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सम्मान से मरने का अधिकार …….

UB India News by UB India News
January 23, 2023
in कानून, खास खबर, समाज
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सम्मान से मरने का अधिकार …….
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इच्छा–मृत्यु को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाने के चार साल बाद २०१८ में दिए निर्देशों में संशोधन करने पर सहमति जताई है। न्यायालय ने कहा है कि जो लोग गंभीर रूप से बीमार हैं‚ और इच्छा–पत्र बना चुके हैं‚ उनको सम्मान के साथ मरने का अधिकार है। न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस निर्णय में मृत्यु के अधिकार को भी मौलिक अधिकार माना है। दरअसल‚ मौजूदा दिशा–निर्देश जटिल हैं‚ इसलिए इन्हें सरल बनाने की जरूरत है।

इच्छा–पत्र के मायने जीवित होने का दस्तावेज या वसीयत है। इच्छा–मृत्यु की इजाजत देने पर दुनिया भर में बरसों से विचार–विमर्श चल रहा है। भारत भी इस बहस में शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस परिपेक्ष्य में एक ऐतिहासिक फैसले में इस तथ्य को मान्यता दी है कि असाध्य रोग से ग्रस्त रोगी इच्छा–पत्र लिख सकता है। अदालत ने कहा है कि जीने की इच्छा नहीं रखने वाले व्यक्ति को नि्क्रिरय या मू्च्छिछत अवस्था में शारीरिक पीड़ा नहीं सहने देना चाहिए। हालांकि अग्रिम इच्छा–पत्र लिखने की अनुमति कुछ शर्तों के साथ दी गई है। इसमें उल्लेख है कि जब तक संसद से इस सिलसिले में कानून नहीं बन जाता तब तक फैसले में दिए गए दिशा–निर्देश प्रभावी रहेंगे। संविधान पीठ ने गैर–सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ की जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया था। याचिका में मांग की गई थी कि असाध्य रोगों से ग्रस्त रोगियों को शारीरिक कष्टों से मुक्ति दिलाने और मृत्यु का वरण करने के लिए जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने का अधिकार दिया जाए। हालांकि कुछ चिकित्सा वैज्ञानिक‚ मानवाधिकार और सामाजिक संगठन आज भी इच्छा–मृत्यु के विरुद्ध हैं। भारत में यह मुद्दा तब देश भर में विचार और बहस का विषय बना था‚ जब मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग की दया–मृत्यु के लिए शीर्ष अदालत में गुहार लगाई गई थी।

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रेप और हत्या की दुष्टता के चलते कोमा में पहुंची अरु णा ने ४२ साल तक जीवन रक्षक प्रणाली पर टिके रहने की यातना भोगी। अरु णा को सामान्य अवस्था में लाने की जब सभी चिकित्सा कोशिशें व्यर्थ हो गइ तब अदालत में उन्हें इच्छा– मृत्यु देने की याचिका लगाई गई थी। किंतु तब अदालत ने इसे उचित नहीं ठहराया था। २०११ में सर्वोच्च न्यायालय में इस आशय की अर्जी भी लगाई गई थी कि अरु णा का इलाज संभव नहीं है। लेकिन इच्छा–मृत्यु वैध है‚ या अवैध‚ इस बाबत अंतिम निष्कर्ष पर अदालत नहीं पहुंच पाई।

लिहाजा‚ उसने मौत का वरण करने की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता देने का सवाल उठाते हुए राज्यों और केंद्र–शासित प्रदेशों को नोटिस जारी करके सलाह मांगी। तब के प्रधान न्यायमूर्ति आरएस लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय खंडपीठ ने तर्क दिया था कि यह मसला संविधान ही नहीं‚ बल्कि नैतिकता‚ धर्म और चिकित्सा विज्ञान से भी जुड़ा है‚ इसलिए इसे विचारना जरूरी है। इसके उलट केंद्र सरकार कहती रही कि यह एक तरह की आत्महत्या है‚ जिसकी अनुमति भारत में नहीं दी जा सकती। इच्छा–मृत्यु को कानूनी मान्यता दे दी गई तो इसका दुरु पयोग हो सकता हैॽ जवाब में संविधान पीठ का तर्क था कि इसका शूरु पयोग रोकने के लिए सुरक्षा के उपाय होने चाहिए। किंतु इस परिपेक्ष्य में किसी अंतिम निष्कर्ष पर आम राय नहीं बन सकी है। गोया‚ अदालत ने कहा था‚ ‘कानून का दुरुपयोग इच्छा–मृत्यु को कानूनी दर्जा नहीं देने का आधार नहीं हो सकता।’ विधि आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में इच्छा–मृत्यु को कानूनी मान्यता के विचार का विरोध किया था। अरुणा से जुड़़ी याचिका पर ही सुनवाई करते हुए तब के न्यायाधीश मार्कण्डे़य काटजू की अध्यक्षता वाली पीठ ने इच्छा–मृत्यु को गैर–कानूनी करार देते हुए निरस्त कर दिया था। अपने फैसले में कहा था कि असामान्य परिस्थितियों में नि्क्रिरय व्यक्ति को इच्छा–मृत्यु की अनुमति दी जा सकती है‚ लेकिन जब तक संसद इस बारे में कोई कानून नहीं बनाती‚ तब तक नि्क्रिरय और सक्रिय‚ दोनों प्रकार की इच्छा–मृत्यु को अवैधानिक ही माना जाएगा।

संविधान का अनुच्छेद–२१ जीवन को गरिमापूर्ण जीने का अधिकार तो देता है‚ लेकिन उसमें गरिमापूर्ण मृत्यु के वरण का अधिकार शामिल नहीं है। इच्छा–मृत्यु के विवाद को अंतिम निराकरण तक पहुंचाना इसलिए भी जरूरी है‚ क्योंकि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में जीवन रक्षा की ऐसी प्रणालियां विकसित हो चुकी हैं‚ जो जीवन और मृत्यु की कड़ी को अरसे तक उलझाए रखती हैं। चिकित्सा में निजीकरण ऐसे उपायों को और बढ़ावा दे रहा है। यातायात से जुड़ी दुर्घटनाओं में ऐसे घायलों की संख्या लगातार बढ़ रही है‚ जो दशकों से कोमा में हैं। जीवन रक्षा प्रणाली के जरिए एक हद तक उनमें प्राणवायु का संचार बना रहता है। ऐसे रोगियों के उपचार से परिजन या तो कंगाल हो रहे हैं‚ या फिर उन्हें अस्पताल में ही छोड़ देने की बेरहमी दिखाने को विवश हो रहे हैं क्योंकि उपचार की ऐसी दीर्घ अवधि में उन्हें आजीविका के संसाधनों को नियमित बनाए रखने में भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

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