड स्टेट एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) की टीम की संयुक्त रिपोर्ट की मानें तो अफगानिस्तान के खनिज भंडार की कीमत लगभग 900 अरब डॉलर है. आंकड़ों के अनुसार, अफगानिस्तान में विशाल खनिज संपदा का अब तक दोहन नहीं हो पाया है, जिसमें सोना, तांबा, एल्युमीनियम, लोहा, ग्रेफाइट जैसी चीजें शामिल हैं.

2. महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा
चीन दुनिया को ये संदेश देना चाहता है कि वो महाशक्ति बनने की अपनी महत्वाकांक्षा के लिए अमेरिका की तरह दूसरे देशों पर अपना प्रभाव रखने की राह में पहला कदम उठा चुका है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाने के कदम के बाद से ही वहां एक शून्य स्थापित हो गया है. जो चीन अपनी मौजूदगी से पूरा करना चाहता है.

दोनों देशों के बीच अभी हाल ही में 450 मिलियन डॉलर का समझौता भी हुआ है जिसमें गैस और तेल की खोज, तांबे की खदानों, लोहा और सोने की खोज के साथ लिथियम शामिल है. चीन की मुख्य नजर लिथियम पर भी है, क्योंकि वह आज की दुनिया में बहुत महत्वपूर्ण पदार्थ हो गया है. बैटरी से लेकर कंप्यूटर चिप तक में उसकी जरूरत पड़ती है. वो अफगानिस्तान के जरिये चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का निर्माण कर सकता है जो उसके कई पड़ोसी देशों की चिंता को बढ़ा देगा. अफगानिस्तान में अमेरिका विरोधी भावनाओं का भी फायदा उठा सकता है. ये उसकी आर्थिक रणनीति का हिस्सा होगा.

अपने देश में शांति बनाए रखना चाहता है चीन
चीन की रणनीतिक मजबूरी भी अफगानिस्तान की स्थिरता में है. चीन में तालिबानी गतिविधियां होती आई हैं. ऐसे में चीन कभी नहीं चाहेगा कि वो अफगानिस्तान से दूरी बनाकर अपने देश में तालिबानी ताकतों को बढ़ने दे. चीन, तालिबान से दोस्ती का हाथ बढ़ाकर शिनजियांग प्रांत में शांति बनाए रखने की योजना बना रहा है क्योंकि चीन से दोस्ती के अलावा तालिबान के पास कोई विकल्प नहीं है. तालिबान ने 2021 में अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमा लिया था, लेकिन उसके बाद 2 साल बीतने के बाद भी उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली है. अब अफगानिस्तान को एक संरक्षक की जरूरत है. ऐसे में वो चीन से दोस्ती कर उसे अपना संरक्षक मान सकता है.

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