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नीतीश को ये 5 रास्ते बीजेपी के साथ जाने को प्रेरित कर रहे!

UB India News by UB India News
September 25, 2023
in खास खबर, पटना, ब्लॉग, मुख्यमंत्री
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NDA को शिकस्त देने का नितीश ने बनाया ‘माइक्रो प्लान’ !
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बिहार के सीएम नीतीश कुमार के बारे में हर वक्त यह आशंका बनी रहती है कि वे कब किस पाले में चले जाएंगे। अभी नीतीश छह दलों के महागठबंधन की सरकार चला रहे हैं। नीतीश की पाला बदल राजनीति साल 2015 से जारी है। जनता दल से अलग होने के बाद पहली बार नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ बिहार में एनडीए की सरकार बनाई थी। यह सिलसिला 2013 तक जारी रहा। बीजेपी ने जब गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी को पीएम बनाने का फैसला लिया तो नीतीश ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था। किसी तरह उनकी सरकार तो बची रही, लेकिन 2014 में उन्होंने एनडीए के खिलाफ अकेले अपनी ताकत आजमाई। अफसोस कि उन्हें अपनी औकात का पता चल गया और सिर्फ दो सीटों पर मिली कामयाबी से ही उन्हें संतोष करना पड़ा था।

नीतीश का मन डोल रहा!

चूंकि नीतीश एनडीए छोड़ चुके थे, इसलिए 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन में शामिल होना मुनासिब समझा। उन्हें और उनके महागठबंधन को जबरदस्त कामयाबी मिली। भाजपा अलग-थलग पड़ गई। बिहार में महागठबंधन की सरकार बन गई। लेकिन दो साल पूरे होने से पहले ही नीतीश को आरजेडी के साथ अपने संबंधों का निर्वहन भारी लगने लगा। वे बहाने तलाश ही रहे थे कि लैंड फार जाब (Land For Job) मामले में तेजस्वी यादव का नाम आ गया। मौका मिलते ही नीतीश ने महागठबंधन का साथ छोड़ दिया और बीजेपी के साथ सरकार बना ली। साल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को भारी झटका लगा, जब उसे विधानसभा में सिर्फ 43 सीटें मिलीं। नीतीश ने इसकी वजह लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान के जेडीयू विरोधी कैंपेन को मानी, जिसे बीजेपी से खाद-पानी मिलने की बात उन्होंने कई मौकों पर जाहिर भी की। विधानसभा में सबसे अधिक सीटें भाजपा को मिलीं, लेकिन पार्टी ने नीतीश कुमार को ही सीएम बनाया। नीतीश सीएम तो बन गए, लेकिन भाजपा के नेता मौका मिलने पर उनकी खिंचाई करने या कम सीटों के बावजूद सीएम बनाने के अपने एहसान को याद दिलाते रहे। नतीजा हुआ कि नीतीश ने ऊब कर फिर महागठबंधन का दामन थाम लिया और भाजपा को सबक सिखाने के संकल्प के साथ सीएम बन गए।

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आरजेडी की दबाव वाली राजनीति

महागठबंधन का सबसे बड़ा दल आरजेडी है। चर्चा यह होती है कि नीतीश ने आरजेडी से गुप्त समझौता किया है। समझौते के मुताबिक वे राष्ट्रीय राजनीति में जाएंगे और बिहार की गद्दी तेजस्वी यादव संभालेंगे। चर्चा तो यह भी रही कि नीतीश विपक्ष की ओर से पीएम पद के दावेदार होंगे। असलियत अब तक उजागर नहीं हो पाई कि आरजेडी से उनकी क्या डील हुई, लेकिन इसी को आधार बना कर नीतीश के बड़े सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा ने जेडीयू से किनारा कर लिया। आरजेडी ने नीतीश को आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर विपक्षी एकता का काम सौंप दिया। नीतीश ने इसे भी मनोयोग से किया और पटना में 15 विपक्षी दलों को जुटा कर अपना यह टास्क पूरा कर दिखाया। हां, इसके लिए उन्हें पीएम पद की दावेदारी त्यागनी पड़ी। आरजेडी की आश्वस्ति के लिए नीतीश ने यहां तक घोषणा कर दी कि 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। इस बीच नीतीश पर आरजेडी का दबाव बढ़ता रहा कि वे तेजस्वी यादव के लिए जितनी जल्दी हो, कुर्सी खाली कर दें।

आरजेडी का नीतीश के खिलाफ हल्ला बोल

नीतीश पर कुर्सी छोड़ने का दबाव बनाने के काम में सबसे आगे रहे आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के पुत्र विधायक सुधाकर सिंह। सुधाकर सिंह लगातार नीतीश सरकार के कामकाज पर सवाल उठाते रहे। उनकी व्यक्तिगत आलोचना करते रहे। नीतीश की आलोचना के लिए उन्होंने ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग किया, जो उनकी तिलमिलाहट के लिए पर्याप्त थे। नीतीश ने उन पर कार्रवाई की जवाबदेही आरजेडी पर छोड़ दी। आरजेडी ने सुधाकर सिंह को शो काज दिया और उन्होंने इसका जवाब भी पार्टी को दिया, जिसमें उन्होंने खुद को पाक-साफ साबित करने की कोशिश की। आरजेडी उनके जवाब से संतुष्ट हुआ या नहीं, लेकिन जवाब की औपचारिकता के बाद उनकी पार्टी की ओर से इस बाबत कोई बयान नहीं आया। सुधाकर सिंह के बाद सामने आए लालू यादव की पत्नी को अपनी मुंहबोली बहन मानने-बताने वाले विधान पार्षद सुनील कुमार सिंह। सुनील कुमार सिंह ने कभी खुल कर तो कभी इशारों में सोशल मीडिया पर नीतीश के खिलाफ अभियान चलाया। जाहिर है कि नीतीश आरजेडी के इस हल्ला बोल ब्रिगेड से जरूर दुखी और परेशान हुए होंगे, लेकिन कुर्सी पर बने रहने की लाचारी ने उन्हें अब तक रोके रखा है।

