मनुष्य की समृद्धि का सर्वाधिक मूल्यवान संकेतक उसका बेहतर स्वास्थ्य है। सदियों से मनुष्य के स्वास्थ्य को सर्वोपरि मानते हुये शासकों/सरकारों ने जनकल्याण की परिकल्पना की। धीरे–धीरे बढ़ती आबादी के बोझ तले दबते गए अनेक राष्ट्रों ने अपने विकास के ढांचों को नागरिकों की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ढालना प्रारंभ किया‚ जिसके परिणामस्वरु प विकास के नये मॉडल सामने आने लगे।
कालांतर में‚ जीवन जीने की नैसर्गिक व्यवस्थाओं के सापेक्ष औद्यौगिकीकरण को प्राथमिकता मिली। इस औद्यैगिकरण ने जलवायु–परिवर्तन‚ शहरीकरण‚ प्रदूषण आदि को जन्म दिया। औद्यौगिकरण से ऐसे उपक्रमों को बढ़ावा मिला जो भले ही मनुष्य के विकास के नये प्रतिमान बने हों‚ परंतु इस परिवर्तन के कारण सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) नजरअंदाज हुआ। विकास की अंधाधुंध दौड़ में नई–नई बीमारियों से मनुष्य जाति प्रभावित होने लगी। आज के दौर में नागिरकों का बेहतर स्वास्थ्य एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने आया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहल पर प्रत्येक वर्ष ७ अप्रैल को ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाया जाता है। यह दिवस सरकारों को न सिर्फ अपने नागरिकों के प्रति स्वास्थ्य कार्यक्रमों के नियोजन एवं क्रियान्वयन के दायित्वों की याद दिलाता है; बल्कि भावी स्वास्थ्य संकटों के पूर्वानुमान के आधार पर नई योजनाओं के प्रति भी सचेत करता है। वर्ष २०२३ के लिये डब्लू.एच.ओ. ने अपनी थीम में वैश्विक स्तर पर सभी को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के संकल्प और अब तक के प्रयासों का स्मरण कराते हुए ‘सबके लिए स्वास्थ–सार्वजनिक स्वास्थ के ७५ वर्ष’ विषय पर नीतिकारों को चिंतन के लिए प्रेरित किया है। आंकड़े बताते हैं कि पूरी दुनिया में हर साल लगभग १.३० करोड़ लोग पर्यावरणीय या जलवायु से उत्पन्न कारणों से अपने जीवन को खो देते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह मानवता के लिए गंभीर संकट है। हम विकास की अंधी दौड़ में सस्टेनेबल डेवलपमेंट को भूलकर एक ऐसे ढांचे को विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं‚ जो अगली पीढ़ी के लिए और भी अधिक संकट उत्पन्न करेगा। सभी को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना सरकारों के नैतिक दायित्वों के रु प में देखा जाता है। महामारी या स्वास्थ्य के किसी संकटकाल में नागरिकों द्वारा सरकारों को दोषी ठहराकर उस समय की विडबंना से कोई सीख लिये बिना आगे गुजर एक सामान्य प्रक्रिया हो गई है। सरकारें अधिकाधिक लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए केवल अस्पतालों का संचालन तो कर सकती हैं किन्तु हमें यह भी याद रखना होगा कि स्वस्थ रहना हमारा स्वयं का भी उत्तरदायित्व है। विगत कुछ दशकों में भारत की आबादी के रहन–सहन के तरीकों में व्यापक बदलाव आया है। इन बदलावों ने भारत की पारंपरिक जीवन शैली और स्वास्थ्य के प्रति सजगता को क्रमशः कम किया है। सिर्फ डायबिटीज ही नहीं‚ हाइपरटेंशन‚ सीओपीडी‚ कैंसर जैसी बीमारियों ने भी भारत के नागरिकों को व्यापक रूप से जकड़ लिया है। भारत में होने वाली कुल मौतों का ६१.८ प्रतिशत हिस्सा गैर–संचारी रोगों का है। युवाओं का अस्वस्थ होना न केवल उनकी क्षमताओं में कमी लाता है बल्कि राष्ट्र के लिए उनके उपचार के दृष्टिकोण से एक अतिरिक्त भार भी है। सैम्पल रजिस्ट्रेशन सर्वे के अनुमान के अनुसार भारत में पिछले कुछ दशकों में स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाले परिवारों के व्यय में १० फीसद से अधिक की वृद्धि हुई है। यद्यपि सरकारों द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं को सहज व सुलभ बनाने के लिए हरसंभव उपाय अमल में लाए जा रहे हैं‚ परंतु गैरसंचारी रोगों के बढ़ते दायरे ने अगली सदी को स्वास्थ्य के लिए ‘संघर्ष की सदी’ की ओर ढकेल दिया है।
ऐसी परिस्थितियों में सरकारों के साथ जब तक जनसामान्य की सहभागिता व सजगता नहीं होगी तब तक विकास के सही स्वरूप को साकार नहीं किया जा सकेगा। भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति–२०१७ में नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किए जाने की प्रतिबद्धता दिखाई गई है। स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सेवाओं की पहुंच भी बढ़ाई जा रही है; परंतु क्या यह सब बढ़ती बीमारियों से निपटने के लिए पर्याप्त होगाॽ भारत में जन–स्वास्थ्य के प्रति चलाए जा रहे बड़े अभियानों में से एक ‘आयुष्मान भारत अभियान’ को देखा जा सकता है। इसके अंतर्गत स्वास्थ्य सेवाओं की प्रथम इकाई के रु प में देखे जाने वाले उप–स्वास्थ्य केंद्रों को हेल्थ एण्ड वेलनेस सेंटर के रूप में तैयार कराया जा रहा है। सरकारों को चाहिए कि वे विकास के ऐसे मॉडल विकसित करें‚ जिससे कि नागरिकों के स्वास्थ्य से समझौता न हो। राष्ट्र की समृद्धि के मानकों में नागरिकों का बेहतर स्वास्थ्य सर्वोपरि हो। कुल मिलाकर ‘बेहतर स्वास्थ्य’ के लिए सरकारों व नागरिकों को संयुक्त रूप से प्रयास करना होगा तभी ‘यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज’ का सपना साकार होगा और यही चिंतन इस वर्ष के ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाने की सार्थकता को सिद्ध करेगा।