संयोजक की संभावना खत्म

नीतीश कुमार के मन में शायद यह बात रही होगी कि उन्होंने प्रधानमंत्री की दावेदारी भले छोड़ दी है, लेकिन हो सकता है कि अवसर आने पर उनकी लाटरी लग जाए। जिस तरह कम सीटों के बावजूद भाजपा ने मान मनौवल कर उन्हें सीएम पद की कुर्सी सौंपी थी। विपक्षी एकता के लिए वे दर-दर भागते-दौड़ते रहे। लोगों को जुटा भी लिया। लेकिन बाद में विपक्षी दलों की हुई बैठकों में नीतीश कुमार को किनारे करने की कवायद कांग्रेस ने शुरू कर दी। बेंगलुरु और मुंबई की बैठकों में उन्हें वो तवज्जो नहीं मिली, जो उन्हें पटना बैठक के दौरान या उससे पहले मिली थी। हल्ला होता रहा कि नीतीश कुमार विपक्षी गठबंधन के संयोजक बनेंगे, लेकिन अब यह उम्मीद खत्म हो गई है। इसलिए कि गठबंधन को कांग्रेस ने अब हाईजैक कर लिया है और कोआर्डिनेशन कमेटी बना कर संयोजक पद की जरूरत ही खत्म कर दी है। आश्चर्य है कि जिन दिनों नीतीश को संयोजक बनाने की बात चल रही थी, उसी वक्त आरजेडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने ऐसी किसी संभावना से इनकार कर दिया था। उन्होंने ही समन्वय समिति की सबसे पहले जानकारी दी थी। नीतीश कुमार को लगता होगा कि उनकी संभावनाएं खत्म करने में लालू की कांग्रेस से मिलीभगत है। यह अंदेशा इसलिए भी पुख्ता हो जाता है कि राहुल गांधी और लालू यादव की अब खूब छनने लगी है।

सीबीआई एक्शन नीतीश के लिए अवसर

नीतीश कुमार को अगर सच में आरजेडी या विपक्षी गठबंधन से अब चिढ़ हो गई है तो वे यकीनन पिंड छुड़ाने की कोशिश करेंगे। उन्हें सिर्फ एक चीज से मतलब है कि उनकी कुर्सी सलामत रहे। हालांकि उनके बोल-बयान या विचार से अभी तक यह स्पष्ट नहीं पा रहा है कि उनका विचार क्या है। लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि नीतीश किसी से पिंड छुड़ाने के लिए अनुकूल अवसर की तलाश में रहते हैं। तेजस्वी यादव का नाम सीबीआई ने जब पहली बार 2017 में रेलवे में नौकरी के बदले जमीन मामले में शामिल किया था तो नीतीश ने इसे ही महागठबंधन छोड़ने का बहाना बनाया था। अब तो तेजस्वी के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट ने भी स्वीकार कर ली है। संभव है कि उनकी गिरफ्तारी भी हो जाए। नीतीश के लिए दोनों हाथ में लड्डू हैं। तेजस्वी गिरफ्तार हुए तो वे महागठबंधन के साथ रह कर भी निष्कंटक राज करते रहेंगे और ऐसा नहीं हुआ तो मन में यदि कोई गुबार है तो वे सीबीआई मामले को आधार बना कर पल्ला झाड़ सकते हैं।

नीतीश को अधिक लाभ की उम्मीद

भाजपा से नीतीश की नजदीकी भी इस दौरान बढ़ी है। नीतीश कुमार विपक्ष की परवाह किए बगैर G 20 समिट के मौके पर राष्ट्रपति द्वारा आयोजित भोज में शामिल हुए थे। नरेंद्र मोदी से अनबन के बावजूद वे उनके साथ हंसते-बतियाते और अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन से मुलाकात करते दिखे। अगर नीतीश सच में महागठबंधन से अलग होना चाहते हैं तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। इसलिए कि भाजपा बिहार में उन्हें समर्थन देने को तैयार बैठी है। भाजपा में नीतीश के लिए दरवाजे बंद होने की बात कहने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अब उन्हें पानी की तरह साफ और आरजेडी को पानी को गंदा करने वाला तेल बता रहे हैं। यह भी कह रहे हैं कि तेल को पानी के साथ मिलावट से कोई फर्क नहीं पड़ता, पर पानी गंदा हो जाता है। यानी नीतीश के प्रति अब भाजपा में भी सॉफ्ट कार्नर दिखने लगा है। नीतीश अगर भाजपा के साथ जाते हैं तो बिहार में सीएम की उनकी कुर्सी सलामत रहने की गारंटी है। अगर केंद्र में अगली बार एनडीए की फिर सरकार बनी, जिसकी पूरी संभावना दिख रही है, तो नीतीश कुमार को राज्यपाल या उपराष्ट्रपति जैसा पद भी भाजपा दे सकती है।

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